इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 1 जून 2013

वक्त

  • देवनारायण निषाद ' शिक्षक'
जमाने की सोंच से वक्त गुजर जाता है,
जमी की चादर जितनी भी लम्बी हो
आखिर छोटा ही पड़ जाता है
दुनिया को हम क्या देखें,
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है


इंसान की सोच ही, सम्हालता और गिराता है,
नई सोच की नई किरण वक्त ही बतलाता है,
समय से पहले नहीं मिलती कोई चीज
यही वक्त हमेशा सिखलाता है
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है


ऐ वक्त जरा ठहर जा,
मैं वक्त की चादर ओड़कर जीना चाहता हूं,
तुम्हारी इंतजार मुझे अच्छी नहीं लगती,
फिर भी हर शक्स द्वारा इंतजार किया जाता है
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है


लोग कहते हैं, हम वक्त का इंतजार करते हैं
खाली समय का टाइमपास करते हैं
पर वक्त किसी का गुलाम नहीं,
वो तो आजाद परिंदा है
लेकिन रोज वक्त की दुहाई दिया जाता है
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है
  • ग्राम पो. - गिरौद,विख. मगरलोड तह - कुरूद जिला - धमतरी (छग.)

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