इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 1 जून 2013

वक्त

  • देवनारायण निषाद ' शिक्षक'
जमाने की सोंच से वक्त गुजर जाता है,
जमी की चादर जितनी भी लम्बी हो
आखिर छोटा ही पड़ जाता है
दुनिया को हम क्या देखें,
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है


इंसान की सोच ही, सम्हालता और गिराता है,
नई सोच की नई किरण वक्त ही बतलाता है,
समय से पहले नहीं मिलती कोई चीज
यही वक्त हमेशा सिखलाता है
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है


ऐ वक्त जरा ठहर जा,
मैं वक्त की चादर ओड़कर जीना चाहता हूं,
तुम्हारी इंतजार मुझे अच्छी नहीं लगती,
फिर भी हर शक्स द्वारा इंतजार किया जाता है
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है


लोग कहते हैं, हम वक्त का इंतजार करते हैं
खाली समय का टाइमपास करते हैं
पर वक्त किसी का गुलाम नहीं,
वो तो आजाद परिंदा है
लेकिन रोज वक्त की दुहाई दिया जाता है
केवल सोंच से ही वक्त गुजर जाता है
  • ग्राम पो. - गिरौद,विख. मगरलोड तह - कुरूद जिला - धमतरी (छग.)

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