इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 20 जून 2013

मीरा के काव्‍य में नारी चेतना


  • दादूलाल जोशी ' फरहद' 
       हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों एवं मनीषियों ने चौदहवीं शती के मध्य से लेकर सत्रहवीं शती के मध्य तक के समय को भक्ति-काल का नाम दिया है। इस अवधि में रचित साहित्य-भक्ति साहित्य हैं। प्रवृत्तियों के आधार पर इसे संतीय साहित्य भी कहा जा सकता है। भक्ति-काल को प्रवृत्ति और प्रक्रियाओं के मद्ïदेनजर प्राय: सभी विद्घानों ने उसे भक्ति-आंदोलन के रूप में अभिहित किया हैं। भक्ति के साथ आंदोलन शब्द जुड़ने से उस काल की साहित्यिक धारा की सोद्देश्यता स्वयं लक्षित होती हैं। सामान्यत: भक्ति का अर्थ नितांत व्यक्तिवादी, पलायनवादी और इस संसार के समस्त क्रियाकलापों को व्यर्थ मानकर विरत हो जाना माना जाता है। किन्तु भक्ति  काल के सभी संतों और भक्त  कवियों ने लोकमंगल की उदात्त भावना को अपनी रचनाओं में पिरोया है। स्वयं की मुक्ति के साथ-साथ लोक की मुक्ति की भावना उनकी वाणी में मुखरित हुई है। राजनीतिक ,धार्मिक , सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण को उनके कृतीत्व और व्यक्तित्व गहराई के साथ प्रभावित करते है।
       भक्ति-काल के कवियों ने अपनी ईष्टïभक्ति को एकांतिक और नितांत निजी नहीं बनाया बल्कि आम जन को भी उसमें शामिल किया। सहजसरल मानव जीवन के प्रति आस्था ने मानव जीवन के  बीच के भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में संदेश दिया। जाति-पांति, ऊंच-नीच, कर्मकांड और धर्मिक असहिष्णुता की कठोरता को शिथिल अथवा अंत करने की तीव्र आग्रह उनके काव्य में प्रकट हुए। ईश्वर के प्रति प्रेम भाव उनकी भक्ति का प्रमुख अभिप्रेत था।
       हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की विशिष्टताओं पर विचार करते हुए डॉ. ग्रियर्सन ने लिखा है-कोई भी मनुष्य जिसे पंद्रहवीं तथा बाद की शताब्दियों का साहित्य पढने का मौका मिला हैं ,उस भारी व्यवधान को लक्ष्य किए बिना नहीं रह सकता जो पुरानी और नई धार्मिक भावनाओं में विद्यमान हैं। हम अपने को ऐसे धार्मिक आंदोलन के सामने पाते हैं, जो उन सब आदोलनों से कहीं अधिक व्यापक और विशाल है क्योंकि उनका प्रभाव आज भी वर्तमान है। इस युग में धर्म ज्ञान का नहीं बल्कि भावावेश का विषय हो गया था। यहाँ से हम साधना और प्रेमोल्लास के देश में आते हैं.....।
       भक्ति आंदोलन की प्रमुख रूप से दो धाराएँ थी-1.निर्गुण भक्ति तथा 2.सगुण भक्ति। निर्गुण -भक्ति के प्रमुख पुरोधा कवि संत कबीरदास जी हुए। उनके समकालीन और परवर्ती संतों ने उसकी परंपरा को आगे बढाया। सगुण-भक्ति की दो शाखाएं थी-1.राम भक्ति और 2. कृष्ण भक्ति। राम भक्ति के प्रमुख पुरोधा कवि गोस्वामी तुलसीदास जी हुए। उनके समकालीन और परवर्ती कवियों ने राम भक्ति साहित्य का सृजन करके उस धारा में अपना योगदान दिया।
       कृष्ण भक्ति साहित्य का विपुल सृजन वैष्णव संप्रदाय के संत कवियों ने किया। इनमें सूरदास का प्रमुख स्थान है। सूरदास पुष्टिïमार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे। महाप्रभु के पुत्र गोस्वामी विट्ïठलनाथ जी ने अपने चार शिष्यों तथा अपने पिता के चार शिष्यों को चुनकर अष्टï छाप की स्थापना की थी। इन आठ भक्त कवियों में सूरदास जी एवं नन्ददास जी सबसे श्रेष्ठï थे। कृष्ण-भक्ति-काव्य की रचना जिस तरह इन दोंनो ने की है , वे अप्रतिम है। कृष्ण-भक्ति की सम्प्रदायगत परिपाटी से पृथक, सम्प्रदाय निरपेक्ष भक्त कवि भी हुए हैं. जिनमें मीराबाई प्रमुख हैं। मीराबाई की कृष्णभक्ति किसी मत विशेष या सम्प्रदाय विशेष के अन्तर्गत न होकर पूर्णत: मुक्त थी। उनकी वह मुक्त अथवा स्वतंत्रता की भावना न केवल सम्प्रदाय निरपेक्ष रहने तक सीमित थी बल्कि उन तमाम रूढ परम्पराओं धार्मिक,सामाजिक और राजकीय बन्धनों के अस्वीकार में भी थी। मीरा का सम्पूर्ण जीवन- बन्धन मुक्त रहने का पर्याय हैं। उनकी बन्धन मुक्ति , नारी मुक्ति का प्रेरणार्थक प्रादर्श हैं। श्री कृष्ण का अनन्य आराधिका, कृष्ण प्रेम की साधिका,विरह की प्रतिमूर्ति, पीड़ा का आगार और रस का सागर आदि विशेषताओं और उपमाओं से अभिव्यंजिता, कृष्ण: भक्ति के गेय पदों की रचयिता मीराबाई के व्यक्तित्व और कृतीत्व दानों ही अतिशय विलक्षण थे। जन्म से लेकर यौवन की दहलीज पर कदम रखने तक उनका काल राजप्रासाद  के वैभवपूर्ण वातावरण में व्यतीत हुआ था। विलासिता के सर्व साधन सुलभ होने के बावजूद उन्होंने श्री कृष्ण की भक्ति को श्रेष्ठï और वरेण्य माना। भक्ति भी ऐसी जिसका कोई अन्य मिसाल नहीं। कृष्ण प्रेम की दीवानगी की चरमावस्था यदि कहीं देखने को मिलती हैं, तो वह केवल मीरा के जीवन में ही दिखाई देती है। यही वजह है कि मीरा एक व्यक्ति वाचक संज्ञा से जातिवाचक संज्ञा में तब्दील हो गई है। आज भी किसी विरहिणी नारी को देखकर उसे मीरा बाई शब्द से संबोधित किया जाता है। मीरा दुख और विरह का प्रतीक बन गई -
ये री मैं तो प्रेम दीवाणी, मेरा दरद न जाणें कोय॥
       मीरा ने श्री कृष्ण को पति मानकर उसकी आराधना की है। ईश्वर की भक्ति किस रूप में एक भक्त करता है,वह उसके भाव पर आधारित होता है। उससे अपना संबंध किस रूप में जोड़ता है,वह भक्त की अपनी इच्छा पर निर्भर है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है -
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखहि तिन तैसी॥
       भक्त ईश्वर की भक्ति चाहे जिस रूप में करें, उसका मूल लक्ष्य होता हैं, ईश्वर की प्राप्ति और आवागमन के झंझटों से मुक्ति। मीराबाई ने स्वयं को कृष्ण की पत्नी माना और अपना सारा जीवन,तन, मन, धन और आत्मा को श्री कृष्ण में ही तिरोहित कर दिया। अपने एक पद में उसने गाया है -
मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई॥
       सामान्यत: मीराबाई की पहचान एक भावविव्हल कृष्ण-प्रिया,वियोग-ज्वाल में झुलसती विरहिणी और कृष्ण की प्रेम भक्ति में लीन एक नारी के रूप में होती है। उनकी यह प्रचलित पहचान उनके समग्र व्यक्तित्व और कृतीत्व का सम्यक मूल्यांकन नहीं है। ऊपरी तौर पर मीरा की कृष्ण-भक्ति व्यक्तिपरक सरोकारों तक सिमटी हुई दिखाई देती है, किन्तु गहराई से विचार करें तो उनका संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतीत्व सामाजिक सारोकारों से गुम्फित दृष्टिïगोचर होता है। सामाजिक सरोकारों में सबसे महत्वपूर्ण है,नारी मुक्ति का संघर्ष। मीरा को नारी-जागरण की प्रथम प्रेरणा के रूप में देखा जा सकता है। वह नारी जाति के विद्रोहात्मक साहस और संघर्ष- शक्ति का प्रतीक है। मीराबाई के व्यक्तित्व के इस पहलू को समझने के लिए तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों तथा प्रवृत्तियों का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक है।
       मीराबाई राजस्थान के राठौर राजपूतों की मेडतिया- शाखा के प्रवर्तक राव दूदाजी के पुत्र रत्नसिंह की पुत्री थी। रत्नसिंह बारह गाँवों के जागीरदार थे। मीरा का जन्म सन्ï 15०4 ई. में कुडकी गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम कुसुमकुंवर था। माता की असमय मृत्यु के कारण उसे बचपन में ही माँ की स्नेहिल छाया से वंचित होना पड़ा। तब राव दूदाजी ने उसे मेडता में अपने पास बुला लिया। मीरा के पितामह राव दूदाजी धार्मिक आस्था वाले व्यक्ति थे। वे उदार वैष्णव थे। उन्होंने मेडता में चतुर्भुजा जी के मंदिर का निर्माण कराया था। परिवार के धार्मिक वातावरण के फलस्वरूप मीरा में भगवत प्रेम के संस्कार बचपन में पड़ चुके थे। छोटी उम्र से ही वह गिरधर गोपाल की आराधना करने लगी थी। बारह वर्ष की आयु में मीराबाई का विवाह मेवाड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। कहा जाता है कि विवाह के फेरों के पूरा होते ही मीरा दौड़कर अपने कक्ष में पहुँची और श्री कृष्ण की मूर्ति के सामने सिर झुका दिया। जब बिदाई का वक्त आया तो उसने बहुत भारी आवाज में पिता से कहा - यह गिरधर गोपाल की मूर्ति भी मेरे साथ-साथ जायेगी। उसकी बात मान ली गई। इस प्रकार गिरधर तथा मीरा की डोली उठी और वह राजा की पुत्रवधू बनकर चित्तौड़गढ़ जा पहुँची।
       मीरा के वैवाहिक जीवन को मात्र सात वर्ष ही हुए थे,तभी कुंवर भोजराज का स्वर्गवास हो गया। उन्नीस वर्ष की युवती मीरा विधवा हो गई। इस दुखद घटना के बाद मीरा का जीवन- संघर्ष शुरू हुआ। तत्कालीन हिन्दु समाज, धार्मिक मान्यताओं और रूढ़ परंपराओं का अनुगामी था। उस काल में नारी का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। नारी पुरूष की जायज नाजायज आज्ञाओं के पालन की एक मात्र अधिकारिणी थी। समाज में जाति-पांति,ऊँच-नीच की भावनाएँ थी। परदा प्रथा का जोर था। पति की मृत्यु होने पर पत्नी को सती होने का नियम था। सती-प्रथा में यही प्रदर्शित किया जाता था कि पति की मृत्यु होने पर पत्नी स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक उसके शव के साथ चिता में भस्म होना चाहती है,जबकि वास्तविकता यह थी कि आधिकांश नारियाँ जीना चाहती थी। जीवित रहने के लिए वैधव्य का कष्टï सहना भी उन्हें मंजूर होता था किन्तु रूढ़ धार्मिक मान्यताओं का सहारा लेकर निर्दोष महिलाएँ मुर्दो के साथ भस्मीभूत कर दी जाती थी। एक कुलीन नारी का चाहे वह सधवा हो अथवा विधवा घर की चार दीवारी को लांघ पाना असंभव था। समाज में नारी  के लिए तरह-जरह की वर्जनाएं थी। एक तरफ नारी को कुछ भी अधिकार नहीं था जबकि दूसरी तरफ पुरूष को सभी तरह की स्वतंत्रता थी। एक पुरूष अनेक महिलाओं के साथ विवाह कर सकता था किन्तु नारी के विधवा होने पर वह पुनर्विवाह की कल्पना तक नहीं कर सकती थी। पुरूषों के द्वारा दी गई यातनाओं को चुपचाप सहन करना उनकी नियति थी। ऐसे वातावरण में मेवाड़ की रानी राणा सांगा की कुलवधू मीराबाई ने तत्कालीन समाज में व्याप्त हर उस परंपरा को चुनौती दी जिसमें नारी के अपमान या अवहेलना की गंध थी। उन बेड़ियों को खंड-खंड करके फेंक दिया जो नारी की पगबाधा थी। सोलहवीं शती में पति की मृत्यु होने पर  पत्नी को सती होने की परंपरा थी। मीराबाई ने उस अमानुषिक परंपरा पर पहला आघात किया। उसने सती होने से इंकार कर दिया -
गिरधर मासयॉ सती न हास्यॉ,
मन माहï्यॉ धन नामी।
       अर्थात पति की मृत्युु के बाद वह सती नहीं हुई। यह बहुत बड़ी घटना थी। एक तरफ यह राजघराने की प्रचलित परंपरा का उलंघन था तो दूसरी तरफ लोकमर्यादा का खंडन. एक प्रतिष्ठिïत शौर्ययुक्त राजवंश के लिए यह असहनीय कृत्य था किन्तु मीरा इन बातों से विमुख होकर अपने आराध्य कृष्ण की भक्ति में खो गई। उसके पास एक ही लक्ष्य था, भगवान श्री कृष्ण को पाना। उसका उद्देश्य महान था। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह राजमहल की चार दीवारी को लांघकर कृष्ण की दीवानी बन कर जन-जन के बीच गली-गली में अलख जगाने लगी -
छांडि दई कुल कानि कहा करिहै कोई।
संतन ढिंग बैठि-बैठि लोक लाज खोई॥
अंसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेलि फैल गई आनंद फल होई॥
       यह मीरा का ही साहस था कि उन्होंने कुल-मर्यादा और लोक लाज को त्याग दिया। यदि उद्देश्य महान हो तो उसकी प्राप्ति के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है किन्तु यह इतना आसान भी नहीं हैं। इसके लिए मीरा को प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ा। उन्हें जहर देकर समाप्त कर देने का षड़यंत्र भी किया गया। मीरा ने हर तरह के षड़यंत्रों और बाधाओं का सामना धैर्य और साहस के साथ किया। उसमें एक राजपूत रमणी का साहस और अपने गिरधर गोपाल के प्रति अटूट निष्‍ठा थी। जिसके चलते हर कठिनाई को झेलती हुई भक्ति रूपी सागर में डूबती चली गई।
       मीरा के अनेक  पद ऐसे है,जिनमें राणाजी को संबोधित किया गया है। यह संबोधन राणा विक्रमादित्य के लिए है, जिन्होंने मीरा के जीवन को समाप्त करने के लिए विष का प्याला भिजवाया था।
अरे राणा पहले क्यों न बरजी, लागी गिरधरिया से प्रीत।
मार चाहे छांड राणा नहीं रहूं मैं बरजी। 
सगुन साहिब सुमरता रे मैं थारे कोठे खटकी।
राणाजी ने भेजा विषरा प्याला कर चरणामृत गटकी।
    राणा के द्वारा विष का प्याला और जहरीले सर्प की पिटारी भिजवाने की घटनाओं का उल्लेख मीरा के अनेक पदों में हुआ है। इससे यह आभास होता है कि इन घटनाओं का उल्लेख बहुत गहरा प्रभाव मीरा के मनोमस्तिष्क में पड़ा था। अपने पदों में विष का प्याला भिजवाने की घटना का बार- बार जिक्र करके मीरा ने जैसे राणा के कुचक्रों पर व्यंग्य किया है तथा उसे संबोधित करके एक प्रकार से चुनौती भी दी है कि उसके षड़यंत्रों से घबरा कर वह अपने रास्ते से भटकने वाली नहीं है। एक सजग और साहसी नारी के विरोध का दर्शन हमें इन पदों में होता है।
मीरा मगन भई हरि के गुण गाय।
सांप पिटारा राणा भेज्यो,मीरा हाथ दिया जाय।
न्हाय धोय जब देखण लागी,सालिकराम गई पाय।
जहर का प्याला राणा भेज्या,अमृत दीन्ह बनाय।
न्हाय धोय जब पीवण लागी हो अमर अंचाय।
सूल सेज राणा ने भेजी दीज्यो मीरा सुलाय।
सांझ भई सोवण लागी, मानो फूल बिछाये।
       मीरा की भक्ति-भावना और साधु सन्यासियों की संगति से केवल राणा विक्रम ही नहीं बल्कि पूरा राजपरिवार उसका विरोधी हो गया था। सास और ननद  के निरंकुश व्यवहारो का समावेश भी उनके पदों में हुआ है।
पग बांध घुंघरियाँ णाच्यारी।
लोग कहयां मीरा बावरी, सासु कह्ïयां कुलनाशी रे।
विष रो प्यालो राणा भेज्यां: पीवां मीरा हांसी रे।
निम्रांकित पद की शुरूआत ही जहर की घटना से हुई है-
राणाजी ने जहर दिया म्हें जाणी।
जैसे कंचन दहति अगनि में, निकसत बाराबाणी।
लोक लाज कुल काण जगत की, दई बहाय जस वाणी।
अपने घर का परदा करले, मैं अबला बौराणी।
तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे,गरक गयो सरकाणी।
        उपर्युक्त पंक्तियों में जहर पीकर हंसना,जहर देने की घटना को जानना समझना,कुल और जगत की लोक लाज को त्यागना, तथा राणा को अपने घर परदा कर लेने को कहना, इन शब्द-समूहों में मीरा के विद्रोहिणी भावना की व्यंजना हुई है। जो प्रहार को झेलकर भी मुस्कुरा सकता है षड़यंत्रों को समझ कर भी अविचलित रहता है तथा चुनौती पूर्ण वचन प्रकट कर सकता है, वही विजयी होता है।
       मीरा के अनेक पदों में उसके संघर्ष और विरोध की ध्वनियां सुनाई देती हैं। उन्होंने अपने प्रभु की भक्ति में लीन होकर महल-अटारी सब त्याग दिया। राणा के शहर को भी छोड़ दिया। उसने लोक-लाज, बनाव-श्रृंगार को त्याग कर सन्यासिनी की भगवा चादर ओढ़ ली फिर भी उनका देवर राणा विक्रम ने उसके प्रति बैर भाव को नहीं त्यागा। प्रस्तुत पद में मीरा ने इसी प्रश्र को उठाया है। तथा राणा को ज्यो बच्छन में कैर कह कर अपना विरोध भाव किया है-
राणाजी थे क्यां ने राखो म्हासूं बैर।
थे तो राणाजी म्हाने इसडा,लागे ज्यों बच्छन में कैर।
महल अटारी हम सब त्यागा, त्याग्यों थारो बसनो सहर।
काजल -टीकी राणा हम सब त्यागा, भगवी चादर पहर।
मीरा रे प्रभु गिरधर नागर इमरित कियो जहर॥
       साधु-संतों के पहुँचने पर लोक लाज का परित्याग करके मीरा उनके आदर सत्कार में लग जाती थी। ईश दर्शन के लिए वह अनेक बार मंदिरों में चली जाती और प्रेम के आवेश में पैरों में घुंघरू बांधकर हाथों में करताल लेकर भगवान के सामने नाचने लगती। मीरा के रूप यौवन और वैधव्य तीनों एकत्र हो गये थे। यह सामंजस्य समाज की दृष्टिï में जड़ता और संदेह की चिंगारियों को अनायास जन्म देता था। राजकीय मर्यादाओं को भंग करके मीरा जिस प्रकार साधु संतों से सत्संग करती थी, वह राज परिवार के लोगों को भी सहन नहीं हो रहा था। पराये व्यक्तियों के साथ बैठकर भजन गाना और उनकी उपस्थिति में एक राजपरिवार की कुलवधू का नृत्य करना किसी को सह्ïय नहीं था। इससे राजकीय मर्यादाओं को चोंट पहुंचती थी।
       राणा विक्रमादित्य के अत्याचारों के पीछे एक कारण यह था तो दूसरी तरफ उनका स्वयं का अहंकारी, विलासी और क्रूर स्वभाव भी था। मीरा राणा सांगा की ज्येष्ठï कुलवधू थी। इस नाते राजपरिवार में उसका प्रमुख स्थान होना चाहिए था किन्तु वह सब कुछ त्यागकर सन्यासिनी बन चुकी थी फिर भी राणा को उससे दुश्मनी क्यों थी, यही प्रश्र मीरा ने अपने पद में पूछा है। मीरा अपनी तथा राजपरिवार की बदनामी को अच्छी तरह समझती थी। इसके बावजूद वह सब कुछ स्वीकार करती हुई प्रेम-पथ की यात्रा करती रही-
राणाजी म्हाने या बदनामी लागे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो मैं चलूंगी चाल अनूठी।
सांकडली सेर्ïया जन मिलिया, क्यूं कर फिरूं अपूठी।
सत संगति मा ग्यान सुणैछी, दुरजन लोगा ने दीठी।
मीरा रो प्रभु गिरधर नागर दुरजन जलो जा अंगीठी।
       निन्दा और प्रसंशा से परे रह कर और किसी की भी परवाह किये बगैर अपने निश्चय पर अटल रहना मीरा का विशेष गुण था। अपने निश्चय पर अटल रह कर आगत कठिनाईयों से सत्ïत संघर्ष करते रहना किसी भी क्रांतिकारी का आधारभूत गुण होता है। नारी मुक्ति के परिप्रेक्ष्य में मीरा का जीवन-वृत्त क्रांति का प्रथम सोपान है। छत्तीसगढी एवं हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठिïत आचार्य डॉ. विनय कुमार पाठक ने मीरा स्त्री मुक्ति का प्रादर्श शीर्षक आलेख में मीरा को प्रथम क्रांतिकारी महिला के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होनें लिखा है- वस्तुत: मीरा में एक नई रूपांतरित नारी जीवंत हुई है। वे लोक निन्दा और पारिवारिक कटुता की चिन्ता न कर प्रकारांतर में पुरूष-वर्चस्व को चुनौती देने वाली पहली क्रांतिकारी महिला है। नारी-सृजन और आचरण की प्रतीक मीरा सांस्कृतिक संघर्ष के द्वारा स्त्री-विमर्श की नींव बनाती है।
       अपूर्व सौंदर्यमयी यौवन वय प्रारंभिका, आकस्मिक वैधव्य सहिता, मेवाड़ राज की कुलवधू, श्रीकृष्ण- प्रेम की दीवानी , आगत साधु संतों के मध्य भजन गायिका एवं भाव विव्हल नर्तकी तथा तत्कालीन पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं की विद्रोहिणी, ये सभी मीराबाई के व्यक्तित्व की विलक्षणताएं हैं। भारतीय समाज में मीरा सदृश्य चरित्र मिलना असंभव है। भूतो न भविष्यते।
      भारतीय नारियों की जागृति एवं स्वतंत्रता के संदर्भ में मीराबाई का चरित्र प्रेरणाप्रद है। तत्कालीन समाज में व्याप्त नारी विरोधी मानसिकता की चुनौतियां, राजपरिवार की मर्यादाएं राणा विक्रमादित्य के अत्याचार आदि सभी तरह की कठिनाईयां मीरा को उसके महान्ï लक्ष्य से भटका नहीं सकी। राज परिवार के कठोर आचरण का उल्लेेेेेख अपने पदों में करके वह अपना सात्विक विरोध भी प्रकट करती रही। हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की साहित्यिक प्रवृत्तियों एवं उसकी विशिष्टïताओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- चौदहवीं शताब्दी के बाद का हिन्दी साहित्य अत्यंत संवेदनशील प्राणधारा से उद्वेलित है और महान आदर्शों से अनुप्राणित है। रोगमुक्त मनुष्य की भांति उसमें स्वास्थ्य सुधा और नैरूज्य जन्य स्फूर्ति स्पष्टï परिलक्षित होती है। यहां से हिन्दी साहित्य नये मोड़ पर खड़ा हो जाता है और यद्यपि वह पुरानी परंपराओं से एकदम विच्युत नहीं हो जाता तथापि उसमें रूप और शोभा के प्रति रूग्ण आकर्षण का अभाव है। रूप और शोभा में वह दैवी ज्योति देख सकता है और अपने पाठकों को ऊंचे धरातल पर बैठाकर तलदेश की गंदगी से दूर रख सकता है। इस साहित्य में कृत्रिमता का अभाव है, सहज-सरल मानव जीवन के प्रति आस्था है।
       मीराबाई भक्ति काल की कवियित्री है। उनके जीवन और कार्यों के प्ररिप्रेक्ष्य में उपर्युक्त विचार सटीक है। आज भारत में स्वतंत्रता के बासठ वर्षों बाद भी भारतीय नारी शोषण और अत्याचार का शिकार है। नारी शिक्षा के द्वार खुले हुए हैं। राजनीति, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उसकी सहभागिता बढ़ी हैं। यदा कदा उच्च पदों पर आसीन भी हों जाती हैं। इन सबके बावजूद आज भी भारतीय नारी गुलामों जैसी जिन्दगी जीने को विवश हैं। पढ़ लिख कर भी यातनाओं को चुपचाप सहन कर लेती हैं। नारी मुक्ति और नारियों के अधिकारों के लिए प्रयास का ढिंढोरा पीटा जाता है फिर भी नारी वहीं की वहीं है। सोलहवीं शताब्दी की नारी और वर्तमान की नारी की स्थिति में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया हैं। इसके पीछे के कारण को भी समझा जा सकता है। श्री मद्ïभागवतगीता में कहा गया है- उध्दरेदात्मनात्मानम्- अर्थात्ï स्वयं का उद्धार स्वयं के द्घारा ही हो सकता है। नारी जाति अपनी कठिनाईयों और शोषण से मुक्त स्वयं के प्रयासों से ही हो पा सकती है और इसके लिए मीराबाई का जीवन चरित्र उत्प्रेरक का काम कर सकता है परन्तु यह तथ्य भी सत्ïत दृष्टïव्य है कि मीरा का जीवन-वृत्त मुक्तनारी की स्वेच्छाचारिता नहीं है, वरन्ï नारी मुक्ति की भारतीय पीठिका पर शंखनाद की शुरूआत हैं। नारी स्वेच्छाचारिता के अंतर को ध्यान में रखकर ही मीरा-काव्य को नारी चेतना के प्रेरणार्थक कहा जा सकता हैं। इस तरह मीरा के व्यक्तित्व और कृतीत्व का अध्ययन नारी जागरण के परिप्रेक्ष्य में किया जाना हितकर साबित हो सकता हैं।
संदर्भ ग्रंथ :-
1. प्रेम दीवानी मीरा - लेखक डॉ गिरिराज शरण अग्रवाल
2. हिन्दी साहित्य का इतिहास - सम्पादक डॉ नागेन्द्र
3. हिन्दी साहित्य उदï्भव और विकास - डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी
4. वर्तमान परिवेश में भक्ति काव्य की प्रासंगिकता - डॉ सूर्यकान्ता अजमेरा, डॉ. बापूराव देसाई
5 . मीरा की प्रासंागिकता - सम्पादक - डॉ. विनय कुमार पाठक
पता
ग्राम - फरहद (सोमनी), 
जिला - राजनांदगांव (छग)

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