इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 25 जून 2013

धुंए की लकीर



  • श्रीमती निर्मला बेहार

- मम्मी - मम्मी, देखिए आज फिर वी. के. अंकल ने मुझे चाकलेट दिया है। चार वर्षीय निकी अपनी मम्मी सुनंदा का आंचल खींच कर कह रही थी। लेकिन सुनंदा थी कि अपने ही काम में व्यस्त थी। शाम के पांच बजने वाले थे यही समय उसके पति राजेश के दफ्तर  से लौटने का था। सुनंदा की काफी पहले से यह आदत बन गई थी कि शाम होते ही वह सजधज कर दरवाजे पर खड़ी अपने पति की प्रतीक्षा करती। राजेश उसे देखते ही प्रसन्न हो उठता। अनेक बार वह व्यक्त भी कर चुका था कि दिन भर दफ्तर में उबाऊ कार्य करते - करते वह थक जाता है। घर के दरवाजे पर सजी धजी पत्नी को देखते ही उसकी थकान गधे के सिर से सींग की भांति गायब हो जाती है। राजेश को अच्छा लगता था इसलिए सुनंदा प्रतिदिन शाम सजधज कर दरवाजे पर खड़ी पति की प्रतीक्षा करती।
राजेश घर आते ही चारों तरफ खोजी दृष्टिï डालता, साफ सफाई पसंद राजेश यह बिलकुल बर्दास्त नहीं कर सकता था कि सोफा सेट के गद्दे आड़े - तिरछे पड़े हो, घर में चप्पले इधर उधर पड़े हो, बेड की चादर सिलवट युक्त हो। यदि ऐसी स्थिति रहती तो बिना कहे राजेश स्वयं व्यवस्था में जुट जाता। राजेश का मौन रह कर यह कार्य करना सुनंदा को आपराधिक भावना से ग्रसित कर देता था। इसलिए यथा संभव सुनंदा राजेश को कोई अवसर देना नहीं चाहती। आज भी सुनंदा घर की साफ - सफाई को फिनिसिंग टच दे रही थी और उधर निकी बार - बार आंचल खींच - खींच कर वी. के. अंकल की दी चाकलेट दिखाने के लिए आतुर थी। सुनंदा ने निकी की ओर ध्यान दिया। उसके हाथ में मिल्क चाकलेट देख सुनंदा बोली - वह कौन से वी. के. अंकल है बेटा जो तुम्हें प्रतिदिन इतनी महंगी चाकलेट देते रहते हैं। आज तक तुमने अंकल से हमारा परिचय नहीं कराया।
- मम्मी, हमारे घर के सामने ही तो अंकल रहते हैं। अभी कुछ दिन पहले जिनका सामान आया था। वे ही तो हमारे बी.के. अंकल है। बहुत अच्छे अंकल है हमारे। निकी ने कहा।
- तुम्हारा जन्म दिन आने वाला है। उस समय ख्याल रखना, तुम्हारा वी. के. अंकल को भी पार्टी में बुला लेंगे। उन्होंने कहा और तैयार होकर दरवाजे पर जा खड़ी हुई। अपने पति की प्रतीक्षा में पलक बिछाये। सुनंदा को क्या पताकि दो आँखें उसे सामने वाले बंगले की खिड़की से खा जाने वाली निगाहों से देख रही है। आज नहीं पिछले आठ - दस दिनों से ये आँखें इसी तरह घूरती रही है। सुनंदा इस सबसे बेखबर राजेश की प्रतीक्षा करती दरवाजे पर खड़ी थी। दूर से राजेश दिखाई दिया। प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुई। राजेश के थके पावों में मानो गति आ गई हो, उसका बुझा - बुझा सा थकान भरा चेहरा प्रफुल्लित हो उठा। भोर होते ही जैसे तोर लुप्त हो जाते हैं। उसी तरह राजेश की थकान गायब हो गई।
राजेश मुंह - हाथ धोकर, शाम की चाय पत्नी के साथ पीकर सुनंदा के साथ घुमने निकल पड़ा। आज उनके साथ निकी नहीं था। वह अपने वी. के. अंकल के बंगले में खिलौने से खेल रही थी। खिलौने में एक गुड़िया और दो गुड्डïे थे। चाबी भरने पर गुड़िया बारी - बारी से दोनों गुड्डïों के पास जाती और जिस गुड्डे के पास आकर रुक जाती, निकी तालिया बजा - बजा कर बी. के. अंकल से कहता - इन दोनों की शादियाँ करवा दो अंकल। वी. के. अंकल और निकी में कभी बाजी लग जाती कि गुड़िया उनके बताये गुड्डïे के पास ही रुकेगी। घंटों निकी अपने अंकल के साथ इसी प्रकार के खेल खेलता रहता। सुनंदा जब अपने पति के साथ संध्या भ्रमण के लिए निकलती तो खिड़की से उसे देखते बी.के. की छाती पर सांप लोटने लगता।
निकी का जन्म दिन आया अत: उसके माता - पिता ने एक छोटा सा आयोजन किया, निकी ने दोस्तों के अलावा अपने विशेष परिचितों को बुलवाया था। उन्होंने वी. के. को भी बुलाया। वी. के. को मौके की तलाश कि कब एकांत क्षण मिले और वह अपना बहुमूल्य उपहार निकी को उसकी माँ की उपस्थिति में दे दे, निकी ने अपनी माँ से वी. के. अंकल का परिचय कराया। वी. के. को देखते ही सुनंदा के मुंह से अनायस निकल गया - अरे वीरेन्द्र, तुम। तुम्हीं हो निकी के वी. के. अंकल ? मुझे क्या पता था कि निकी जिनकी इतनी तारीफ किया करता था, वह तुम्हीं हो। हमारे बचपन के पड़ोसी।
- आज भी आपका ही पड़ोसी हूं सुनंदा जी।
- यह क्या सुनंदा जी, सुनंदा जी लगा रखे हो। आओ, तुम्हें अपने पति से मिलवाऊं।
राजेश उससे मिल कर बहुत प्रसन्न हुआ तथा उसे घर आने का निमंत्रण दे डाला। राजेश का निमंत्रण पाकर वी. के. कभी - कभी सुनंदा के घर पहुंच जाता। सुनंदा अपने बचपन के परिचित व्यक्ति से मिल कर बहुत प्रसन्न होती। निकी अपने खिलौने लेकर अपने अंकल के पास बैठ कर घंटों खेला करती। बी. के . द्वारा लाये गये खिलौने भी इसमें थे। वी. के. अंकल, चलिए छुपी - छुपा खेलते हैं। निकी ने कहा।
- नहीं बेटे, आज नहीं, फिर कभी खेलेंगे। वी. के. अंकल कहते।
सुनंदा ने निकी को समझाया- यह तुम्हारा अंकल नहीं, मामा कहा करो इन्हें। लेकिन निकी हमेशा निकी ही कहती।
वी. के. का सुनंदा के घर आना बढ़ता ही गया। पास में होने के कारण दिन में दो - तीन बार भी आ जाता था। सुनंदा के घर का छोटा - मोटा काम भी निपटा दिया करता था। सुनंदा उसे बचपन से ही भाई मानती थी। अत: आज भी वह उसे भाई के रुप में देखती थी परन्तु बी. के. का मन इस रिश्ते को स्वीकार न बचपन में कर पाया और न अब कर पाता था।
एक बार वी. के. की माँ ने उससे छेड़ने के तौर पर कहा था कि सुनंदा के साथ हमेशा खेलता है। मैं उसे अपने घर की बहू बनाकर ले आऊंगी। माँ के उस वाक्य ने उसके दिल पर गहरी छाप छोड़ दी। तब से सुनंदा को अपने जीवनसंगिनी के रुप में देखता था।
नियती के खेल को कौन जान सकता है। राजेश बाजे - गाजे के साथ बारात लेकर आया और सुनंदा को ब्याह कर ले गया। हारे जुआरी की तरह मूक दर्शक बना वह देखता ही रहा। पैंतीस साल की उम्र हो चली किन्तु बी.के. ने शादी नहीं की थी आज सुनंदा से उसकी मुलाकांत हो गयी। मुरझाये हुए घाव फिर से हरे हो गये। मन में अजीब तरह की टीस होने लगी। सुनंदा के घर जाने के लिए बस बहाने की देर थी। उसे पहुंचने में देर नहीं लगती थी।
वी. के. का इस तरह घर में समय - बेसमय आना राजेश को अच्छा नहीं लगता था। राजेश आफिस से आने के समय भी वी. के. घर में विराजमान रहता, उसकी लच्छेदार बातों से सुनंदा अनायस प्रभावित हो जाती। बीच - बीच में उसके चाय -पानी का भी बंदोबस्त करती रहती। राजेश को यह सब अच्छा नहीं लगता। वी. के. का जितना अधिक घर में घुसपैठ होता राजेश अपने ही घर से उतना ही दूर हो जाता। इतने प्यार से संजोया उसका अपना घर उसे मात्र सराय लगने लगा। आधे से अधिक समय वह घर से बाहर ही रहता, घर में आता भी तो नहीं के बराबर। सुनंदा से उसकी बातें होती। निकी बातें करती तो सिर्फ वी. के. अंकल के बारे में। सुनंदा, राजेश के इस बदलाव को स्पष्टï महसूस करती थी लेकिन वी. के. को इस तरह से अचानक आने के लिए मना कर देना, उसे मुनासिब नहीं लगता था।
हरे - भरे सुन्दर महकते हुए फुलवारी में एक ऐसा पौधा आ लगा था जिसमें न तो फूल थे और न ही सुगंध। सिर्फ कांटे ही कांटे थे। उनके दाम्पत्य जीवन में एक ऐसी अनदेखी दरार पड़ चुकी थी जिसे मिटाना एक कठिन काम प्रतीत होने लगा। वी. के. ने राजेश के मन में एक ऐसी चिंगारी छोड़ दी थी जिसमें धुंआ निकलता रहता और इस धुंए की कड़ुवाहट सारे प्यार में छाता चला गया। चिंगारी से आग निकलने ही वाली थी कि सुनंदा की सहेली प्रीति ने उनकी डूबती नैया को सहारा दिया और साहिल पे ला खड़ा किया।
प्रीति अपने आफिस के काम के सिलसिले में इलाहाबाद आई थी। प्रीति जब भी यहां आती सुनंदा के घर ही रुकती। सुनंदा के घर का माहौल प्रीति को कुछ अटपटा सा लगा। राजेश सुव्यवस्थित व स्वच्छ वातावरण के कायल थे परन्तु इस बार सुनंदा का शीशे सा चमकता घर कूड़ों से भरा प्रतीत होने लगा।
जल्दी - जल्दी अपना - अपना काम निपटा सुनंदा व प्रीति पलंग पर आ पड़ी और लगी कहने - सुनने एक दूसरे की व्यथा - कथा। इस बार सुनंदा ने अपनी राम कहानी चालू की प्रीति जिस आग की तपिश से तुम पिछली साल विदग्ध थी उसी आग से इस वर्ष मैं तप रही हूं। मुझे इस आग से बस तू ही बचा सकती है प्रीति। ऐसा कह सुनंदा फूटफूट कर रोने लगी।
- कुछ बतायेगी भी या बस यूं ही रोती रहेगी। कुछ तो बता सही। प्रीति ने पूछा।
- पड़ोस में एक लड़का है वी. के.। जिसका घर में आना - जाना राजेश को अच्छा नहीं लगता। बचपन में हमारे पड़ोसी थे। इस बात से घर आना मुझे अच्छा नहीं तो बुरा भी नहीं लगता। राजेश का स्वभाव तो तुम जानती ही हो। मुंह से कुछ नहीं कहते। अंदर ही अंदर जलते हैं। करीब तीन महीने से हम लोग तलाकशुदा पति - पत्नी की तरह रहते हैं। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी हम लोग ऐसा लगता है मानों हजारों मील दूर रहते हो। सुनंदा ने बताया।
इतनी बातें हो ही रही थी कि वी. के. भी वहां पहुंच गया। वी. के. को देखते ही प्रीति को ऐसा लगा मानों हजारों चिटियाँ प्रीति के शरीर को एक साथ काट रहे हैं। वह काठ की मूर्ति की तरह अपलक वी. के. को देखने लगी। वी. के. को देखने से ऐसा प्रतीत होता रहा था कि उसके शरीर से किसी ने सारे रक्त  निचोड़ लिया हो। वह उल्टे पाँव लौट अपने घर आ गया और सामान बांधने लगा।
प्रीति कुछ संयत हुई और सुनंदा को बताया कि यह तो वही युवक है जिसके कारण पिछले साल मैं आकांत थी और अपने पति से अलग रहने का निर्णय भी ले लिया था।
  • 370, सुन्दर नगर, रायपुर छ.ग.

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