इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

लोग जो नाकाम

- ज्ञानेन्द्र साज -
लोग जो नाकाम हो करके जिए
उम्र भर बदनाम हो करके जिए
खास न बन पाये जो इस दौर मे
वह सभी बस आम होकर जिए
प्यार था लबरेज जिनके दिल में वो
प्यार में बेदाम होकर जिए
जो न जी पाये हैं अमनो - चैन से
मौत का अंजाम होकर के जिए
वोट को सीढ़ी बनाके जो चढ़े
बस वही गुलफाम होकर के जिए
ले गई उनको कहाँ तिश्नालबी
साज जो बस जाम होकर के जिए
  • संपादक - जर्जर कश्ती, 17/212, जयगंज, अलीगढ़ [उ. प्र.]

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