इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 19 जून 2013

भगवान नहीं कोई


  • ज्ञानेन्‍द्र साज 
जीवन की कहानी का उत्थान नहीं कोई
मन को खुशी दे ऐसा सामान नहीं कोई।
है इससे भी जि़यादा हैरत की बात कोई
अरबों की आबादी में इन्सान नहीं कोई।
वीरानगी का अपनी क्या जिक्र करें हम भी
दिल है उदास बस्ती, मेहमान नहीं कोई।
औरों के ही कांधों पे लदे हुए हैं सब ही
अब आदमी की अपनी पहचान नहीं कोई।
इस दौरे सियासत में पैसे की हवस इतनी
सब लूट में लगे हैं, नादान नहीं कोई।
मां - बाप बुजुर्गी में अब गैर हो गए हैं
अपने ही घर में उनका सम्मान नहीं कोई।
आमदनी एक रूपया खर्चा है तीन रूपया
इस दौर में जीना भी आसान नहीं कोई।
रहबर तमाम भटके, रहजन ही बन गए हैं
अब इनकी रहजनी में व्यवधान नहीं कोई।
हर ओर बेईमानी हर चीज में मिलावट
अब शेष किसी में भी ईमान नहीं कोई।
भक्तों की पुकारों पर अब आए भी तो कैसे
ऐ साज अब तो लगता है भगवान नहीं कोई।
  • संपादक - जर्जर कश्‍ती,17/212, जयगंज, अलीगढ़

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