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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 19 जून 2013

भगवान नहीं कोई


  • ज्ञानेन्‍द्र साज 
जीवन की कहानी का उत्थान नहीं कोई
मन को खुशी दे ऐसा सामान नहीं कोई।
है इससे भी जि़यादा हैरत की बात कोई
अरबों की आबादी में इन्सान नहीं कोई।
वीरानगी का अपनी क्या जिक्र करें हम भी
दिल है उदास बस्ती, मेहमान नहीं कोई।
औरों के ही कांधों पे लदे हुए हैं सब ही
अब आदमी की अपनी पहचान नहीं कोई।
इस दौरे सियासत में पैसे की हवस इतनी
सब लूट में लगे हैं, नादान नहीं कोई।
मां - बाप बुजुर्गी में अब गैर हो गए हैं
अपने ही घर में उनका सम्मान नहीं कोई।
आमदनी एक रूपया खर्चा है तीन रूपया
इस दौर में जीना भी आसान नहीं कोई।
रहबर तमाम भटके, रहजन ही बन गए हैं
अब इनकी रहजनी में व्यवधान नहीं कोई।
हर ओर बेईमानी हर चीज में मिलावट
अब शेष किसी में भी ईमान नहीं कोई।
भक्तों की पुकारों पर अब आए भी तो कैसे
ऐ साज अब तो लगता है भगवान नहीं कोई।
  • संपादक - जर्जर कश्‍ती,17/212, जयगंज, अलीगढ़

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