इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 12 जून 2013

भंवरजाल

  • भावसिंह हिरवानी 
आखिर वह दिन भी आ ही गया जिसकी कल्पना करके ही रामसाय  बेचैन हो उठते थे. शाम को थोड़ी औपचारिकता के बाद सेवा निवृत्ति का आदेश पाकर उनका चेहरा बुझ सा गया था. य द्यपि उपक्स्थत कमर्चारियों के सामने उन्होंने अपनी मन क्स्थति छुपाने का भरसक प्रयास किया था मगर वे सफल नहीं हो पाये थे.
आवास में पहुंच ते ही वे गहरे अवसाद में डूब गये थे. कै से कटेगी उनकी शेष जिंदगी ? इसी बात की चिंता उन्हें खाये जा रही थी. य हां उनकी दिनच यार् घड़ी की सुई के साथ बंधी हुई थी. सुबह सात बजे तक आराम से सोकर उठते फिर हाथ - मुंह धोकर टहलते हुए होटल में जाकर चाय  पी आते, कभी मन हुआ तो पेपर भी देख लेते, वैसे उन्हें पेपर पढ़ने का शौक नहीं था. किसी वैरागी की तरह वे अपने आप में ही मगन रहते थे. दीन दुनिया में यिा हो रहा है, इससे उन्हें मतलब नहीं था.
इसके बाद नहा - धोकर खाना खाने होटल च ले जाते. फिर वहीं से आफिस में जाकर बैठ जाते थे. शाम को आफिस के बाद फ्रेश होकर निकलते. एकाध घंटा राम - जानकी मंदिर में बैठकर अराधना करते और बाजार घूमते हुए होटल में खाना खाकर अपने आवास में लौट आते. फिर जब तक नींद नहीं आती अपने अतीत और भविष्य  के ताने - बाने में उलझे रहते. मगर अब सेवा निवृत्ति के बाद वे दिन भर यिा करेंगे ? कैसे दिन कटेगा ? उन्हें समझ नहीं आ रहा था.
कुछ देर तक निढ़ाल से बिस्तर पर पड़े रहने के बाद वे हाथ - मुंह धोकर बाहर निकल आये थे. इकतीस मई की य ह शाम इस शहर में उनकी आखिरी शाम थी. कल वे इस शहर को छोड़कर हमेशा के लिए च ले जायेंगे. फिर शाय द य हां कभी न आना हो. इसलिए आज वे अंतिम बार मंदिर जाकर दशर्न कर लेना चाहते थे. नित्य  मंदिर जाने के कारण वहां के पुजारी से भी उनकी घनिþता बढ़ गई थी. वे रामसाय  की मनोदशा देख भांप गये थे कि इन्हें सच मुच  कोई भारी गम खाये जा रही है. एक दो बार उन्होेंने रामसाय   कुरेदा भी था - रामसाय  जी, आप भगवान के समक्ष्ा भी अपने मन की गांठ नहीं खोलेंगे तो फिर कहां जायेंगे ?
जवाब में रामसाय  हर बार हंसकर टाल गये थे. इस वI सोच  रहे थे, आज उन्होंने पूछा तो जरूर कह देंगे. जब वे मंदिर पहुंचे तो पुजारी जी संध्या आरती करके सामने द्वार पर ही खड़े थे. रामसाय  ने प्रणाम किया तो उन्होंने दोनों हाथ उठाकर आशीवार्द दिया था - आओ भगत जी, प्रभु आपको दीघार्यु करें.
रामसाय  दोनों हाथ पसारते हुए बोले थे - य ह आपने यिा आशीवार्द दे दिया पुजारी जी ? मैं आपके हाथों आखिरी बार भगवान का प्रसाद लेने आया था. लम्बी उम्र लेकर मैं यिा करूंगा ?
पुजारी तुरंत प्रसाद की थाली लेने पीछे मुड़ गये थे. फिर प्रसाद का दोना उनके हाथों में रखते हुए बोले - रामसाय  जी, आज तो अपने हृदय  का बोझ उतार दीजिए. जिसके दुख में आप दीघर् जीवी होना नहीं चाहते.
- हां पुजारी जी, आज तो कहकर ही जाऊंगा. सुनकर आपको आघात लगेगा इसी भय  से अब तक नहीं कह सका था. वास्तव में मैं देवी - देवताओं की कृपा का मारा हूं. इनकी दिन - रात पूजा - भIि का मुझे य ही फल मिला कि मेरी गृहस्थी च ौपट हो गई और मेरी जिन्दगी नकर् बनकर रह गई. रामसाय  की बातें सुन पुजारी हैरत से उनकी ओर देखने लगे.
- आपको आश्च य र् हो रहा है न ? मगर मैं भुI - भोगी हूं पुजारी जी. आज बीस साल से अधिक हो गये, मेरी पत्नी मुझे पति मानने से इंकार करती है. कहती है - मेरे भीतर मां शारदा बिराजती है. अब मैं तुम्हारी पत्नी नहीं रही. तब से मैं मारा - मारा फिर रहा हूं. आप पूछते थे न कि छुuी में मैं घर यिों नहीं जाता ? यिोंकि उस घर में मेरी पत्नी की जगह मां शारदा रहती है. जिससे मैं आंख भी नहीं मिला सकता, छूने की बात तो दूर रही. इतना कहकर रामसाय  कुछ के लिए चुप हो गये थे. इस वI उनके चेहरे पर दुख और निराशा के भाव उभर आये थे. रामसाय  का य ह रहस्योद्घाटन अत्यंत हैरत अंगेज था.
रामसाय  भगवान की मूतिर् की ओर इशारा करके फिर बोलने लगे - पुजारी जी, जब भगवान राम को च ौदह वषर् के लिए बनवास जाना पड़ा था तब भी मां सीता उनके साथ थी. और जब राजा रावण के द्वारा  सीता हर ली गई तब ये कितने व्याकुल होकर उनकी याद में तड़फते थे. जंगल के पशु - पक्ष्ाी, पेड़ - पौधों से रो - रोकर पूछते थे कि उन्होंने सीता को कहीं देखा तो नहीं है ? मगर मैं तो बीस सालों से अपनी पत्नी के लिए तड़फ रहा हूं. रोज इनके आगे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता हूं - हे अंतयार्मी सवर्शIिमान भगवान मेरी पत्नी को लौटा दो या फिर मुझे मौत दे दो. अब और नहीं जीना चाहता मैं .. लेकिन पता नहीं, इन्हें मुझ पर दया यिों नहीं आती ? अच्छा, अब च लता हूं पुजारी जी. इतना कहकर रामसाय  वहां से निकल गये थे. और पुजारी जी मूक खड़े जाते हुए देखते रहे. कुछ कहने - सुनने की हिम्मत उनमें नहीं थी.
कुछ देर इधर - उधर टहलने के बाद वे होटल में खाना खाकर अपने आवास में लौट गये थे. रात्रि में जब तक जागते रहे भविष्य  की चिंता उनके मन - मक्स्तष्क में हावी रही. सबेरे नींद खुली तो बेमन से उठे और नहाने - धोने के बाद अपने कपड़े - लत्ते समेट कर बैग में भर लिया. य हां आते समय  भी वे इसी बैग को लेकर आये थे. किराये के पलंग - गद्दे तथा अन्य  सामानों से उनका गुजारा हो जाता था. खाना बनाना उन्हें आता नहीं था. अत: होटल में ही खाते थे और अब सेवा निवृत्त हो जाने के कारण उन्हें विवश होकर घर लौटना पड़ रहा था.
कोंडागांव से बस में आठ घंटे का सफर तय  करके वे बिलासपुर पहुंचे थे. य हीं उनका अशियाना था. घर पहुंच  कर वे लस्त - पस्त  अपने कमरे में बिस्तर पर लुढ़क गये थे. मगर देवकी ने उनकी ओर झांकना मुनासिब नहीं समझा था. मानों रामसाय  कोई अजनबी हों और उसे उनसे कोई लेना देना न हो. थोड़ी देर यूं ही पड़े रहने के बाद वे उठ बैठे थे. देवकी के इस उपेक्ष्ाा से भीतर ही भीतर आहत हो गये थे. बाहर निकल कर हाथ - मुंह धोये और पानी पीकर फिर लेट गये. पर मन शांत नहीं हुआ था. य ह कैसी मां है जिसने अपने ब‚ों का घर उजाड़कर उनका सुख - चैन छीन लिया है. आखिर एक ही छत के नीचे किसी अनजान व्य Iि की तरह अबोले रहकर कैसे जी सकेंगे वे ? मन में कई तरह के विचार उठते थे. एक बार तो उनका जी हुआ कि डंडा लेकर जाये और निमर्मता पूवर्क देवकी और उसके देवी - देवताओं को ठोंक - पीट दे. अधिक से अधिक यिा होगा उनकी मौत हो जायेगी. वैसे भी अब इस जीवन में रह ही यिा गया है ? फिर दूसरी बार सोच ने लगे कि यिों न मां शारदा के पैर पकड़ कर बिनती करे कि वह उसकी पत्नी को आजाद कर दे, पर वे ऐसा कुछ नहीं कर सके थे. इसी उधेड़ बुन में उलझे रात हो गई थी. और वे उठकर खाना खाने होटल च ले गये थे.
जब लौटे तो काफी देर हो चुकी थी. दिन भर के थकान के बावजूद उनकी आंखों में नींद नहीं थी. आखिर कहां चूक गये वे ? यिों उनकी जिंदगी आज इस कदर लाचारी और बेबसी के कगार पर खड़ी हो गई है ? अपने जीवन के बीते पत्तों को उलटते - पुलटते वे गहरे सोच  में डूब गये थे.
य ह बात नहीं कि देवकी शुरू से ही सनकी रही हो. बयाह कर जब वह पहली बार उनके घर आयी थी सब के सब बहुत खुश थे. नई नवेली होने के बावजूद वह दो दिन में घर के सारे सदस्यों के बीच  घुल मिल गई थी. ऐसा लगता ही नहीं था कि वह पराये घर से आयी हो मां खुश थी कि बहू अच्छा संस्कारी घर से आयी है. बड़े सबेरे उठना और नहा - धोकर पूजा - पाठ करके रसोई - च ौका तैयार करना फिर सबको नास्ता - पानी देना, दोपहर और शाम का भोजन भी उन्हें बिल्कुल समय  पर मिल जाता था.
इसके अलावा छुuी खत्म हो जाने पर जब रामसाय  को अपनी नौकरी पर जाने की बात आयी तो देवकी स्वयं बोली थी - मैं एक - दो महीने य हीं गांव में मां - बाबूजी के साथ रहूंगी. फिर तो सारी उम्र आपके साथ ही रहना है. सुनकर गदगद हो गये थे रामसाय  के माता - पिता, रामसाय  को भी बहुत अच्छा लगा था.
फिर दो महीने बाद वे देवकी को लेकर अपने शासकीय  आवास में बिलासपुर आ गये थे. और सबसे पहले वे चारों धाम की यात्रा पर निकल पड़े. हर जगह देवी - देवताओं का दशर्न करके अपने सुखी वैवाहिक जीवन का आशीवार्द मांगते रहे) तब उनकी जिंदगी में चारों ओर बहार ही बहार छायी हुई थी. ऐसा जान पड़ता था मानो संसार में दुख नाम की कोई चीज ही नहीं है. दो - तीन साल तो सैर - सपाटा  में बीत गये फिर जब उनका पहला ब‚ा दिलीप आया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. खूब धूम धाम से उसका नामकरण समारोह मनाया था उन्होंने.
इसके दो साल बाद नीलेश और फिर अवधेश का जन्म हुआ था. वे इन ब‚ों की बालक्रीड़ा देख खुशी से फूले नहीं समाते थे. ज्यों - ज्यों ब‚े बड़े हो रहे थे वे उनके भविष्य  को लेकर तरह - तरह के सपने बुनते और उसी में खोये रहते, इन सब के बीच  भी देवकी मां शारदा की आरती वंदना करना कभी नहीं भूलती थी. उसका Òढ़ विश्वास था कि मां शारदा की कृपा से ही उसे रामसाय  जैसे सीधा सरल, शांत स्वभाव का इंजीनिय र पति मिला है तथा उनके तीन पुत्र हुए हैं.
लेकिन समय  सदा एक सा नहीं रहता. जीवन में सुख - दुख दोनों ही धूप - छांव की तरह लगे रहते हैं. इसी बीच  अल्प वषार् के कारण गांव मे फसल च ौपट हो गई थी और परिवार वालों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई थी अत: साल भर तक रामसाय  को उन्हें रूपये भेजने पड़े थे. इसके अतिरिI उन्होंने छोटे - भाई - बहनों की शादी में पिता को सहयोग किया था जिसके लिए उन्हें बाजार से कजर् लेना पड़ा था.
देवकी अपने पति की उदारता से चि ढ़ गई थी. घर वालों की वजह से कजर्दार हो गये थे. अब इसी बात को लेकर उन दोनों के बीच  असिर झगड़ा होने लगा था. विवश होकर रामसाय  को मां - बाप से संबंध तोड़ लेना पड़ा था. मन तड़फता भी था तो वे खामोशी से सह लिया करते थे. यिोंकि देवकी घर वालों के नाम से ही गुस्सा से तमतमा जाती थी. मगर उसे अपनी गलती बिल्कुल दिखाई नहीं देती थी.
गांव की सीधी - सादी देवकी शहर में आकर अति महत्वाकांक्ष्ाी और फिजूलखचीर् हो गई थी. य हां आधुनिकता का च काच ौंध तो था ही ऊपर से साहब की पत्नी होने का दपर्. तिस पर मां शारदा की पुजारिन. नीम पर करेला च ढ़े वाली बात थी. घर के छोटे - मोटे काम जिन्हें आसानी से किये जा सकते थे उनके लिए भी उन्हें रूपये खच र् करने पड़ते थे. शारीरिक श्रम के अभाव में जब - तब उसकी तबिय त भी खराब हो जाती थी. फिर ब‚ों को स्वयं से बड़े इंजीनिय र बनाने की चाह में उन्हें इंक्ग्लस मीडिय म के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ा रहे थे. इसी में उनके हजारों रूपये ट्यूशन, बस किराया और फीस में ही खच र् हो जाते थे. परिणाम स्वरूप रामसाय  लगातार कजर् में डूबते च ले गये थे.
दुभार्ग्य  से इसी बीच  उनका स्थानांतरण बरगी जलाशय  हो गया था. जिसके कारण उनकी क्स्थति और बिगड़ गई थी, यिोंकि अन्य त्र जाने से ब‚ों की पढ़ाई प्रभावित होने की संभावना थी. कुछ महीने बाद शासकीय  आवास खाली करने का नोटिस मिला तो वे और अधिक परेशान हो उठे. अत: निणर्य  लिया गया कि बैंक से कजर् लेकर स्वयं का मकान बनवा लिया जाए. और य ही किया गया . उनका खुद का मकान तो बन गया मगर वे गले तक कजर् में डूब गये थे और दुभार्ग्य  से वे अंत तक इस कजर् से मुIि नहीं पा सके थे यिोंकि ब‚ों की पढ़ाई का खच र् निरंतर बढ़ता जा रहा था जिनकी पूतिर् करना उनके बूते की बात नहीं थी लेकिन पढ़ाना तो था ही.
य द्यपि उनके यार दोस्तों ने उन्हें टोका भी था - यार चादर देखकर पैर पसारना चाहिए. कजर् लेकर दिन - रात चिंता में डूबे हो. न ठीक से खा सकते हो न चैन से सो सकते हो. अपने ब‚ों के लिए सब करते हैं, पर तुम्हारी तरह पागल नहीं हो जाते । मगर वे एक कान से सुनते और दूसरे से निकाल देते थे. उनका दिमाग हमेशा इसी उधेड़ बुन में उलझा रहता था कि कहां से कैसे रूपये लेकर खच र् पूरा करें. लेकिन ब‚ों की हर मांग पूरी करते थे. कई बार तो उनकी क्स्थति अत्यंत दय नीय  हो जाती थी और उन्हें अपने साथियों से खच र् के लिए उधार लेना पड़ता था. बरगी और बिलासपुर दोनों स्थानों की व्य वस्था के कारण  वैसे ही उनकी कमर पूरी तरह से टूट गई थी.
उन्हें संतोष था केवल इस बात का कि उनके दोनों लड़के खूब मन लगाकर पढ़ रहे थे और अच्छे अंक लेकर उत्तीणर् होते थे. इसी बीच  देवकी उन्हें चारों धाम की यात्रा के लिए तंग करने लगी. जबकि इसके पहले वे तीन यात्रा कर आये थे. उनके इंकार करने पर देवकी बगावत पर उतर आयी थी - आप नहीं ले जायेंगे तो मैं अकेली च ली जाऊंगी. मां शारदा मुझे बुला रही है. बार - बार सपने में आकर मुझे अपने पास आने को कहती है.
उन्हें संतोष था केवल इस बात का कि उनके दोनों लड़के खूब मन लगाकर पढ़ रहे थे और अच्छे अंक लेकर उत्तीणर् होते थे. इसी बीच  देवकी उन्हें चारों धाम की यात्रा के लिए तंग करने लगी. जबकि इसके पहले वे तीन यात्रा कर आये थे. उनके इंकार करने पर देवकी बगावत पर उतर आयी थी - आप नहीं ले जायेंगे तो मैं अकेली च ली जाऊंगी. मां शारदा मुझे बुला रही है. बार - बार सपने में आकर मुझे अपने पास आने को कहती है.
विवश होकर उन्हें देवकी के साथ जाना पड़ा था. वहां पहुंच ते ही देवकी माता के च रणों में कई घंटे तक अधर् मूच्छार् की क्स्थति में दंडवत पड़ी बड़बड़ाती रही - नहीं मां, नहीं. मैं वही करूंगी जो तुम आदेश दोगी. आज से ही मैं सांसारिक सुख का त्याग करती हूं और अपना शेष जीवन तुम्हारी पूजा भIि में लगाऊंगी.
जब वह सामान्य  क्स्थति में लौटी तो उसकी बात सुनकर रामसाय  के होश उड़ गये थे. देवकी बोली थी - मैं मां को गृहस्थ जीवन छोड़ने का वच न दे चुकी हूं. मां शारदा मेरे भीतर शIि रूप में प्रविý हो चुकी है. आपसे संबंध रखा तो मेरी शIि क्ष्ाीण हो जायेगी, अत: आज से ही हमारे बीच  पति - पत्नी का रिश्ता खत्म.
इस पर उन्होंने प्रतिवाद किया था - मगर मैं तो एक सामान्य  इंसान हूं और मेरी बहुत सी शारीरिक एवं मानसिक जरूरतें हैं. गृहस्थी की तमाम जिम्मेदारियां भी हैं जिन्हें हम दोनों ने साथ - साथ निभाने का वादा किया था फिर मां को वच न देने से पहले तुमने इन्हीं देवी - देवताओं और अSि को साक्ष्ाी रखकर मुझे जीवन भर साथ निभाने का वच न दिया था. उसका यिा होगा ?
- मैं आपकी जिंदगी में कोई दखलंदाजी नहीं करूगी. आप अपनी इच्छा पूतिर् के लिए स्वतंत्र है. चाहे दूसरी शादी कर लें, या किसी को यूं ही रख लें. मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी. लेकिन अब मैं आपकी सेवा नहीं कर सकती.
देवकी के इस निणर्य  से रामसाय  भौच Oे रह गये थे. उन्हें कुछ समझ नहीं आया था कि यिा करें ? आखिर चुपचाप मुंह लटकाये वे देवकी को लेकर घर लौट आये थे. देवकी अब देवी हो गई थी और एकदम रामसाय  अनाथ. उसे बिलासपुर में छोड़कर वे अपने काम पर बरगी लौट गये थे.
धीरे - धीरे उनके बीच  की दूरी बढ़ती च ली गई थी और बोल चाल बंद हो गया था. ब‚े अपनी मां की जगह देवी को देखकर अचंभित थे. कई बार वे उसकी हरकतों को देखकर भय भीत हो जाते थे. य ह सब देख जिंदगी की जद्दोजहद से जूझ रहे रामसाय  की आंखों की नींद गाय ब हो गई थी.
इस घटना की लोगों की बीच  तरह - तरह की प्रतिक्क्रया हुई थी. कुछ ने कहा - रामसाय  की पत्नी पागल हो गई है.कुछ बोले - अंध विश्वास में पड़कर दिन - रात पूजा - पाठ में डूबे रहने का य ह नतीजा है. कोई मां अपने ब‚ों का घर गृहस्थी नहीं उजाड़ सकती. कुछ ने इसे सच मुच  दैवीय  शIि का प्रकटीकरण माना. रामसाय  स्वयं देवी - देवताओं के उपासक थे इसलिए वे असहाय  से सब कुछ सहने को विवश थे. लेकिन मां शारदा ने उन्हें ऐसा दंड यिों दिया ? य ह वे समझ नहीं पा रहे थे.
देखते ही देखते देवकी का शय नकक्ष्ा मंदिर के रूप में परिणित हो गया था. चारों ओर या तो देवी - देवताओं की मूतिर्यां रखी हुई थीं या फिर उनके चि त्र टंगे हुए थे. अब उसका अधिकांश समय  इसी कमरे में गुजरता था. कई बार तो उसे नहाने - खाने की भी सुधि नहीं रहती थी. माथे पर बड़ा सा लाल टीका लगाये और बाल बिखराये वह घंटों मां शारदा की मूतिर् के आगे बैठी रहती. धीरे - धीरे श्रद्वालुगण दशर्नाथर् तथा आशा - आकांक्ष्ाा लेकर आने लगे. वे भेंट -  पूजा भी दे जाते थे. उसकी ख्याति फैलने लगी और वह आस पास मां शारदा के रूप में प्रसिद्ध हो गई. घर का सारा काम कपड़ा धोने से खाना बनाने तथा खिलाना - पिलाना अब काम करने वाली बाई करती थी.
इस तरह रामसाय  की गृहस्थी पूरी तरह च ौपट हो गई थी. और वे कुछ भी कर पाने में असमथर् थे. उन्होंने देवकी के देवी हो जाने की शिकाय त अपने ससुराल में की तो उनके सास - ससुर बोले - ल„ा अब हम इसमें यिा कर सकते हैं ? वह कोई गलत तो कर नहीं रही है, जिसके लिए हम उसे समझायें. य ह तो उसके किसी पूवर् जन्म का प्रताप ही है कि उसके भीतर मां शारदा विराज रही है.
पैसों की तंगी एवं देवकी के स्वाथीर् स्वभाव के कारण रामसाय  का संबंध अपने परिवार से पूरी तरह खत्म हो गया था लेकिन जब विपत्ति की घड़ी आई तो  वे उनके पास दौड़ते हुए च ले गये. बेटे का दुखड़ा सुनकर उनके मां - बाप ने उन्हें समझाया - बेटा, तुम हमारी मानो, जब उसने तुम्हें छोड़ दिया है तब तुम यिों मोह करते हो ? तत्काल तलाक देकर छुuी पाओ. तुम्हारी दूसरी शादी कर देते हैं.
यार दोस्तों से भी उन्होंने सलाह - मक्श्वरा किया था. उनके अभिÛ मित्र दयालसिंह तो रामसाय  के ऊपर बिफर उठे थे - यार, तुम एकदम कूच ड़ आदमी हो. औरत जैसा चाहती है, नाच ते हो. कभी किसी का कहा मानते नहीं. फिर पूछते यिों हो ? मैं कहता हूं जाओ अभी दो झापड़ देकर घर से रूखसत करो. कह दो - देवी - देवता के लिए मेरे घर में जगह नहीं है. देवकी मेरी पत्नी है, वही य हां रह सकती है ... उसे मुIि दो और तुम भी स्वतंत्र जीवन जीयो. कुछ ही महीनों में जब चारो ओर से धकिा खायेगी और खाने को लाले पड़ेंगे तब सारी दैवीय  शIि हवा हो जायेगी. फिर तुम्हारे पैर पकड़ कर माफी मांगेेगी. आखिर जायेगी कहां ? जो ससुराल वाले आज उसकी तरफदारी कर रहे हैं, कल तुम्हारे सामने हाथ जोड़ कर माफी मांगेगे. आज ही तुम कोटर् में तलाक नामा हेतु अजीर् लगा दो. बहुत आसानी से तलाक मिल जायेगा. पर तुम मानोगे नहीं, य ह मैं जानता हूं. यिोंकि तुम्हारे भीतर इतनी शIि नहीं है. या तुम्हारे भाग्य  में य ह सब भोगना लिखा है.
दुभार्ग्य  से कई महीनों तक दुविधा में उलझे अनिणर्य  की क्स्थति में जीते रहे. रात को सोते समय  तरह - तरह के मनसूबे बांधते थे लेकिन दिन के उजाले में उन्हें सब अव्य वहारिक जान पड़ता था. और वे ठंडे हो जाते थे. इस तरह सब से सलाह लेने के बावजूद उन्होंने कुछ नहीं किया और उनकी जिंदगी की गाड़ी भगवान भरोसे च लती रही. सोच ते थे - ऊपर वाले जो भी करेंगे, अच्छा ही करेंगे. वैसे भी अपने सुख की खातिर वे ब‚ों से उनकी मां नहीं छीनना चाहते थे इसलिए सब कुछ सहते हुए भी वे ब‚ों के साथ देवकी को भी पाल रहे थे.
मगर अब सेवानिवृत्ति के बाद एक ही घर में अजनबी की तरह उनके दिन कैसे कटेगी ? इसी को लेकर वे परेशान थे. रात कब सोये, कब जागे, उन्हें पता नहीं च ला था. फिर भी आदत के मुताबिक य हां भी वे बड़ी देर तक सोते रहे. सात बजे के करीब उठकर हाथ मुंह धोये तो काम करने वाली बाई चाय  लेकर आ गई थी. एक क्ष्ाण के उन्हें अच्छा लगा था, काश इस बाई की जगह देवकी होती, और पहले की देवकी होती तो आज वे इस कदर दुखी और परेशान न होते. मगर उनके भाग्य  में शाय द जीवन भर भुगतना ही लिखा है. इस दुविधा की क्स्थति में उन्हें आज एक बार फिर अपने पुराने मित्र दयाल सिंह की याद हो आयी थी. चाय  पीते हुए वे उनसे मिलने का निश्च य  करके उठ खड़े हुए और नहाने - धोने में व्य स्त हो गये.
रामसाय  को अचानक आये देख दयालसिंह खुश हो गये थे - अरे, आओ ... आओ. कब आये ? उन्होंने उठकर हाथ मिलाया था.

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