इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 3 जून 2013

उलझा हुआ सबेरा है


  • जितेन्द्र ' जौहर '     
आज निराशाओं ने डाला, द्वार - द्वार पर डेरा है।
देव ! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
    सच्चाई के पथ पे मानव,
    चलने से सकुचाता है।
    अन्यायी की कारागृह में,
    न्याय बड़ा अकुलाता है।
दुर्दिन की रजनी का चहुँदिशा, दिखता प्रसृत घेरा है।
देव ! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
    खुद अपनी ही $कबर खोदता,
    खड़ा मनुज निज हाथों से।
    फूलों का सीना ज़ख्‍मी है,
    अपने सोदर काँटों से।
राजनीति ने कैनवास पर, कैसा चित्र उकेरा है ?
देव ! आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
    दिशाहीन यूँ देश कि जैसे,
    तरणी तारणहार बिना।
    चूल्हे मकड़ी के क्रीडाँगन,
    प्रजा सुपालनहार बिना।
सर्दी - गर्मी- वर्षा ऋतु में, अम्बर तले बसेरा है।
देव ! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
    हिंसा, भ्रष्ट्राचार, लूट,
    घोटालों के अंधे युग में।
    राजहंस आँसू टपकाएँ
    काग लगे मोती चुगने।
अंधकार के कुटिल जाल में, उलझा हुआ सवेरा है।
देव ! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
  • आई आर - 13 / 6 रेणुसागर सोनभद्र (उ.प्र.) 231218

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