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मंगलवार, 25 जून 2013

कफन - ऊर्जावान कहानी




  • यशवंत मेश्राम

समाज में हर स्तर पर शोषक का बोलबाला है। मानव समूह व्यक्ति हो या समाज दोनों इंसान और इंसानियत से परिभाषित है। कफन भी इंसान इंसानियत - अइंसानियत से परिभाषित है। यह सुपरमोस्ट कहानी है। जिसमें जमाने का मवाद है। उस जमाने का, इस जमाने का। जब भी पढ़ो फोड़ो पीप रिझ जाता है - विषमता का, जो सामाजिक है। समाज के कीड़े क$फन में पीप को पुन: भर देते हैं ... दूबारा - तीबारा पढ़ने के बाद, साफ - सफाई पश्चात भी चिंतन में दर्द का म$र्ज निहित रहता है। रचना वह होती है, जो जमाने की धुरी पर होती है, जिसकी पीड़ा कभी मिटती नहीं। बाकी सब धुल जाता है। कफन प्रेमचंद की ऐसी ही रचना है पर आज भी भारतीय मानचित्र पर सर्वहारा की स्थायी छाया नदारत है। घीसू माधव ऐसी ही छाया है, जो विकास क्रांति मुक्ति के लिए कहानी में सेंसैक्स पैमाना लिए हुए है। एक करोड़ के करीब आदिवासी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रहे हैं। व्यवस्था की ओर से इनकी पहचान मिटाने का कार्यक्रम लागू है। व्यवस्था कार्यक्रम आदि अद्यतन में प्रगतिशील है तो विकसित होने में कितने दिन लगेंगे ? विकसित व्यवस्था में घीसू - माधव होंगे। घीसू - माधव सहित सोनू - टोनू - मोनू से लेकर स्टार गिरानी - पीरानी, टाम टामी तक उपभोक्ता बाजारवाद की गिरफ्त में है। कफन की क्या जरुरत होगी ? प्रेमचंद के भूपति, पूंजीपति, सामंत निम्नवर्ग को न तब सर आँखों में रखते थे न आज सर आँखों में बिठाए हैं। किसी रिश्तेदार ने अपनी सतही समृद्धि से हमारी कम सतही विपन्नता को धिक्कारा है - कैसा बुरा रिवाज है जिसे जीते जी तन ढकने को कपड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफन चाहिए। प्रेमचंद ने कफन कहानी में बुधिया को कफन कपड़ा ओढ़ाया तो नहीं, पर उस कफन को वर्तमान में हटाने पर भारत की वह तस्वीर न$जर आती है, जिसमें असमानता, धर्मान्धता, भैरापन, बौनापन, अपनापन, सती - गति, बेरोजगारी, जनसंख्यावृद्धि, भूख, नग्नपन, नक्सली, आतंकवादी, बलत्कारी, महामारी, देनदारी - लेनदारी, घूंघरु, बार, बुधरु, बार, जार, मार, जाति तर्क पुरोहिति, पिंडी लिंगी है। ऐसा लगता है कफन मुर्दों को शायद जीवित विसंगतियों में किए गए नेकी - बची बचाने का लाबादा है। घीसू - माधव, बुधिया में असंगति है। अमानवीयता भरा चेहरा घीसू का है। हृदयहीनता थोथना माधव का है। अमानवीयता, हृदयहीनता का प्रेम नवीन प्रेमभाव है। इसमें भी जीवन चलता है। नया मूल्य जीवन गढ़ा जा रहा है - जो दलित है, सदियों से मारे गए हैं, दलित किए गए कलंकित किए गए। इनके पास न आसमान था न धरती थी। कुछ था ही नहीं। ऐसे लोग जीवित रहे हैं बुधिया का मरना 33 प्रतिशत है दर्शाता है। 67 प्रतिशत में जीवित घीसू - माधव प्रथम श्रेणी में है। जिनमें इंसानियत नहीं हैं। बुधिया को देखने नहीं जाते। टूटते हुए संबंधों को लात मार देना ही अच्छा है। अच्छा था घीसू - माधव अशिक्षित थे, नहीं तो आज शिक्षित दलित आवाज उठाने से भी डरते हैं। कम से कम इस प्रकार की अमानवीयता घीसू - माधव में नहीं थी। अच्छी खासी इंसानियत थी। बखूबी घीसू शोषण को असरदार रुप में समझकर समझदार हो गया था। जो बात शिक्षित जनता नहीं जानती, वह सामान्य जनता जानती है।
बुधिया के कफन को ढाकने - उघाड़ने में व्यवस्था किस हद तक स्वतंत्रता किस सीमा तक, मुक्ति किस शुक्ति तक और मनमाना कल्पना कर सोचना किस दिशा तक मीलों चलती है। परंतु मील का पत्थर नदारत होते हैं। भले ही बीच - बीच में सेंटीमीटर, डेकामीटर, हेक्टोमीटर मिल जाते हैं और कितने ही दूर किलोमीटर है। माप में अनाप है। वैचारिकता से, हमारे पास बहुत से ऐसे विचारक हैं जो बातें बड़ी - बड़ी करते हैं। किसान - मजदूरों की हिमायत करते हैं लेकिन उनके हृदय में शोषितों - दलितों के प्रति वास्तविक हमदर्दी उत्पन्न नहीं होती। जो हमदर्द है और दवा बनाते हैं, विचारों की। उनके विचार भी बेमेल है।
श्री राजेन्द्र यादव की दृष्टिï में इस कहानी में घीसू - माधव को डी हा्रूम नाइजेशन किया गया है। जिसके लिए दोषी व्यक्ति नहीं, सामाजिक विसंगतियाँ हैं।
अमानवनीय सामंती व्यवस्था मानव को दानव बनाती है। घीसू माधव जिस दिशा से आए हैं। वह कितने गर्भ में है ? ऐसा लगता है पूरी की पूरी व्यवस्था का स्थानांतरण हो। गुलामतंत्र गया, प्रजातंत्र आया। गोहना - अकोला जला, कौन मरा ? कितना सामाजिक बदलाव आया ? समानता का चेहरा लाया ? आयारा - गयाराम, राम , राम। सवर्णों का मानव हृदय कितना स्थानांतरित हुआ ? इसका मापदंड क$फन कहानी आज भी निर्धारित कर रही है।
निर्मल वर्मा का विश्लेषण सुनिए  - जिस क्षण बाप बेटे ने घर की औरत के क$फन के पैसों से शराब का कुल्लड़ मुंह में लगाया था, उस क्षण पहली बार हिन्दी साहित्य में व्यक्ति ने अपनी स्वतंत्रता का स्वाद भी चखा था, जब प्रेमचंद के समाज में व्यक्ति का जन्म हुआ। यह जन्म - मृत्यु और श्मशान की छाया में हुआ - दो पियक्कड़ हिंदुस्तानियों का मुक्ति समारोह।
यह युक्ति कैसी है। व्यवस्था कैसी है ?ï प्रेमचंद ने मृतक परिवार के व्यक्तियों को ही क$फन खरीदने बाजार भेज दिया। जबकि घीसू - माधव का कुनबा था। भई, जमा हुआ कुनबा क$फन के लिए जमीदार पर कैसे निर्भर हुआ ? सामंती व्यवस्था ने मनुष्य को मानवीयता से कंगाल कर दिया था। प्रेमचंद समाज में व्यक्ति का जन्म और उसकी स्वतंत्रता का स्वाद पैदा होना ही सामंती समाज की नंगाई दर्शा देती है। उत्तर भारत में थोड़ी - बहुत जमीन दलितों के पास होती ही है। परंतु घीसू - माधव के पास नहीं है। कुनबा कहाँ हैं ? प्रेमचंद द्वारा घीसू - माधव का कुनबा बनाना और क$फन का जुगाड़ करवाना कहानी में अर्तविरोध है ही।
दलित लेखक ओमप्रकाश बाल्मिकी ने इस कहानी के माध्यम से प्रतिक्रिया स्वरुप अपना आक्रोश व्यक्त किया है कि लेखक ने दलित पात्रों को इतना अमानवीय क्यों दिखाया, वे नितांत हृदयहीन कैसे हो सकते हैं।
बाल्मिकी जी ठाकुर का कुँआ और दूध का दाम दलित पीड़ा की सही अभिव्यक्तिवाली कहानियाँ मानते हैं। उनका मानना है कि कफन कहानी में कोई भी दलित समस्या नहीं है बल्कि दलितों की अकर्मण्यता और हृदयहीनता ही वर्णित है। यह सत्य भी है। कुनबे में बुधिया प्रसव पीड़ा से मर गई। देखने ताकने कोई नहीं आया। जिसे लोग ओमप्रकाश का आक्रोश कहते हैं, वह आक्रोश नहीं प्रेमचंद की क$फन कहानी की सच्चाई उजागर करता है। कहानी को कितना ही कलात्मक मोड़ क्यों न दिया जाये, मानवीयता, ईमानदारी भी कोई चीज होती है। जिसे स्वीकारा जाना चाहिए कालभोर - लोहामंडी आगरासच्चाई उजागर होना कड़ुवा सत्य है। कटु सत्य कोई पचाय तब तो ? बदहमी प्रकार वाले डकार मारेंगे हवा खुले तब तो ?
डॉ. धर्मवीर क$फन की बुधिया को वे अपनी कल्पना से एक बलात्कार की शिकार महिला बतलाते हैं। जिसके पेट में ठाकुर का बच्चा है। उसी बुधिया पर वे जाटकर्म का आरोप लगाते हैं।
कहानी मूलभूति में बुधिया प्रसव वेदना से पीड़ित महिला है। ब्राहा्रण स्त्री और शुद्र पुरुष से उत्पन्न संतार जार है राजेन्द्र यादव हंस 2005 आधुनिक भारत में शुद्ध रक्त की बहस बेमानी है फिर बुधिया बच्चा जार संतान कैसे ? कहानी में तथ्य है। जिसे डाक्टर धर्मवीर अनदेखी करते हैं। क$फन पर डां. धर्मवीर की आलोचना एकतरफा और प्रेमचंद विरोधी लगती है। ऐसा लगता है हमारी आलोचना को लकवा मार गया है। पितृ सत्तात्मक लेखक धर्मवीर क्यों नहीं चाहते है कि कोई दलित कथाकार क$फन के स्तर की कहानी हिंदी के क्षेत्र में पेश कर सके। तथाकथित सवर्ण लेखकों का आपरेशन करना, तथाकथित लेखकों द्वारा इतिश्री करना ही है। तब वे स्वयं के वास्तविक लेखक का श्रीगणेश कब करेंगे ? सदानंदशाही के मित्र और दलित लेखक कंवल भारती आजकल हिंदी साहित्य की शव परीक्षा कर रहे हैं जबकि कंवल भारती मानते हैं 1936 से दलित विमर्श की शुरुआत होती है।
दलित समाज क$फन कहानी पर आरोप लगाता है कि घीसू - माधव को कामचोर निठल्ल और हृदयहीन बतलाया है। दलितों के प्रति एकांगी, अपमानजनक और अयर्थावादी रुख अपनाया है। यह एक सवर्ववादी सोच है। चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम कुनबे का मतलब होता है - दो - तीन पीढ़ियों के परिवार, जब परिवार इतना बड़ा हो तो फिर घीसू बुधिया के क$फन के लिए बनिए महाजनों के पास पैसे मांगने नहीं जायेगा, सचमुच में यह दलितों के लिए अपमानजनक स्थिति है। यह न दलित विमर्श है न दलित अस्मिता की पहचान। 1936 में क$फन कहानी प्रेमचंद ने लिखी थी जबकि 1936 तक आते - आते डां. अंबेडकर का आंदोलन इतना आगे बढ़ चुका था कि दलितों में दलित वर्ग के रुप में चेतना जागृत हो गई थी। क$फन का पुनर्गाठ करने पर लगता है कि प्रेमचंद के दलितों के प्रति जो सहानुभूति पहले दिखाई देती थी वह बाद की कहानियों में गायब होने लगती है। फिर दलित उतने उतने गरीब भी नहीं रहे कि अपने परिवार के एक सदस्य के लिए क$फन का इंतजाम न कर पाएं। यहीं पर दलितों की मानसिकता में भ्रम पैदा होता है। असंतुलित होते हैं, जिसे आक्रोश भी कहा जाता है। जबकि दलित ऐसी व्यवस्था का विरोध करते हैं तो दलितों के पक्षधर हो जाते हैं और प्रेमचंद के विरोधी भी।
विरोध के बावजूद एक पते की बाद प्रेमचंद ने क$फन में कही है - हम तो कहेंगे घीसू किसानों से कही ज्यादा विचारवान था और किसानों के विचार शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मंडल मं जा मिला था। सच्चे अर्थों में सर्वहारा की स्थिति तक पहुंचे घीसू - माधव अपने जैसों के साथ मिलकर क्रांति भी कर सकते हैं, मगर इनकी गुंजाइश नहीं है। प्रेमचंद ने इन सारी स्थितियों का बेहद ईमानदारी और कलात्मकता के साथ चित्रण किया है।
मृत बुधिया के शरीर से जिस सामाजिक व्यवस्था ने क$फन ढाका था क$फन हटाकर देखने से मरहूम बोल पायेगी - कभी नहीं। लेकिन हम चिल्ला सकते हैं। स्वास्थ्य रक्षक दवाएं फलाने नगर में है। ये वही सपेरे हैं जो घीसू - माधव को विचारवान बनाते हैं। ये सपेरे क$फन को भी विज्ञापन प्रचार - प्रसार कर बेच डाले तो अमानवीयता घीसू - माधव दलितों में होगी ? घीसू - माधव, बुधिया कला के व्यवस्था के प्रतीक है। इस क$फन में घीसू - माधव और बुधिया की दुनियां में प्रेमचंद का जाने कब और किस तरह का अनुभव साफ बोलता है।
-: संदर्भ साभार :-
1. श्री नंदकिशोर नौटियाल - हिंदुस्तानी $जबान, जनवरी - मार्च 2005
2 . डॉ. अकील हाशमी - हिंदुस्तानी $जबान अप्रैल - जून 2005
3 . साहित्य का गणतंत्र गोपीचंद नारंग - हिंदुस्तान जबान जुलाई सितम्बर
4 . विमर्श के हाशिए पर - डॉ. शशिकला राय
5 . हिंदुस्तानी जुबान हर्षा शर्मा - जुलाई - सितम्बर 2003
6 . हिंदुस्तानी जुबान रामदश मिश्र - अप्रैल जून 2003
7 . साहित्य का चरित्र और साहित्य - चंद्रकांत वांडित वड़ेकर हिंदुस्तान की $जबान अप्रैल जून 2002
8 . संपादकीय लेख हिंदुस्तानी जुबान श्रीमती सुशीला गुप्ता अप्रैल - जून 2003
9 . परख - प्रेमचंद सामंक का मुंशी धर्मवीर की तालीबानी नैतिकता की कसौटी पर - रमनीका गुप्ता - हंस 2005
10 . प्रेमचंद - समीक्षा के बहाने कथा आलोचना की गई जमीन की तलाश वर्तमान साहित्य जुलाई 2005
11 . भारतीय समाज में दलित की दावेदारी प्रेमचंद संदर्भ सदानंदशाही।
12 . प्रेमचंद का दलित विमर्श कंवल भारती
13 . पहल 80 जुलाई - अगस्त कात्यायनी
14 . पहल 80 जुलाई - अगस्त प्रेमचंद के दलित तेजसिंह
15 . हंस तेरी मेरी उसकी बात राजेन्द्र यादव 2005
16 . अकार शैलेश मटियानी के दो पत्र अगस्त - नवम्बर 2007

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