इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 जून 2013

लोक की कहानी






आंचलिक भाषा पर कहानी लिखने की हमारी परंपरा बहुत लंबीहै। इंशा अल्ला खॉ की रानी केकती की कहानी को हिन्दी खड़ी बोली की कहानी मानी जाती है पर उस कहानी की भाषा में ऑचलिकता बोध स्पष्ट दिखायी देती है। रेणु की कहानी परती परिकथा बिहार की लोक बोली के रस से सराबोर दिखायी देती है। उनकी कहानियों में भी इस ऑचलिक रंग को आसानी से देखा जा सकता है। बहुत से हिन्दी कहानियों को भी ऑचलिक भाषाओं के प्रयोग से कहानी को अधिक प्रभावशाली बनाया गया है। किन्तु यह भी सत्य है कि ऑचलिकता कि नाम पर बहुत सतही कहानी भी लिखी गयी है। और उन सतही रचनाओं के बलबूते पर ऑचलिक लेखक का तमगा लगाकर सामाजिक और राजनैतिक लाभ उठाने वाले तथाकथित रचनाकारों की भी कमी नहीं है। ऐसे रचनाकार ऑचलिकता को जीते नहीं केवल भुनाते हैं। जब तक ऑचलिक भाषा की रचनाएं केवल और केवल सतही या भरती की रचनाएं ही हो सकती है। उसमें रचनात्मक गहराई का अभाव दिखायी देगा। ऐसी रचनाओं का ऑचलिक साहित्य के विकास में कोई योगदान नहीं होता। रचना का समाजशास्त्र विसंगतियों और अन्तर्विरोधों से भरा हुआ दिखायी देगा।
हम छत्तीसगढ़ी पर लिखी ऑचलिक रचनाओं की परंपरा की ओर देखें तो यह परम्परा खींच - तानकर धर्मदास तक जाती है। वैसे धर्मदास की रचनाओं काके विशुद्ध छत्तीसगढ़ी कहने पर भी प्रश्न उठाये जा सकते हैं। किन्तु धर्मदास से लेकर सन 2000 तक छत्तीसगढ़ी में जितनी रचनाएं लिखी गयी उसमें कई गुना अधिक 2000 से 2010 के बीच लिखी गयी। स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ राज्य के गठन बाद छत्तीसगढ़ी रचनाओं की बाढ़ सी आ गयी। इस बाढ़ में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, संस्कृति का आधार, उसका विचार पक्ष सब कुछ बह जाने के दुख में आज भी ऑसू बहाते हुए दिखायी दे सकते हैं। अधिकॉश छत्तीसगढ़ी रचनाएं ठेठरी और खुरमी, चीला और फरा, लुगरा और पोलखा, पंछा और पटका में सिमट कर रह गई। लोक जीवन की ऐतिहासिकता संघर्ष शीलता को पहचानने में नाकाम रही।
कुबेर साहू छत्तीसगढ़ी के एक संभावनाशील रचनाकार है। कथाकार की दृष्टि न केवल लोक की ऐतिहासिक संघर्षशीलता को पहचानती है वरन उनके भीतर के जीवन मूल्यों को तलाशती भी है। उनकी कहानियॉ सांस्कृतिक मूल्यों की अपनी कलेवर पर ही नहीं टिकती वरन संस्कृति को व्यापक सामाजिक जीवन के भीतर से देखती है। यदि कुबेर गांधीवादी आदर्श के आग्रह से मुक्त होकर कठोर सामाजिक यथार्थ से रुबरु होकर लोक मूल्यों को पकड़कर कहानी लिखे तो एक मुक्कम्मल कहानीकार के रुप में उनका विकास हो सकता है। हांलाकि भोलापुर की कहानी संग्रह की कुछ कहानियों में इस आदर्श से बाहर निकलने की छटपटाहट उनमें स्पष्ट दिखायी देती है। घट का चौका कर उजियारा, चढ़ोतरी के रहस, पटवारी साहब परदेशिया बनगे, अम्मा हम बोल रहा हूं, आपका बबुआ, मरहा राम के जीव कहानियों में कुबेर ने आदर्श से बाहर निकलने की कस्मकश को देखा जा सकता है और यथार्थ की ठोस जमीन पर डरते झिझकते हुए नहीं वरन पूर्ण आत्मविश्वास के साथ मजबूती से कदम रखते हैं। धर्म और धार्मिक कार्यों के भीतर छुपे हुए यथार्थ को पकड़ने में उनकी दृष्टि कहीं चूकती नहीं। चाहे कबीर पंथी संत का यथार्थ हो अथवा पेटला महराज या बनारस का कथावाचक हो। हमारी सामाजिकता को रौधते हुए अर्थतंत्र की धड़कन पहचानने में कुबेर कोई गलती नहीं करते। आम आदमी के धार्मिक शोषण को रहस्य को भ वे समझ जाते हैं और संत या कथावाचक ही हस्यास्पद बना देते हैं। नौकरशाही के चरित्र को पटवारी और बबुओं के माध्यम से कड़ुवे यथार्थ के भीतर सेे देखते हैं। मंगलूराम के विरोध की चेतना शोषित पीड़ित व्यक्ति की संघर्षशील चेतना का ही प्रतिफलन है। रतनू राम को पटवारी परेशान करता है। वह कोई और नहीं उनके अपने ही व्यक्ति हैं, छत्तीसगढ़िया है। नौकरशाह के चरित्र को परखने में कुबेर कहीं चूकते नहीं।
कुबेर साहू के यहां छत्तीसगढ़ का गॉव है। एक समूचा गॉव, जहां गॉव की अच्छाई भी है और बुराई भी। और दोनो को जीते हुए लोग। गॉव में अंधविश्वास का एक मजबूत जाल होता है। जिसमें हर आदमी फंसा होता है। यह अंधविश्वास कुछ चालाक लोगों के प्रतिशोध का अस्त्र भी होता है और कुछ लोगों के जीवन यापन का साधन भी। पेटला महराज के बाप तरिया के कुण्डली बनाते हैं राजा तरिया। वे यह भी कहते हें जजमान मोर बात धियान दे के सुनिहव दोनो तरिया मन के बिहाव जब तक नई होही पानी कभू नइ माड़य राजा तरिया तालाब को बेटी वाले और बेटा वाले गु्रप में बांटकर लद्दी निकालकर सफाई की जाती है। पानी भरने के मुख्य कारण यह है जिस ओर संकेत करके कुबेर साहू अंधविश्वास पर प्रहार करते हैं। छत्तीसगढ़ के हर गांव में पेटला महराज और इसकी पीढ़ी को देखा जा सकता है। पेटला महराज का दूसरा रुप कबीर पंथी संत और तीसरा रुप कथावाचक ओर करन चढ़ोतरी का रहस में देखा जा सकता है। वास्तव में इनकी पूरी जमात होती है जो गाँव के लोगों का सांस्कृतिक शोषण करती है अपनी थैली भरती है। लोग जीवन धार्मिक कार्यों के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील होता है और इसी संवेदनशीलता को शोषण का आधार बनाया जाता है। एक इसके तरह के लोग मुसवा और संपत जैसे होते हैं। लछनी काकी जो अंधविश्वास को प्रतिशोध का हथियार बनाते हैं। घना मण्डल के सामाजिक जीवन का गांव के लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को समाप्त कर अपना अस्तित्व और कमाई को बदस्तुर जारी रखने के लिए घना मंडल ने बदनाम करने के लिए षड़यंत्र पूर्वक इसी अंधविश्वास का सहारा लिया जाता है। और संपत, मुसुवा और नानुक, सुदंरु को साम - दाम, दण्ड - भेद से इस बात के लिए राजी कर लेते हैं कि भरी पंचायत में वह लछनी पर टोनही होने का आरोप लगाये और उसकी पत्नी पर टोना करने का दोष मढ़े। किन्तु उनका खेल गांव के मेडिकल कालेज का छात्र रग्घू बिगाड़ देता है। और पंचायत में जांच रिपोर्ट पढ़कर बता देता है कि फुलबासन को एड्स है। कुबेर अंधदृष्टि और वैज्ञानिक दृष्टि की उन्द्वात्मवक्ता दिखाकर समाज में अंधविश्वास के विरुद्ध चेतना जागृत करते हैं।
कथाकार की सहज दृष्टि में बड़ी सजगता हर कहानी में दिखाई देती है। इसलिए समाज विरोधी तत्वों परंपराओं और रिवाजों का वे प्रतिरोध करते हैं। नका यह प्रतिरोध रचनात्मक प्रतिरोध है। प्रतिरोध के लिए प्रतिरोध के लिए प्रतिरोध नहीं है। चाहे वह मुसुवा और संपत का प्रतिरोध हो या नंदगहिन द्वारा कबीर पंथी संत का व्यंग्यात्मक प्रतिरोध हो घर का चौर कर उजियारा अथवा मरहा राम का प्रतिरोध हो मरहा राम का जीव या फिर मंगलू का प्रतिरोध हो अम्मा हम बोल रहा हूं, बाबुआ। इस प्रतिरोध का संग्रह की कहानियों में एक सामाजिक चरित्र बनता है जो चेतना के समाजशास्त्र को प्रभावित करता है। और चेतना के विकास की दिशा तय करता है। प्रतिरोध का यह स्वर कभी दबा हुआ रहता है तो कभी मुखर न मंत्रे की बात बात यह है कि मुखर स्वर रग्धु - जगत आदि नई पीढ़ी    के लोगों में दिखायी देती है। सरपंच कका, लछनी काकी कहानीकार चेतना के विकास की संभावना नयी पीढ़ी में केवल वैज्ञानिक चेतना है। कहानीकार ने नहीं देखा है वरन कहानीकार की दृष्टि नई पीढ़ी के भटकाव को भी पकड़ने में सफल दिखायी देती है। डेरहा बबा नई पीढ़ी का यह भटकाव न केवल लोक जीवन को अशांत करता है। वरन उनके अपने जीवन में भी अंधेरे का विस्तार करता है। 21 वीं शदी का उत्सव डेरहा बबा नई पीढ़ी की सांस्कृतिक भटकाव को रेखांकित करता है। यह बात अपनी परम्परा और इतिहास से कटी हुई पीढ़ी की त्रासदी की ओर इशारा करती है और कहानीकार का यह इशारा हमारी समूची सांस्कृतिक विकासपर प्रश्र खड़ा करता है। किन्तु मंगलू के प्रतिरोध की चेतना एक दूसरी तरह की चेतना है। अम्मा हम बोल रहा हूं ... वह अपनी विरोध की चेतना को अपने अफसर के प्रिय विदेशी पौधे पर कुल्हाड़ी चलाकर व्यक्त करता है। मरहा राम की चेतना फेन्टेसी में फँसी होने के बाद भी मुकम्मल प्रतिरोधी चेतना के रुप दिखायी देती है। मरहा राम के जीव नंदगहिया की विरोधी चेतना बड़ी मासूमियत और विनम्रता से भरी हुई चेतना है। बने कहिथस साहेब। हम मूरख दारु - मंद ेक मरम ल का जानबोन। जानतेन त अइसन अपराध काबर करतेन। आप मन गुरु हव गियानी - धियानी हव। तउन पायके जानथव। घट का चौका कर उजियारा मासूमियत और विनम्रता में लिपटी हुई यह विरोध की चेतना के मूक रुप को भी दिखाया है। रतनू की मूक विरोध में भी बड़ी ताकत दिखायी देती है चाहे वह पटवारी साहब परदेशिया बनगे कहानी में रतनू का विरोध हो या साला छत्तीसगढ़िया में दुकानदार के प्रति रतनू का मूक विरोध हा। मूक विरोध होकर भी यह प्रभावशाली ढंग से उभरकर सामने आता है। मरहाराम के जीव कहानी में मरहाराम के लिए ओर फेन्टेसी में जाने के पूर्व के चरित्र को भी विरोध की चेतना के रुप में देखा जा सकता है।
भोलापुर की कहानी रिश्तों की सामूहिकता में बंधी हुई कहानियों का संग्रह है। संग्रह की चेतना लोक संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। जहां  हर आदमी रिश्तों की डोर में बंधे हुए दिखायी देते हैं। गाँव के विरोधी तत्वों के बीच भी इस बंधन में कोई झोल दिखायी नहीं देता चाहे सुकारो दाई का नंदगहिन से रिश्तों का बंधन हो या उनकी अपनी बहु से। बहुत समझे जाने के बाद भी पेटला महराज से डेरहा बबा का रिश्ता, रतनू और जगत व सरपंच कका, मुसुवा और संपत और नानुक के रिश्तों का बंधन रतनू उसका बेटा और उसकी पत्नी का बंधन नंदगहिन का गुरुदेव संत साहेब से रिश्ता न जाने कितने - कितने रिश्तों का बंधन। न जातिवाद की बाधा न संप्रदायवाद की। उंच की न नीच की वहां केवल सामूहिकता की अविरल धारा है। बूंदों का विलय ही धारा का अस्तित्व है और यही लोक जीवन का भी अस्तित्व है। मरहा राम का संघर्ष और राजा तरिया कहानियों में सामूहिकता  की दो अलग - अलग रुप दिखायी देती है। एक में समूह की शक्ति उत्सव की पृष्ठ भूमि में दिखायी देती है और मरहाराम के संघर्ष में यह प्रतिरोध की शक्ति के रुप में दिखायी देती है। दोनों लोक की सामूहिकता के अलग - अलग रंग है।
साहित्य में मिथ का उपयोग करते समय रचनाकार का सावधान रहना आवश्यक है। मिथ हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। उसके अपने ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व है। किन्तु कालक्रम से उसकी व्यंजना को परिवर्तित करना आवश्यक होता है। मरहा राम के जीव कहानी में कुबेर ने यमराज, यमलोक, यमदूत तथा श्री हरि या भगवान और भगवान के लोक के मिथ  पर जो फताँसी रचते हैं वह रोचक होने के साथ ही नकारवादी न होकर सकारवादी है। भवसागर और वैतरणी जैसे मिथों का यमदूतों द्वारा व्याख्या हमारे अपने सामाजिक चेतना को विकसित कर मिथ को एक अलग संदर्भों में देखने समझने की दृष्टि देती है। मरहाराम प्रतिरोधी शक्तियों से अकेला संघर्ष करते हुए मारा जाता है। बल्कि उनकी हत्या की जाती है। पूंजीवादी शोषण व्यवस्था में कई मरहाराम की हत्या हो चुकी है। हिंसा, हत्या, आतंक यह सब तो इस व्यवस्था का चरित्र ही है। मरहाराम के संघर्ष कहानी के प्रारंभ में अपनी जमीन न छोड़ने का मूक संघर्ष है किन्तु कहानी के अंतिम अंशों में यह संघर्ष प्रबल विरोध में रुपान्तरित होता है। कहानीकार ने शायद मूक विरोध को प्रबल मुखर विरोध में बदलने के लिए ही मिथ और फतॉसी का उपयोग किया है। यह प्रयोग कहानी को बहुत ऊपर उठा देता है। यदि कहानी के ऐसे अंशों को छत्तीसगढ़िया के निर्णय भगवान हा न रही, लद लद कांपना जैसी बातों को विलोपित किया जाए तो यह और प्रभावशाली कहानी बन सकती थी। मरहाराम ने अपने संघर्ष को हाशिये पर रखकर भगवान के आदेश से संघर्ष की परिकल्पना कहानी केा नाटकीय ढंग से यथार्थ से दूर हटा देती है। जबकि कहानी का कलेवर यथार्थ वादी जमीन पर विकसित होती है। छत्तीसगढ़िया लोगों के भोलेपन का फायदा चालाक लोग उठाते हैं। यह सत्य है। उनकी चालाकी और उनकी बाहुबालियों से छत्तीसढ़ियों के भयभीत होने के भी यथार्थ की झलक है पर छत्तीसगढ़ के लोग कमजोर नहीं है। वह हर परिस्थिति में जीने की क्षमता रखता है। उनकी उस क्षमता को नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह क्षमता मरहा राम में भी है और रतनू में भी और डेरहा बबा में भी है। यही क्षमता उनकी ताकत है। फिर भी यह कहानी शक्तिशाली शोषकों के विरुद्ध जंग के ऐलान की कहानी बन जाती है। और लोक में प्रतिरोध की चेतना का विकास करती है।
कहानी के शिल्प पक्ष पर विचार किया जाय तो कहानी बुनने की कला तो कुबेर में है ही वह कथानक का विकास भी इस तरह करते है कि कथाक्रम में कहीं व्यतिरेक दिखायी नहीं देता। लोक भाषाओं में यो ही बड़ी मिठास होती है। लयात्मकता तो लोकभाषा का प्राण ही है पर यह सब तभी संभव है जब लोक जी शैली में इसका प्रयोग हो। यदि लोगशैली को नजर अंदाज कर लोकभाषा का प्रयोग किया जाय तो भाषा बोझिल हो जाती है। कुबेर ने ठेठ लोकशैली की भाषा  में कहानी लिखी है। लोक मुहावरे, लोकोक्तियाँ तथा लोक व्यवहार के शब्दों का कुबेर ने ऐसा उपयोग किया है कि कहानी का शिल्प सौन्दर्य तो प्रभावशाली बनता ही है, पाठक को डूबा भी देता है। कुबेर तो यमदूत, यमराज और भगवान से छत्तीसगढ़ी में बात करवा देते हैं। विषयानुकूल छत्तीसगढ़ी के शब्दों का चयन आसान काम नहीं है।  उसके लिए अध्ययन से अधिक अनुभव की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए बहुत प्रभावशाली भाषा का उपयोग करने से सफल होते हैं।
कुबेर की कहानियों में अधिकांश पात्र प्रतिनिधि पात्र बनते - बनते रह जाते हैं। एक अजीब तरह के गॉधियन हृदय परिवर्तन का भी कहानीकार सहारा लेते हैं। गांधी युग के बाद हिन्दी कहानी की जमीन गाँधियन आदर्श से हट गयी है। और ठोस यथार्थ की जमीन पर हिन्दी कहानी फल - फूल रही है। ऐसे समय में गाँधी वादी हल देना रचनाकार की भावुकता ही मानी जा सकती है। जब - जब कुबेर गाँधीवादी भावुकता से बाहर निकलते हैंं कहानी बहुत प्रभावशाली बन जाती है। चाटे घट का चौका कर उजियारा हो, सुकारो दाई हो पटवारी परदेशिया बनगे हो अम्मा हम बोल रहा हूं, बाबुआ, मरहाराम का जीव हो। इन कहानियों में सामाजिक विसंगतियों का यथार्थ परण रुप सामने आता है। कुबेर में कहानी बुनने की बहुत अच्छी कला है, अच्छी भाषा है। विषयवस्तु का चुनाव करने में सक्षम है। यदि भावना के प्रवाह में बहने के प्रति सचेत अथवा सजग रहे तो बहुत अच्छी आँचलिक कहानियां दे सकते हैं। हिन्दी साहित्य में अच्छी आँचलिक कहानियों की कमी कुबेर साहू की कहानियों से पूरी हो सकती है।
दाऊ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव [ छत्तीसगढ़ ]

धनबहार के छॉव म

  • समीक्षक -श्रीमती शकुन्तला शर्मा

धनबहार के छाँव म सुधा वर्मा द्वारा रचित कहानियों का संग्रह है। इसमें छब्बीस कहानियाँ संकलित है। कल्यानं करोत या सा कथा जो समाज का कल्याण करती है उसे दिशा देती है, उसे कथा कहते हैं। इस कसौटी पर सुधा की कहानियाँ खरी उतरती है। क्योंकि उनकी प्रत्येक कहानी में कई - कई संदेश हैं। वर्तमान समस्या से कसमसाते समाज को वे समाधान का धनबहार देती है। भोमरा कहानी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
श्रीमती सुधा वर्मा की इस किताब का शीर्षक भी एक संदेश देता हुआ दिखाई दे रहा है। पेड़ पौधों की महत्ता को स्वीकार कर, उसके प्रति कृतक्षता - ज्ञापन का भाव संप्रषित हो रहा है। एक पेड़ दस पूत समाज के भाव का स्मरण है। संप्रेषण है।
धनबहार वस्तुत: अमलतास का पर्यायवाची शब्द है। संस्कृत साहित्य में अमलतास की बड़ी महिमा गाई गई है। कवियों ने इस पुष्प को सहारा है, इसका चित्रांकन किया है।
सुधा की कहानियाँ उसके आसपास की घटनाओं की उपज है। उसका अनुभूत सत्य है। मैं ताम्रपत्र पढ़ सकतेंव कथा साक्षरता की महत्ता को उजागर करती है। गाँव - गाँव में शिक्षा का दीप जलाती है। सुधा वर्मा, सर्व शिक्षा अभियान में, तख्ती लिए हुए जुलूस में चलती हई दिखाई दे रही है।
अँचरा के गठान गाँव की हर बेटी की कहानी है। सुधा की नायिका कमला ने इस कहानी को जीवंत बना दिया है -  नारी एक ऐसी गाय है जो दूध तो देती है मगर वंश बढ़ाती है हमें याद रखना चाहिए। पुरुष के साथ वह हल में जुती हुई है। तिरस्कार कोड़े से उसे बचाना चाहिए।
दूध के नदिया कहानी इस संग्रह की सर्वोत्तम कथा है। आज जहाँ गौ माता भूख से व्याकुल होकर झिल्ली खा रही है। भारत में गौ माता का वध हो रहा है। ऐसे समय में यह कथा लोगों को प्रेरित कर रही है कि वे गौ माता की सेवा करके अपने इहलोक और परलोक को सुधारे। अपना जीवन धन्य करें एवं दूसरों को प्रेरणा की संजीवनी से आप्लावित करें। किसान आज दुखी है, खेत का पाग बिगड़ गया है। इसका कारण गौ माता की उपेक्षा ही है - गाय नहीं होगी तो गोपाल कहाँ से होंगे फिर गौ माता के हित में विचार होना चाहिए। गाय दीन - हीन है। किसान का खेत जर्जर है।

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