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मंगलवार, 4 जून 2013

युगप्रवर्तक : हीरालाल काव्योपाध्याय

  • पीसी लाल यादव
छत्तीसगढ़ के भुईया तईहा ले बड़ संस्कारित अऊ पबरित भुईया आय। एखर नस - नस म कला, साहित्य अऊ संस्कृति के तिरबेनी लहू बनके बोहावत हे। इहां सहजोग, समरसता, मितानी अऊ भाईचारा के जुड़ छईहां हे, जेमा महतारी के कोरा के सरग असन सुख मिलथे। एखरे सेती जेन ह इहां अइस, इहां आके एखरे हो के इहें रहिगे। एखर मुख कारन आय एखर भासा अऊ ये भासा के मिठास। जेन ल सब छत्तीसगढ़ी के नाव ले जानथे। सिरतोन म छत्तीसगढ़ी दया - मया के भाखा आय। मान - गऊन, नेक - ईमान अऊ सम्मान - स्वाभिमान के भासा आय। एला जऊन सुने हे, जऊन बोले हे, तऊने ह जानही एखर मिठास ल अऊ एखर पुन - परताप ल।
छत्तीसगढ़ी भासा के पुन - परताप ल उजागर करे बर धनी धरमदास जी, लोचन परसाद पाण्डे, सुन्दर लाल शर्मा जइसे अऊ कतकोन कलमकार अऊ साहित्यकार मन के योगदान है। अइसने रिहिन हमर पुरखा साहित्यकार हीरालाल काव्योपाध्याय। हाँ युग प्रवर्तक हीरालाल काव्योपाध्याय। जऊन मन ह सबले पहिली छत्तीसगढ़ी भासा के व्याकरण लिख के छत्तीसगढ़ी भासा ल पोठ करिन। जेन अबुझ मन छत्तीसगढ़ी भासा के पुन - परताप ल नई जानय, एखर गुन - गरिमा ल नई मानय, तेन मन इरखा - द्वेस अऊ डाह बस छत्तीसगढ़ी भासा के हिनमान करथे। हाँसी - ठट्ठा उड़ाथे के छत्तीसगढ़ी के न व्याकरण हे न साहित्य। वो अज्ञानी मन नई जानय के छत्तीसगढ़ी भासा के व्याकरण सन् 1880 म सिरजगे रिहिस। जेखर अंगरेजी रूपांकर सरजार्ज ग्रियर्सन ह करिस। अऊ एखर सिरजइया रिहिन हीरालाल काव्योपाध्याय। ये व्याकरण के किताब में छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सिरजन के संगे - संग छत्तीसगढ़ के लोक - साहित्य जइसे जनौला, दोहा, ददरिया, रमायन के कथा, ढोला के कहिनी अऊ चंदा के कहिनी के संकलन घलो हे। छत्तीसगढ़ तो लोक साहित्य के भंडार आय।
भासा मन के भाव उदगारे के सबले सुलभ अऊ बड़का साधन आय। जइसे भासा ह मन के आँखी आय तइसने व्याकरण अऊ साहित्य ह घलो भासा के आँखी आय। ये डाह करइया, जलन पटपटी मरइया मन ल अतका जरूर जान लेना चाहिए के कोनो भासा बिन आँखी के  नइ होय। भासा ह भासा होथे। एहा छोटे - बड़े नइ होवय। कमजोर सजोर नइ होय। अऊ फेर जेन भासा के दू करोड़ ले जादा बोलइया हे, तेन ल कोन मुरूख, कोन अजुब अज्ञानी ह भासा नई कहि। इही छत्तीसगढ़ी भासा ल पोट्ट करे म हीरालाल काव्योपाध्याय जी के बड़ अवदान हे।
छत्तीसगढ़ के जाने - माने भासाविद् साहित्यकार, चिंतक अऊ पुरातत्व वेत्ता स्वर्गीय पंडित लोचन प्रसाद पाण्डे के मुताबिक श्री हीरालाल काव्योपाध्याय के जनम सन 1856 ई. में रायपुर में होय रिहिस। ऊंखर पिता जी के नाव बाबू लाला राम अऊ महतारी के नांव राधाबाई रिहिस। महतारी राधाबाई बड़ कुलीन अऊ धार्मिक सुभाव के नारी रिहिस। ओखरे मयारू कोरा के हीरा आय, हीरालाल काव्योपाध्याय। पिता श्री बालाराम जी धन - धान ले परिपूरन रिहिन अऊ चन्नाहू साखा के कुरमी परिवार के मानता सियान रिहिन। ऊंखर रायपुर में गल्ला अनाज के कारोबार घलो रिहिस। ओ मन धार्मिक सुभाव के फेर पुरातन बिचार के मनखे रिहिन। बाबू लालाराम जी नागपुर के भोंसला राजा के सेना में नायक रिहिन। उन ला अंगरेज अंगरेजी अऊ ऊंखर सभ्यता बिल्कुल पसंद नई रिहिस। ऊंखर मन म भय रहय के अंगरेजी पढ़े ले मनखे अपन जात अऊ धरम ले बिमुख हो जथे। तब अइसन हालत म लईका हीरालाल बर बड़ मुसकुल रिहिस कि वोहा हिन्दी म प्राथमिक शिक्षा पाय के पाछू अंगरेजी स्कूल म भरती हो जाय। तभो ले अपन ददा के दिल ल जीते म हीरालाल सुफल होके। रायपुर के जिला स्कूल म भरती होगे। होनहार बिरवान के होवत चिक्कन पान। के हाना ल चरितार्थ करत हीरालाल पढ़ई - लिखई म सरलग सबले अव्वल नम्बर पास होवत गिस। आरा बछर के उमर म कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रवेश परीक्षा ल जबलपुर हाई स्कूल केन्द्र ले पास करके प्रवेश पाईस। ये आय पढ़ई के प्रति उंखर लगन अऊ मेहनत के कहानी। कहिथे न के महिनत के फल मीठ होथे। नान पन ले हीरालाल में गणित अऊ साहित्य डाहर बड़ झुकाव रिहिस।
हीरालाल जी सन 1875 ई. में रायपुर जिला स्कूल म तीस रूपिया महिनवारी पगार म सहायक शिक्षक बनगे। कुछ समे बाद ओमन जिला स्कूल बिलासपुर म घलो अपन सेवा दिन। ऊंहा हीरालाल जी ह स्कूल म गायन अऊ संगीत के नवा बिसय सुरू करिन। संगीत बिसय ल ओमन खुदे पढ़ावंय। काबर के ओमन संगीत के घलो बड़ जानबा रिहिन। अपन लगन, महिनत अऊ ईमानदारी के बल में ओ मन धमतरी के एंग्लो - वर्नाकूलर मिडिल स्कूल म प्रधानपाठक होगें। तब ऊंखर तनखा साठ रूपिया रिहिस। इंहा ऊंखर व्यक्तित्व के खूब बिकास होईस। ऊंखर मार्गदर्शन म मिडिल स्कूल धमतरी घलो खूब उन्नति करिस। अपन कपसा कस उज्जर चरित्र, सुघ्घर सुभाव, जनसेवा के सेती हीरालाल जन - जन के हितवा बन, सबके दुलरवा बनगे। अपन सारजनिक जिनगी म ओ मन धमतरी नगरपालिका के अध्यक्ष अऊ अस्पताल समिति के सदस्य तेखर पाछू अध्यक्ष घलो बनिन। अईसन सुघ्घर अऊ उज्जर रिहिस हीरालाल काव्योपाध्याय के व्यक्तित्व ह।
गुन के गाहक सहस नर, बिन गुन लहे न कोय। जैसे कागा कोकिला शब्द सुने सब होय। कविता ह लबारी नो हय। जेन मनखे म गुनी होथे, जेन म प्रतिभा होथे अऊ जेखर पास विद्या होथे। ओखर सब मनई, मान बढ़ई करथें अऊ ओखर सब जघा पूजा होथे। हीरालाल तो सचमुच हीरा रिहिस। ओखर गुन के अंजोर चारों डाहर जगमग - जग बगेरे लगिस। ओ समे शिक्षा विभाग के अधिकारी मन ओखर प्रतिभा ले प्रभावित हो के ऊंखर खूब बड़ई करें, उन ला आदर अऊ दैंय। श्री जी.आर.ब्राउनिंग एम.ए .सी. आई . ई . जऊन शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर जनरल रिहिन अऊ होशंगाबाद के तत्कालीन डिप्टी कमिश्रर एस . बु्रक मन हीरालाल जी ल खूब चाहंय। हीरालाल जी के काम ल देख के महान प्राच्यशास्त्र विद् डॉ. हार्नेली अऊ सर जार्ज ग्रियर्सन ह खूबेच बड़ई करयं।
हीरालाल जी बड़ अध्ययनशील रिहिन। ओ मन भाषाविद घलो रिहिन। छत्तीसगढ़ी - हिन्दी के संगे संग अंगरेजी, संस्कृत, बंगला, उड़िया, मराठी , गुजराती, अऊ उर्दू के घलो जानकार रिहिस। ओमन हिन्दी साहित्य ल कविता अऊ संगीत के कई ठन किताब लिख के पोठ करिन। हिन्दी स्कूल बर गीत के लिखे ऊंखर किताब शाला गीत चंद्रिका ले बंगाल एकेडमी कलकत्ता बड़ प्रभावित होईस। बंगाल एकेडमी ऑफ म्यूजिक के निर्माता महाराजा सर सुरेन्द्र मोहन टैगोर के . सी. आई . ई ह ये ग्रंथ ल संगीत क्षेत्र म ऊंच स्तर के घोषित करके सन 1885 म हीरालाल जी ल सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर दे के सम्मानित करिन। देवी भागवत ऊपर आधारित ऊंखर किताब नव काण्ड दुर्गायन अनुवादित जेन छन्द - मात्रा ऊपर आधारित रिहिस, तेमा हीरालाल जी ल काव्योपाध्याय के उपाधि प्रदान करे गिस। संगे - संग संगीत एकेडमी डहर ले सोन के बाजूबंद ईनाम म दे गिस। ये ईनाम महान शिक्षाविद श्री जी. आर. ब्राऊ निंग के अनुशंसा म दे गिस। हीरालाल जी ह गणित के अंगरेजी किताब अऊ तुलसीदास जी के रामायण के सामान्य अंगरेजी म सरल अनुवाद के काम घलो अपन हाथ म लिन। ओ मन विज्ञान की जिज्ञासाएं - भारत का इतिहास शीर्षक ले अऊ संस्कृत के पंचतंत्र के लेखन कार्य घलो करिन। अईसे महान साहित्यकार रिहिन हीरालाल काव्योपाध्याय जी ह। जेन ह छत्तीसगढ़ के धुरा - पार्टी म खेल के छत्तीसगढ़ महतारी के अऊ ओखर भासा छत्तीसगढ़ी के उन्नति के दुवार खोलिस।
फेर का करबे ?  जईस कोनो मनखे जंगल जाथे, त टेड़गा - बेड़गा रूख - राई ल नई काटय, ओ ह सोज पेड़ ल काटथे। तइसने लगथे भगवान ह घलो गिनहा मनखे ल छोड़ सिधवा अऊ बने मनखे ल अपन लोक म बला लेथे। अईसने एक दिन छत्तीसगढ़िया बेटा, माटी के सपूत, युग प्रवर्तक हीरालाल काव्योपाध्याय के सन 1890 म 33 बछर के छोटे उमर म धमतरी म इन्तकाल होगे। महमहावत फूल देखते - देखते अईलागे। ठऊंका मंझनिया के बेरा सुरूज बर काल बनके संझा ह झपा के।
श्री हीरालाल जी द्वारा व्याकरण के पूरा संशोधित अऊ बिस्तारित संस्करण अनुवाद सर जार्ज ग्रियर्सन के . सी. आई . ओ. एम . डाहर ले मध्य प्रान्त एवं बरार सरकार ले सन 1921 म पंडित लोचन प्रसाद पांडेय के संपादन अऊ नरसिंगपुर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्रर श्री हीरालाल बी. ए. डी. लिट के देखरेख म होईस। आज इही छत्तीसगढ़ी व्याकरण हमर थाथी ये। जेखर ले छत्तीसगढ़ी अऊ छत्तीसगढ़िया के चाकर छाती हे। मयारू भासा के दीया बर सिरतोन म, इही व्याकरण तल अऊ बाती ये।
  • गण्‍डई पण्‍डरिया, जिला - राजनांदगांव (छग)

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