इस अंक में :

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सोमवार, 24 जून 2013

डर


  • नरेश श्रीवास्‍तव 

पोस्टमेन दरवाजे पर पोष्टïमेन की आवाज सुनकर विवेक ने अपनी पांच वर्षीय बिटिया प्रियंका से कहा - देखो बेटी, दरवाजे पर पोस्टमेन आया है। शायद कोई चिटठी आई हो।
प्रियंका सरपट दौड़ती हुई दालान पर पहुंची। तब तक पोस्टमेन जा चुका था। प्रियंका की नजर एक लिफाफे पर ठहर गई। उसने वह लिफाफा उठाया और तुरंत दौड़ते हुए कहा - पापा एक लिफाफा आया है। उसने लिफाफा विवेक को थमा दिया। विवेक ने लिफाफा खोलना शुरू ही किया था तभी उसकी पत्नी वीणा साड़ी के आँचल से अपने आँखों के कोरों को पोंछती हुई किचन से ही पूछने लगी - क्यों जी, किसकी चिटï्ठी आयी है। कहाँ से आयी है।
- चिटï्ठी उत्तरप्रदेश से आयी है वीणू। हमारी नेहा ने लिखा है। विवेक ने बतलाया। फिर उसकी नजरें पत्र के मजमून को पढ़ने व्यस्त हो गई। पत्र पढ़ते हुए विवेक के भाव शून्य चेहरे पर घोर विषाद और संवेदना के चिन्ह परिलक्षित हो रहे थे।
नेहा ने लिखा था - चाचा, आप तुरंत चले आइए। मुझे और मम्मी - पापा को यहां से ले जाइए। चाचा, यहां रहमान चाचा और फातिमा चाची को बचाते हुए पापा का पैर टूट गया है। यहां दंगा हो गया है। ये दंगे क्यों होते हैं चाचा ? फातिमा चाची बिलख - बिलख कर रो रही थी। कहती है - मरते मर जाऊं मगर पाकिस्तान नहीं जाऊंगी। चाचा उनके साथ और भी है जो दंगे के डर से पाकिस्तान जाना चाहते हैं, इसलिए मुझे भी डर लगता है चाचा। अगर फातिमा चाची पाकिस्तान चली गई तो मैं सलीम के साथ कैसे स्कूल जाऊंगी। उसके साथ मैं कैसे खेलूंगी। चाचा, यहां कर्फ्यू लगा हुआ है। मुझे ही घर का सारा काम करना पड़ रहा है। रहमान चाचा फातिमा चाची और सलीम अभी बस्ती में ही है पर कर्फ्यू और दंगे के कारण इतने डरे हुए हैं कि हमारे घर तक नहीं आ सकते। मुझे यहां घर में अभी अकेला रहना पड़ रहा है। डर तो मुझे भी लगता है चाचा। लेकिन कोशिश करती हूं कि मुझे डर न लगे। चाचा आपको आना ही पड़ेगा। मैं कहती हूं चाचा मैं सलीम के बिना नहीं रह सकती। वह भाई है मेरा। उसने मुझसे राखी बंधवाकर बहन बनाया है। चाचा, आप आ रहे हैं न। मुझे आपका इंतजार रहेगा। आपकी नेहा।
पत्र पढ़ते हुए विवेक के ह्रïदय में सैकड़ों तूफान उठने लगे। वीणा भी अब तक पत्र के मजमून से वाकिफ हो चुकी थी। उसका भी दिल धक - धक करने लगा। वह भी डर गई  थी। प्रियंका की नन्हीं बांहों का स्पर्श अपने गले में महसूस करती हुई वीणा ने एकाएक प्रियंका को अपनी बांहों में समेटते हुए और ज्यादा कसकर भींच लिया था। विवेक तब बोल पड़ा - वीनू, मेरा समान पैक कर देना। मुझे वहां आज रात की ट्रेन से ही जाना पड़ेगा।
अपने सामान लेकर विवेक रात में ही स्टेशन निकल पड़ा। रेल्वे स्टेशन में यात्रियों का हुजूम देखकर विवेक सोचने लगा - आखिर इस भीड़ में हम सब एक ही तो हैं। फिर ये दंगे, ये मारकाट, ये गोली बारी, ये बमकांड। कभी पंजाब को गोली का डर तो कभी कश्मीर को दंगे का। कभी दिल्ली को डर तो कभी मुंबई को। आखिर क्यों होते हैं ये दंगे ? आखिर क्यों डरा हुआ है, आदमी - आदमी से ? जुनून अच्छी आदत है, लेकिन ये जुनून झूठे धार्मिक उन्माद का हो या सियासिती चालों का। अगर दिलों को डर की चौकसी में रखने लगेंगे तो ये जुनून जुनून नहीं बल्कि वहशीपन है। जो किसी हंसते खेलते परिवार को बदनाम तो कर सकता है लेकिन नाम नहीं दिला सकता।
अब तक विवेक अपनी बोगी में जगह बनाते हुए बैठ चुका था। सामने की सीट पर पहले से ही दो व्यक्ति बैठे हुए थे। बातों ही बातों में पता चला कि उनमें से एक यात्री ठीक उसी स्थान पर जा रहा है जहां विवेक को जाना था। तब उस सहयात्री ने विवेक से कहा था - क्या बतायें साहब, हमारे नवासे का खत आया था जिसमें दंगों की खबरें थी। लिखा था - अब्बा हुजूर का सिर फट गया है। अपने दोस्त की बहन को कुछ दंगाइयों से बचाते हुए। अगर दंगाइयों से वे न भिड़ते तो उनके दोस्त की बहन का सब कुछ लुट जाता। विवेक को फिर एक झटका लगा। डर का जो सिलसिला चल रहा था उससे जाहिर था कि दिलों में पलता ये डर कभी भी अपना भयानक रुप दिखला सकता है।
पेशे से पत्रकार विवेक बड़ी मुश्किल से थोड़ा सा समय निकालकर आज अपनी भतीजी से मिलने जा रहा था। अपने व्यवसाय के माध्यम से उसे तो वैसे भी जानकारी मिल रही थी कि  देश के किस - किस हिस्से में क्या - क्या हो रहा है।
इसी बीच गाड़ी एक बड़े स्टेशन पर रुकी। यहीं से विवेक को दूसरी गाड़ी पकड़नी थी। विवेक के साथ जो सहयात्री था, वह भी उतर गया। उत्तर प्रदेश जाने वाली गाड़ी के लिए दोनों कुछ पल इंतजार करने लगे। उदï्घोषक द्वारा विभिन्न गाड़ियों की सूचना बीच - बीच में दी जा रही थी। कुछ देर बाद उत्तरप्रदेश जाने वाली गाड़ी अपने नियत प्लेटफार्म पर आकर रूकी। गाड़ी भीड़ से खचाखच भरी हुई थी। पैर रखने की जगह नहीं थी। चूंकि विवेक अचानक सफर कर रहा था इसलिए आरक्षण नहीं हुआ था। एक जनरल डिब्बा विवेक को खाली सा दिखा। विवेक आश्चर्य में था। इतनी खचाखच भरी हुई गाड़ी में आखिर यह एक मात्र जनरल बोगी सिर्फ चार पैसेंजर को लेकर कैसे चल रही है ? पूछने पर पता चला कि वह मिलेटरी बोगी है। विवेक मन ही मन व्यंग्य से मुस्कुराया। मात्र चार सैनिकों के लिए पूरी जनरल बोगी सुरक्षित है। आखिर इन सैनिकों को किस बात का डर है ? उस बोगी में बैठे हुए सैनिक ने अंदर से दरवाजा बंद कर रखा था कुछ पैसेंजर्स इसका प्रतिवाद करने लगे इस पर जवाब मिला कि यह मिलिटरी बोगी है। तभी कुछ और नवजवान पैसेंजर्स उस बोगी के पास पहुंच कर अंदर घुसने का प्रयत्न करने लगे। उन सैनिकों में से एक ने बोगी का दरवाजा खोलते हुए कहा - आप लोग दूसरी जनरल बोगी में बैठने की व्यवस्था कीजिए। यह जनरल बोगी मिलिटरी मेन के लिए सुरक्षित है। विवेक अब तक खामोश था। वह जानना चाह रहा था कि वास्तव में वह मिलिटरी बोगी है या अनाधिकृत रुप से उसे मिलिटरी बोगी बताया जा रहा है। गार्ड से पता चला - यह बोगी मिलिटरी वालों के लिए सुरक्षित नहीं है अपितु वे जबरदस्ती कब्जा किए हैं। स्थिति तनावपूर्ण हो गया। उसी समय वहां पर जी.आर.पी. के सिपाही पहुंच गये। उन्होंने किसी तरह मामला शांत किया और पैसेंजर्स को उस बोगी में बैठने कहा। विवेक भी उस बोगी में अपने सहयात्री के साथ बैठ गया। कुछ देर बाद गाड़ी वहां से चल पड़ी। विवेक ने शालीनता पूर्वक उन सैनिकों से कहा - साहब, आपका फर्ज देश में अमन चैन और शांति स्थापित करना है। वक्त आने पर सरहद पर दुश्मनों से लड़ना है। आम नागरिकों को उस डर से मुक्त करना है जिस डर से हमारा राष्टï्र कभी भी विखंडित हो सकता है। लेकिन आप लोग स्वयं आम नागरिकों के दिलों में अपने पावर का डर पैदा कर अपनी छबि बिगाड़ रहे हैं। वर्ना सैनिक तो देश की आन - बान - शान सब कुछ है। आखिर सरहद पर आप ही तो हमारी खुशी के लिए, हमारे चमन के लिए दुश्मनों से लड़ने के लिए हर लम्हा तैयार रहते हैं।
एक सैनिक ने कहा - तो भाई साहब, आप लोग हमारे लिए कुछ देर तकलीफ नहीं सह सकते ?
इस पर एक यात्री ने कहा - तो सैनिक जी, आप कुछ देर आम नागरिक नहीं बन सकते ?
इस पर वह सैनिक चुप रहा। उसकी यह चुप्पी पूरे सफर तक कायम रही। क्योंकि दो स्टेशन के बाद वे सैनिक  उतर गये।
विवेक इस छोटी सी मगर महत्वपूर्ण घटना के बाद कुछ संयमित हुआ। उसे रह - रह कर नेहा की याद सता रही थी। वह सोच रहा था कि नेहा कर्फ्यू के महौल में किस तरह होगी ? क्योंकि सफर में जिन सैनिकों से थोड़ी सी बहस हुई थी, वह घटना उसे सोचने को मजबूर कर रही थी। विवेक का अंतर्मन उससे ही सवाल कर रहा था कि यदि रक्षक ही अपनी शक्ति का डर दिखाकर आम नागरिक को परेशान करेंगे तो फिर इस देश का क्या होगा ? उस कर्फ्यूग्रस्त इलाके में पता नहीं उस बच्ची पर क्या गुजर रही होगी।
लगभग चौदह घंटों के लंबे सफर के बाद विवेक उस स्टेशन में उतरा जहां से उसे नेहा के पास जाना था। विवेक के साथ जा रहा वह सहयात्री भी वहीं उतरा। उसने सहयात्री विवेक से औपचारिक बात करते हुए कहा - साहब, वक्त मिला और मुलाकात हुई तो अपने नवासे से आपको जरुर मिलाऊंगा।
विवेक तब सिर्फ मुस्कराया था। इसके बाद वह सहयात्री अपनी राह हो लिया। इधर विवेक ने एक तांगा किया और उस बस्ती की ओर जाने के लिए निकल पड़ा जहां नेहा रहती थी। तब तांगे वाले ने कहा - साहब, उधर कर्फ्यू लगा है। दो घंटे बाद कर्फ्यू में ढील दी जायेगी। तब मैं आपको उधर ले जा सकूंगा।
सवा दो घंटे बाद विवेक नेहा के पास पहुंचा।
नेहा ने जैसे ही विवेक को देखा वैसे ही वह चाचा , चाचा पुकारते हुए दौड़कर उससे लिपट कर रोते हुए कहने लगी - चाचा, यहां कुछ दिनों से दंगा और मारकाट हो रही है। घर  में मुझे अकेला रहना पड़ता है। खाना मुझे ही बनाना पड़ता है। कर्फ्यू में ढील होने पर मैं स्वयं खाना लेकर अस्पताल जाती हूं। चाचा, मुझे अब बहुत डर लगता है। मुझे समझ में नहीं आता चाचा कि आखिर ये दंगे क्यूं होते हैं। ये मंदिर और मस्जिद का झगड़ा क्या है चाचा ? हमें तो स्कूल में यही सिखाया जाता है कि ईश्वर और खुदा एक है। ऐसे में मंदिर - मस्जिद का झगड़ा क्यों ?
विवेक, नेहा को क्या उत्तर देता। बारह वर्षीय नेहा अब इतना समझदार हो चुकी थी कि वह एक इंसान का दूसरे इंसान से कौन सा रिश्ता हो सकता है, समझ सकती थी। इसलिए अपने दिल की भड़ास निकालती हुए वह ढेर सारे सवालात कर रही थी।
विवेक ने तब नेहा से कहा - डर मत बेटे, जब अंधेरा आया है तो रौशनी भी आयेगी। रौशनी की कद्र उन्हें नहीं मालूम होती जिन्होंने कभी अंधेरा देखा नहीं। बहुत जल्द सब ठीक हो जायेगा।
- सच चाचा। नेहा ने पूछा था।
- बिल्कुल सच नेहा, दो दिलों के बीच जिन फिरका परस्तों ने डर की दीवार खड़ी की है उन्हें बहुत जल्द मालूम होगा कि हिन्दुस्तान का बच्चा - बच्चा इस डर के आगे घुटने नहीं टेकेगा। इस डर का खात्मा बहुत जल्द ही खत्म होगा। तब नेहा ने कहा - चाचा, काश कि ऐसा ही हो। मैं और सलीम कई दिनों से स्कूल नहीं जा सक रहे हैं। चाचा, स्कूल में गुरविन्दर है, जान है लेकिन हममें तो कभी लड़ाई नहीं होती। चाचा, मैं चाहती हूं कि पढ़ - लिख कर कोई ऐसा कानून बनाऊं जिसके अनुसार ऐसा डर हमारे पास न फटके जो दिल को दिल से अलग करता हो।
- बहुत जल्द तुम्हारा ये सपना पूरा होगा नेहा। लेकिन तुमने मुझे बताया नहीं कि तुम्हारी फातिमा चाची अब कैसी है ? विवेक ने पूछा।
- फातिमा चाची तो ठीक है चाचा पर ...। नेहा कहती कहती रूक गई।
- पर, पर क्या ?
- उन्हें डर है चाचा कि दंगे फिर भड़के तो उन्हें और रहमान चाचा को कौन बचायेगा ? क्योंकि पापा तो अस्पताल में हैं। नेहा ने रुआंसे स्वर में कहा।
- तो क्या तुम्हारे पापा ताजिंदगी अस्पताल में रहेंगे ? और फिर ये दंगे हमेशा होते रहेंगे ? तुझे डरना नहीं है नेहा, ये दंगे जरुर खत्म होगें। फिर तुम्हें और तुम्हारी फातिमा चाची को कोई डर नहीं रहेगा।
- लेकिन अगर ये दंगे ऐसे ही रहे तो फातिमा चाची और रहमान चाचा सलीम को लेकर पाकि ....। नेहा बोलते - बोलत रुक गई।
- ये दंगे खत्म होगे नेहा। तुम्हारी फातिमा चाची और रहमान चाचा, सलीम के साथ इसी हिन्दुस्तान के सरजमीं में सांस लेंगे। विवेक ने कहा।
- लेकिन ये दंगे खत्म कैसे होंगे चाचा। जब मजहब की लड़ाईयां लड़ी जा रही है। नेहा ने पूछा।
- मजहब आपस में नहीं लड़ा करते बेटे, बल्कि इन्हें ढाल बनाकर कुछ फिरकापरस्त ऐसा डर पैदा करना चाहते हैं जो सिर्फ आशियाने को तोड़े - जोड़े नहीं। ऐसे लोग अपने स्वार्थ के बाजार में नफरत का व्यापार करते हुए दिल को दिल से जुदा करने का डर पैदा करना चाहते हैं। लेकिन ये डर हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसके लिए हमें हर मजहब का पैगाम इंसानियत और प्यार के जज्बे से देना होगा। ताकि ऐसे दिल वापस आये जो कहीं भटक कर इन दंगों में शामिल हो जाते हैं। विवेक ने कहा।
- ऐसा हो पायेगा चाचा ?
-हां बिलकुल।
- तो फिर ये कर्फ्यू ?
- ये कर्फ्यू तो थोड़ी देर का अंधेरा है नेहा। देखना थोड़ी देर में अंधेरा छंट जायेगा, फिर अगली सुबह किसी को किसी से शिकायत नहीं होगी।
- सच चाचा। नेहा ने आश्चर्य से कहा।
- बिलकुल सच, ऐसा ही होगा। फिर मैं तुम और तुम्हारी फातिमा चाची रहीम चाचा और सलीम के साथ तुम्हारे पापा को देखने अस्पताल जायेंगे।
नेहा अब तक कुछ संयमित हो चुकी थी। उसने विवेक से पूछा - चाचा, आखिर ये दंगे कैसे बंद होंगे ?
- इंसानियत और प्यार से ...। विवेक ने कहा।
- इंसानियत और प्यार से। नेहा ने फिर पूछा।
- हां, जब इंसानियत और प्यार का जज्बा हिंदुस्तान की करोड़ों आबादी वाले हर शख्त के दिल में होगा तभी ये दंगे खत्म होंगे। क्योंकि ऐसा दिल दंगों से नहीं डरता बल्कि दंगे ऐसे दिल से डरते हैं। इसलिए तो आज तुम्हारे पापा अस्पताल में हैं। तुम्हारे पापा ने प्यार और इंसानियत को ही सबसे बड़ा मजहब माना।
- मेरे पापा ...?
- हां, तुम्हारे पापा।
- तो फिर इंसानियत और प्यार का मजहब निभाने वाले मेरे पापा को आज अस्पताल में क्यूं तड़पना पड़ रहा है चाचा ?
- तड़पना तो ईशु को भी पड़ा था नेहा। लेकिन खुद ईशु और उनके अनुयायियों ने कभी इसकी शिकायत दुनिया वालों से की, कभी नहीं। कितनी यातनाएं दी गई उन्हें लेकिन क्या ये उन जुल्मों से कभी डरे ? इस देश को आजादी दिलाने के लिए ब्रिटिश सरकार के जुल्मों से क्या हमारे शहीदों ने डर कर उनकी गुलामी को स्वीकारा ? अपनी सरजमीं का इतिहास ही कुछ ऐसा है जो सिर्फ इंसानियत और प्यार का संदेश देता है। विवेक ने समझाया।
- चाचा, पता नहीं क्यों आपकी बात सुनकर मेरे अंदर का डर गायब हो गया है। अब मैं कभी नहीं डरुंगी। तो अब चले पापा के पास।
- हां बिल्कुल, लेकिन मुझे तुम अपनी फातिमा चाची के परिवार से परिचय नहीं कराओगी ?
- जरुर कराऊंगी चाचा, लेकिन पहले पापा से मिलने चलें।
कुछ देर बाद विवेक नेाह के साथ उस अस्पताल में पहुंचा जहां नेहा के पिता एडमिट थे। विवेक ने दिलासा देते हुए अपने बड़े भाई से कहा - डरिये मत भाई, आपका ये भाई आपके साथ है। बहुत जल्द सब ठीक हो जायेगा।
तब नेहा के पापा ने कहा - ये डर सिर्फ मुझे ही नहीं है विवेक, बल्कि पूरे देश को है। ये डर तब तक बना रहेगा जब तक ये खून खराबे होते रहेंगे। ये डर तब तब बना रहेगा - जब तक इसान दूसरे इसान को नहीं समझेगा। आज इसी डर ने तो मेरा ये हाल किया है। पता नहीं और कितनों को मेरी तरह तड़फना पड़ रहा होगा। क्या इस तड़प का कभी अंत होगा ?
- होगा भाई साहब, बहुत जल्द एक नया परिवर्तन होगा। जहां इंसान के दिल में डर नहीं सिर्फ प्यार बसा करेगा। अपनापन बसा करेगा, क्यों नेहा ?
- हां चाचा। नेहा ने कहा।
दोनों की बात सुनकर नेहा के मम्मी - पापा मुस्कुराकर रह गये।
- तो नेहा अगली गाड़ी से तुम अपने मम्मी - पापा के साथ चलोगी न, प्रियंका के पास। उसी ने तुम्हारा भेजा हुआ लिफाफा उठाया था और हां तुम्हें अपने साथ ले जाने से पहले मैं तुम्हारी फातिमा चाची रहीम चाचा और सलीम से मिलना चाहूंगा।
- ठीक है चाचा, लेकिन मैं आपके साथ अब नहीं जाऊंगी।
- ऐसा क्यों भला ?
- ऐसा इसलिए चाचा कि पहले मुझे डर लग रहा था लेकिन अब नहीं। पर जब भी मैं आपके पास जाऊंगी सलीम को साथ लेकर आऊंगी। प्रियंका भी सलीम से मिलेगी।
अगली सुबह कर्फ्यू पूरी तरह उठ चुका था। विवेक की बात सच साबित हुई। आज का सूरज नई रोशनी फैला रहा था। नेहा ने विवेक को फातिमा चाची और उनके परिवार से मिलवाया। विवेक उसी दिन वापस अपने घर लौट पड़ा क्योंकि नेहा और उसके मम्मी पापा की देख रेख की सारी जिम्मेदारी फातिमा चाची और रहमान चाचा ने ले ली थी।
विवेक ट्रेन में बैठा हुआ पूरी तरह से निश्चिंत था। विवेक से भी ज्यादा निश्चिंत हो गयी थी नेहा। उसे अब डर नहीं लग रहा था। उसे खुशी थी कि सलीम उसके साथ हैं। कल दोनों फिर साथ - साथ स्कूल जायेंगे .....।

  • पता - हाउसिंग बोर्ड कालोनी, कमला कालेज रोड, राजनांदगांव (छ ग )

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