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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 29 जून 2013

जिधर देखूं उधर मुझको



- विजय ' तनहा ' -

जिधर देखूं उधर मुझको मंजर दिखाई दे।
कहीं पर बम दिखाई दे कहीं पर खंजर दिखाई दे।

पढ़ी है कौन सी भाषा, बनाया कौन सा मजहब,
जिसे अपने ही भाई में सदा अंतर दिखाई दे।

वतन के हाल पे आँसू बहाओ मत, हँसों यारों,
गुलामी के दिनों से जो बहुत बद्तर दिखाई दे।

लहू अपना बहाकर के किया आजाद भारत को,
उसी भारत में क्यों दागी मुझे खद्दर दिखाई दे।

दिलों में भाव नफरत का यहाँ हर घड़ी दिखे,
धरा में प्यार की पावन क्यों बंजर दिखाई दे।

कहीं मंदिर का है झगड़ा, है मस्जिद का,
ये कुर्सी के लिए झगड़ा यहाँ अक्सर दिखाई दे।

महल ख्वाबों के बनते हैं जो अक्सर टूट जाते हैं,
नसीबों में गरीबों की, सिर्फ छप्पर दिखाई दे।
  • पता - अवध भवन, पुवायाँ [ शाहजहाँपुर उ.प्र. ]

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