इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 10 जून 2013

दिव्य पुरूष


  • कांशीपुरी कुंदन
माता पिता, रिश्तेदारों, मित्रों के बहुतेरे समझाने के बावजूद मोहमाया, घर द्वार को त्यागकर सन्यास ले लिया. कई वर्ष गुजर गए उसका कहीं कुछ पता नहीं चला. एक दिन मुझे कायर्वश कलेक्‍टरेट जाना पड़ा. जैसे ही प्रवेश द्वार में मैंने कदम रखा एक चमचमाती कार पर नजर पड़ी, जिसे कुछ लोग घेरे खड़े थे. जिज्ञासावश मैं भी कार के समीप चला गया. कार के भीतर पीताम्बर ओढ़े, चौड़े गोरे ललाट पर लंबी तिलक लगाए जैसे कोई दिव्य पुरूष हो विराजमान थे जिन्हें लोग स्वामी जी के नाम से संबोधित कर रहे थे, परन्तु पहली नजर में मुझे लगा - शायद इन्हें कहीं देखा है. कोशिश करने पर धुंधली यादें मानस पटल पर अंकित होने लगी क्‍योकि स्वामीजी की सूरत वर्षों सन्यास धारण किया हमारे गांव के किशुन से हू - ब - हू मिल रही थी. मैंने गौर से उन्हें देखा, शायद वे मेरी इस हरकत को भांप गए इसीलिए इशारे से मुझे अपने करीब बुलाकर बोले - वत्स, तुम घटकरार् पांडुका गांव के रामलाल हो न ? मैंने जी कहते हुए जिज्ञासा शांत करने के लिए उनसे प्रश्न किया  - कहीं आप किशुन तो नहीं हैं ? उन्होंने मेरे मुंह परहाथ रखते हुए कहा - हां, तुमने ठीक पहचाना. मैं वही हूं. पर अब हमें लोग स्वामी कृष्णानंद के नाम से जानते हैं.
इसी मध्य  उनका एक सेवक तेज कदमों से च लकर आया और कहने लगा - स्वामी जी, आज फिर साहब नहीं है. सुनवाई की तिथि आगे बढ़ गई है. यह सुनकर स्वामी जी की भृकुटि तन गई. आक्रोश भरे अंदाज में बोलने लगे - यह अदना सा कलेक्‍टर हमें कितने चक्‍कर लगवाएगा. अगर हमने अपने आश्रम के लिए सौ - पचास एकड़ सरकारी जमीन घेर ली है तो किसके सिर पर गाज गिर गया ? किसकी शवयात्रा निकल गई ? मैंने उन्हें शांत किया और बिदा ली. वे भी धूल उड़ाते हुए मेरी नजरों से ओझल हो गए, परन्तु स्वामी कृष्णानंद उर्फ किशुन कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गए जिसका जवाब आज तक ढ़ूंढ़ नहीं पाया कि जो व्‍यक्ति अपने पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद धन दौलत, मोहमाया, घर - द्वार तजकर सन्यासी हो गया था वही व्‍यक्ति आश्रम के नाम पर लाखों की सरकारी जमीन हथियाकर कोर्ट - कचहरी का चक्‍कर क्‍यों लगा रहा है.
  • मातृछाया, मेला मैदान, राजिम (छ.ग.),    मोबाइल - 98937 - 8819

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