इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 19 जून 2013

दर्द मैं उधार चाहता हूं


राजेश जगने ' राज '
(1)
दर्द मैं उधार चाहता हूं
थोड़ा नहीं, बेशुमार चाहता हूं
जख्‍मों के गुलिस्तां में दर्द का
बनाना मैं मज़ार चाहता हूं
जिन हाथों में ईबादत के छाले हैं
तड़प का वहां दरबार चाहता हूं
बदन के पुर्जों पर जब दर्द नवाजेगा
मजलूम आँसुओं की बौछार चाहता हूं
दर्द में कयामत और कायनात है
राज दर्द का मैं तलबगार चाहता हूं।
(दो)
जिन्दगी तैरती मौत के समंदर में
जिन्दा लाश देखा जनाजे सफर में
दफ़न हो गये वो तमाम इंसा
फरिश्ते मिले भी तो कबर में
जीवन के अर्थों को अर्थी में रख
रूखसत हो जायेंगे आखरी डगर में
खुदा न फरिश्ता बन नेक इंसा
गुनगुनायेंगे गजल गॉव - शहर में।
स्‍टेशन पारा, सोली खोली, राजनांदगांव (छ.ग.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें