इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 15 जून 2013

पांचवा बेटा

  • गिरीश बख्शी
नन्दन ने निश्चिन्तता से कहा - भांजे की शादी का सब कार्ड तो बांट दिया. सिर्फ एक रह गया है.मनमौजी राम को चलों दे आये. शाम का घूमना भी हो जायेगा''
मैंने कहा - पर कार्ड में तो मनराखन प्रसाद लिखा है.ये मनमौजी राम कहां से आ गए ?''
नन्दन हंस पड़ा - मनराखन उनके पिता का दिया नाम है और मनमौजी उन्हें उनके स्वभाव के कारण लोग कहने लगे हैं .''
मनमौजीराम को देखा तो चकित रह गया. पैंसठ एक साल की उम्र उनकी.बड़े मनोयोग से भिंडी काट रहे थे.घर में और कोई नहीं था.जब वे पानी लाने भीतर गये तो नन्दन ने बताया - इनकी पत्नी बड़ी सीधी थी. चार - पांच  साल हुए, एक दिन हार्ड अटेक से चल बसी.''
मैं उत्सुक हुआ - और लड़के बच्‍चे ?''
नन्दन भीतर कमरे की ओर देखते हुए कहा - चार हैं, धरम,परम,करम और शिवम.''
- तो ये अपने बेटों के साथ.... ।'' मेरी स्वाभाविक जिज्ञासा को देख नन्दन बोल उठा - चाचाजी आ रहे हैं, चार बेटे और एक बाप का किस्सा मैं बाद में सुनाऊंगा''
कार्ड हाथ में रख कर मनमौजी रामजी ने कहा  - शादी में आ तो नहीं सकूंगा नन्दन. देख तो रहे हो इस उमर में भिंडी काट रहा हूं.अपनी झंझट और परेशानियों में ही मैं मस्त और त्रस्त रहता हूं.फिर आजकल घर छोड़ना भी खतरे से खाली नहीं.चोरी का भय  बना रहता है.ये लो इक्‍कीस रूपये तुम शादी में दे देना.''
रास्ते में मैंने कहा - चार बेटे और पैंसठ साल के बूढ़े के भिंडी काटने का रहस्य क्‍या है ?''
नन्दन बोला - स्वभाव ! आदमी का अपना स्वभाव.एक से एक आदमी है इस दुनिया में.अपने विचित्र स्वभाव के कारण कष्‍ट तकलीफ पाते हैं पर अपने उस स्वभाव को छोड़ नहीं पाते हैं.वे अपने स्वभाव के साथ जीते हैं और स्वभाव को साथ लिए मर जाते हैं.मनमौजी रामजी भी ऐसई अद्भुत प्राणी हैं . इसीलिए तो वे मनराखन से मनमौजी राम कहलाने लगे हैं.
सुनो ! मनराखन बाबू कभी एक दिन अपने बड़े बेटे धरम के घर बिलासपुर गये.बिलासपुर में नौकरी है उसकी. अक्‍टूबर का महीना.जरा- जरा सा ठंड शुरू हुई थी.नौ बजे सबेरे घर पहुंचे.बहू से क हा -जरा पानी गरम कर दो , नहा लेता हूं.''
बहू ने कहा - बाबूजी, बोरिंग का पानी गरम रहता है. मैं बाल्टी भर देती हूं.''
बस, फिर तो मनराखन बाबू दुवार्सा हो गये - कल की छोकरी मुझे नसीहत देती है.कहां है तेरा पति वो धरम.बता देना उसे, मैं उसके घर में अब एक मिनट नहीं रूक सकता.''
ऊपर कमरे में आफिस की फाइलों में उलझे धरम दौड़ते - दौड़ते आता इसके पहले मनराखन बाबू, मनमौजीराम हो गया.अपना झोला उठाकर स्टेशन चल पड़े थे.
मैंने हंस कर बोला - यह तो अजायबघर का प्राणी है भाई. बड़ा क्रोधी.''
नन्दन ने कहा - जो अहमी होता है भाई. वही क्रोधी होता है.अहम की मात्रा के हिसाब से क्रोध घटते बढ़ते रहता हैं.अब दूसरे बेटा परम के घर नहीं रहने का किस्सा सुनो. वह भाटापारा में स्कूल टीचर है.शाम को मनमौजीराम पहुंचे.और रात में जब कुम्हड़े की सबजी परोसी गई तो एकदम भड़क गये.जोर से थाली को सरका कर भभक उठे - ये मंझली बहू,मैं शाम को यहां आया हूं और तुम जानती हो कि मुझे कुम्हड़ा जरा भी पसंद नहीं.फिर तुमने कुम्हड़ा क्‍यों बनाया ? बोलो ! अब ये अपने गुलाम परम की ओर टुकुर - टुकुर क्‍या देखती हो ? ये तो तुम्हारा ही पक्ष लेगा. तुम बोलो, तुमने कुम्हड़ा क्‍यों बनाया ?''
डरी - सहमी मंझली बहू किसी तरह बोली - बाबूजी, मैं भूल गई थी कि आपको... ।''
मनमौजी राम ने बहू को घूरते हुए कहा - तो ठीक है, मैं ऐसी भुलक्‍कड़ बहू और ऐसे नासमझ बेटे के घर एक पल नहीं रह सकता.तुम दोनों खाओ, छक कर कुम्हड़ा. मैं ये चला.''
परम ने विनती की - बाबूजी,आप रूक जाइये मैं दूसरी सब्‍जी बनवा देता हूं.''
मनमौजी राम का स्वर और कसैला हो गया - तू क्‍या बनवायेगा रे ! तेरी बात तेरी औरत मानती है क्‍या ? और वे रात में ही तेजी से निकल पड़े.राय पुर निवासी तीसरे लड़के करम के यहां नहाना - धोना खाना - पीना सब ठीक रहा तो मनमौजी राम को अखबार की परेशानी.वे बरामदे की आराम कुर्सी पर आराम से बैठे अखबार पढ़ रहे होते कि पीछे से करम का लड़का जोर से अखबार खींच कर भाग जाता और हीं..हीं.. हंसता. मनमौजीराम तब नाराज हा उठते. वे उसे चपत लगाने दौड़ते कि वह सड़क पर भाग जाता.ऐसा एक नहीं अनेक बार हुआ.उन्हें तब और क्रोध आता जब वे देखते कि बदमाश बबलू को न उसकी मां कुछ कहती और न बाप करम. एक ही बच्‍चा होने के कारण उन्होंने उसे सर चढ़ा रखा था. आखिर एक दिन वे कुद्ध हो उठे, बबलू पर नहीं उनके मां बाप पर. - ये क्‍या तमाशा बना रखा है घर को. सात - आठ साल का बबलू और उसे सिखाया नहीं बड़ों की इज्‍जत करना.सत्रह बार हो गया कभी वह अखबार छीन कर भागता है तो कभी छड़ी,चप्पल को इधर - उधर छिपा देता है और तुम लोग हो कि... हां, मैं समझ गया, तुम सब यही चाहते हो कि मैं यहां से चला जाऊं. तो लो, मैं अभी, इसी दम चला जाता हूं. और फिर वे अपनी झोला उठा,छड़ी टेकते जल्दी - जल्दी निकल पड़े.
मैं कथा रसिक कह उठा - अब चौथे बेटे शिवम के यहां की कथा सुनाइए.''
नन्दन ने कहा - चलो,किसी होटल मे दही कचोड़ी के साथ चाय पी जाय''  .
मैं खुश हो गया.दही कचोड़ी के साथ - साथ मनमौजी राम के चौथे बेटे की कहानी में और रस आयेगा.
नन्दन ने कचोड़ी को चम्मच से मसलते हुए कहा - हां, तो चौथा बेटा शिवम रहता है दुर्ग में.प्राइवेट फर्म में काम करता हैं.एक बड़े से बाड़े के सामने वाले मकान में रहता है.मकान है एक कमरे का, सामने छोटा सा बरामदा है जहां तखत पर मनमौजी राम के लिए बिस्तर लगा दिया गया.नन्हा बन्टी खुश - खुश आकर दादाजी के पैर दबाने लगा और उनसे राजा - रानी की कहानी सुनने लगा.बहू जब पानी रखने आयी तो मनमौजी राम मुग्धभाव से बोले - बहू, तुमने भिंडी की सब्‍जी खूब बढ़िया बनाई.वाह ! मजा आ गया.शिवम कहां गया है ?''
बहू ने धीमे स्वर में कहा - बाबूजी, वे मच्छर मारने वाली अगरबत्ती लाने गये हैं. आपको जिससे ठीक से नींद आये.''
मनमौजीरा ने सोचा - कितना लायक बेटा,कैसी पाक कुशल बहू और कैसा प्यारा नाती . पर हे राम ! वे रात भर सो नहीं सके.मच्छरों के कारण नहीं, बाड़े के हल्‍ले के कारण.अजीब उजबक हैं ये बाड़े वाले.यहीं सामने आकर अपने घर में आवाज देते हैं और जोर - जोर से बात करते हैं. रात ग्यारह - बारह बजे धड़धड़ाते हुए मोटर साइकिल दौड़ाते बाड़े में आते हैं.कैसे निशाचर हैं ? मनमौजी राम का तो सोना मुहाल हो गया. आखिर दूसरे दिन उन्हें कहना पड़ा - शिवम, मैं आज जाता हूं. तुम्हारे इस बाड़े के मकान में तो मेरा सोना मुश्किल हो गया.रात भर शोर मचाते हैं तुम्हारे ये बाड़े वाले.जब तुम कोई अलग से मकान लोगे तो मैं आऊंगा''
और शिवम को अभी तक कोई अच्छा सा मकान नहीं मिला है. पीछे से आवाज आयी.हम दोनों ने देखा - वह अरविन्द था.दुनिया भर की खोज खबर रखने वाला अरविन्द. हमारा साथी.
- तो मनमौजी रामजी अपने चार बेटे के होते हुए भी अपने घर में अकेले हैं . मैंने कथा का समापन किया.
अरविन्द ने तुरंत मेरी बात काट दी - अकेले नहीं हैं मनमौजीराम, अकेले नहीं है... । वे अपने पांच वें बेटे के साथ हैं...।''
- पांचवा बेटा.. ?आश्‍चर्य चकित हो गया मैं. हैरान नन्दन पूछ उठा -  पांचवा बेटा कौन ?''
अरविन्द ने शांत भाव से मुस्कराते हुए कहा - पांचवा बेटा, उनका पालित - पोषित बेटा - अहम.... ।
दिग्विजय कालेज रोड, बाम्‍हाणपारा, राजनांदगांव (छ.ग.)

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