इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 25 जून 2013

गोदान को फिर से पढ़ते हुए का लोकार्पण

गोदान को फिर से पढ़ते हुए का लोकार्पण
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के राधाकृष्णन सभागार में साखी के नये अंक गोदान को फिर से पढ़ते हुए का लोकार्पण हुआ। इस अंक का लोकार्पण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. धीरेन्द्र पाल सिंह ने किया।
इस अवसर पर उन्होंने कहा कि साखी एक महत्वपूर्ण पत्रिका है। और मुझे यह जानकर अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि प्रेमचंद की 125 वीं जयंती के अवसर पर कांशी हिन्दू विश्वविद्यालय में  गोदान को फिर से पढ़ते हुए तीन दिवसीय अंर्तराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ था। इसमें देश - विदेश के प्रतिभागियों ने भाग लिया था। कबीर और प्रेमचंद भारतीय साहित्य के अग्रणी लेखक है। गोदान विश्व साहित्य की प्रमुख कृतियों में से एक है। साखी के इस अंक से प्रेमचंद  और गोदान को समझने की एक नई दृष्टि मिलेगी। युवा पीढ़ी को अपनी परंपरा एवं संस्कृति को जानने समझने का अवसर मिलेगा। इस अवसर पर साखी के संपादक एवं प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो. सदानन्द शजी ने बताया कि प्रेमचंद साहित्य संस्थान के स्थापना की प्रेरणा उन्हें सोवियत संघ के गोर्की संस्थान से मिली। उन्होंने कहा कि कबीर और प्रेमचंद साहित्य एक ही परंपरा से जुड़े हुए हैं और साखी  उसी परंपरा के प्रति प्रतिबद्ध है। संचालन करते हुए प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा  कि अपने सीमित संसाधनों के बावजूद साखी ने समकालीन जीवन और साहित्य पर कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। इसके नायपॉल और एडवर्ड सईद विशेषांक की चर्चा हिन्दी के बाहर भी हुई है। अध्यक्षता करते हुए कला संकाय प्रमुख प्रो. सूर्यनाथ पाण्डेय ने कहा कि साखी ने सईद और नायपॉल पर जितना काम किया है उतना अंग्रेजी में भी नहीं हुआ है।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो. बलराज पाण्डेय ने कहा कि साखी मात्र एक पत्रिका नहीं बल्कि एक आन्दोलन है। और इस आन्दोलन में पूरी प्रतिबद्धता के साथ वह खड़ी है।
साखी के इस अंक में नामवर सिंह, पी.सी. जोशी, पी. एन. सिंह, मारियोला आफरीदी, डाग्मार मारकोवा, शंभुनाथ, विजेन्द्र नारायण सिंह, कंवल भारती, कर्मेन्दु शिशिर, परमानंद श्रीवास्तव ए. अरविंदाक्षन, गोपाल प्रधान आदि लेखको के गोदान पर केन्द्रित लेख हैं। इस अवसर पर कई साहित्यकार उपस्थित थे।   

जगदीश किंजल्क की पुस्तक का लोकार्पण
भोपाल। अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन का बाईसवाँ राष्ट्रीय अधिवेशन विगत दिनों भोपाल में पूरी गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। चित्रांश कालेज सभागार में सम्पन्न इस अधिवेशन में अनेक भाषाओं के विद्वानों ने भाग लिया।
इस अवसर पर राष्ट्रीय ख्याति के अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों के संयोजक, चर्चित साहित्यिक पत्रिका दिव्यालोक के संपादक एवं वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश किंजल्क की सद्य: प्रकाशित महत्वपूर्ण कृति म.प्र. की जनपदीय कहावतें : बुंदेलखण्ड का लोकार्पण म.प्र. शासन के संस्कृति एवं जनसम्पर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने किया। इसका प्रकाशन म. प्र. आदिवासी कला परिषद भोपाल द्वारा किया गया है। इस में जगदीश किंजल्क द्वारा दो हजार कहावतों का संकलन किया गया है। इस अवसर पर उपस्थित भोपाल के अनेक विद्वानों ने श्री किंजल्क को बधाईयाँ दीं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें