इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 27 जून 2013

पथराई आँखें




-  मनोज कुमार शुक्ल '' मनोज ''  -

सरस्वती आज फिर गाँव की कच्ची सड़क पर बढ़ी जा रही थी। सन की तरह उलझे सफेद बाल, सूखी अंदर धंसी आँखें, झूर्रियों से भरा हड्डियों का ढांचा जो कमानी सा झुक गया था। अपनी बाई हाथ की मुट्ठी में लाठी का ऊपरी हिस्सा मजबूती से पकड़ रखा था। यही सहारा अब उसे गतिवान बनाए था।
वर्षों गुजर गए थे। उसे आज भी गाँव में किसी कृतज्ञ मानव की तलाश थी, जो उसकी कुर्बानियों को याद कर सहारे की लाठी बन सके।
इस सड़क से हजारों बार गुजरी थी। अब वह इस ऊबड़ - खाबड़ सड़क पर चलने की अभ्यस्त हो गयी थी, इस उम्र में भी। पैरों की स्मरण शक्ति गजबकी थी। वह अपने जमीन को अच्छी तरह पहिचानती थी। आज और कल में फर्क सिर्फ इतना था कि आज उसके कांपते हाथें एक कटोरा है। पिचका, टुचका जो उसके धंसे पेट के समान था। अब उसकी सारी जिंदगी भी तो इसी कटोरे में सिमट कर रह गयी थी। कल इन्हीं हाथों में सिर को ढांकता साड़ी का पल्लू रहता था और चेहरे में खुशहाली की चमक दमक।
चौराहे के निक ट पहुंच कर थोड़ा ठिठकी। बीचों बीच गांव के नेता जी की प्रस्तर - मूर्ति लगी थी। वह हंसी और व्यंग्यात्मक मुसकायी। चौराहे के एक छोर पर बने कच्चे चबूतरे पर आकर बैठ गयी। वह चबूतरा उसके अतीत का एक बड़ा हिस्सा था। पैंतालीस वर्ष पूर्व गाँव की पंचायत की बैठकें होती थी, विवादों को सुलझाने।
तब वह पच्चीस वर्ष की थी। उसके पति रामप्रताप शर्मा जीवित थे। सच्चे जीवन साथी। पड़ोस के गाँव में शिक्षक थे। पड़ोस के गाँव में शिक्षक थे। सभी उन्हें गुरुजी कहते थे। एक माह पूर्व आजादी की वर्षगांठ मनाने इसी चबूतरे पर पंचायत बैठी। किन्तु तू - तू, मैं - मैं .. से बात बढ़ते हाथापाई परउतर आयी थी। परिणाम कुछ नहीं निकला।
बात साधारण थी। गाँव के मुखिया पुराने जमींदार थे। वे अपने दल के नेता को बुलाकर ध्वाजरोहण करवाना चाहते थे। दूसरी ओर विरोधी पक्ष अपने नेता से। निजि स्वार्थोंे के बीच बेचारी राष्ट्रीयता फंस कर रह गयी थी, कैसे सुरक्षित रह पाती। राष्ट्रीय पर्व पर भी अपने - अपने स्वार्थों की रोटियाँ सेकी जा रही थी।
तब गुरुजी ने गाँव के कुछ होनहार युवकों को इक्‍कठा किया। गाँव की ऊबड़ - खाबड़ सड़क की जगह पक्की सड़क बनाने और उसे शहर के मुख्य मार्ग से जोड़ने का प्रस्ताव रखा ताकि पहले समतल पथ का निर्माण करके फिर गाँव का विकास किया जा सके। इनकी योजना को क्रियान्वित करने, अनेक युवकों के साथ ग्रामवासी भी फावड़ा, कुदाल लेकर जुट गए। गुरुजी के निर्देशन में पहले चाक की लाईन डाली गयी, फिर बड़े तरकीब से पत्थर जमाए गए। सबके सहयोग से पन्द्रह दिनों में ही सड़क बनकर तैयार हो गयी। गाँव के लोग उस पथ पर जितनी बार आते - जाते खुशी से फूले ना समाते।
गुरुजी के कार्य की प्रशंसा घर - घर तक जा पहुंची थी। गाँव के सभी जवान बूढ़े जो कभी सरपंच और नेताओं के इर्द - गिर्द मंडराते रहते, अब गुरुजी के कायल हो गए थे। तब सरपंच भी अपने बौने व्यक्तित्व से शर्मिन्दा होकर स्वत: गुरुजी का लोहा मानने लगे। गाँव के सभी लोगों ने पन्द्रह अगस्त पर ध्वजारोहण गुरुजी द्वारा कराने का प्रस्ताव रखा। काफी टालमटोल के बाद गुरुजी को आखिर जनमत के आगे झुकना पड़ा। उस दिन कार्यक्रम में गाँव के हर नर - नारी बच्चे शरीक हुए।
कुछ लोगों का जीवन भी अद्भुत है। समाज के लिए नये - नये आयाम स्थापित करने हेतु सदैव तत्पर रहते हैं। उनके जीवन में निजी स्वार्थों की कोई जगह नहीं रहती। गाँव के बच्चे दस किलोमीटर चल कर दूसरे गाँव पढ़ने जाएं। यह गुरुजी को अच्छा नहीं लगता था। अपनी जीवन भर की कमाई को उन्होंने इस स्वप्र को मूर्त रुप देने में झोंक दिया।
अपने ही खेत के एक हिस्से में पाठशाला के लिए कमरों का निर्माण प्रारम्भ कर दिया। जीवन की गाढ़ी कमाई शिक्षा के मंदिर में व्यय होती जा रही थी। एक बार शादी की साल गिरह पर जब गुरुजी साड़ी की जगह ब्लैक बोर्ड उपहार देने लगे तो वह झल्ला पड़ी थी। वह लड़ बैठी थी उस दिन - यह तुम्हें कैसा जुनून सवार है। शादी की साल गिरह  पर ब्लैक बोर्ड ? उठाकर फेंक दिया था बाहर। तब गुरुजी ने उसे मनाते हुए कहा - सरस्वती, यह स्कूल किसका है, मेरा ? नहीं, यह तुम्हारे सहयोग के बिना बन ही नहीं सकता है। इसलिए जानती हो - इसका मैंने क्या नाम रखा है - सरस्वती विद्यालय ...।
उन्होंने पास खींचते हुए कहा - यह विद्यालय ज्ञान का ऐसा आलोक बिखेरेगा, जिससे हमारे देश का भविष्य उज्जवल हो जाएगा। इस साक्षरता से हमारे गाँव में ही नहीं, देश में खुशहाली आ जाएगी। कहकर मुझे प्यार से बांहों में भर कर झूमने लगे थे।
कैसा अनोखा प्यार था। उनमें व्यक्तिगत स्वार्थ को परमार्थ में बदलने की अद्भुत शक्ति थी। जो विलक्षणों  में ही पायी जाती है। दूसरे दिन ही सरस्वती विद्यालय का बोर्ड लग गया था। गाँव के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया था। शाम को गाँव के अपढ़ लोगों की कक्षाएं लेने लगे थे। लोगों को शिक्षित करने और उनमें अच्छे संस्कार जगाने के लिए उन्होंने सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था ....।
सिर के ऊपर सूर्य आ गया था। अपने पोपले गालों और सिलवटी माथे पर धूप  से उभर आई पसीने की बूंदों को पोंछा और लाठी उठाकर खाली कटोरा लिए ही वह घर की ओर चल पड़ी।
ओठों को बार - बार जीभ से तर करती करती थक गयी थी। ऊपर से पेट की आंतड़ियों की मरोड़ ने हाथ - पांव को सुन्न कर दिया। घर में रखे मटके की तलहटी से पानी निकालकर,  अपनी सूखे गले को तर किया। कुछ राहत मिली। परछी के खम्बे का सहारा लेकर बैठ गयी। सामने शासकीय सरस्वती विद्यालय का बोर्ड लगा था। पढ़ाई का समवेत स्वर गूंज रहा था। सामने मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे। पहले यही दृश्य और आवाजें उसका सुनहरा सपना था। वह अपने गुरुजी के साथ सरस्वती विद्यालय के हर विद्यार्थी में उनके भविष्य की संभावनाएं तलाशती।
- यह लड़का बड़ा होकर इंजीनियर बनेगा।
- यह डॉ. बनेगा।
- यह बड़ा बाबू बनेगा।
- यह खिलाड़ी बनेगा।
यही सोचकर दोनों को आत्मसंतोष और गौरव की अनुभूति होती रहती। वे अपनी औलाद ना होने का दुख भी भूल गए थे। दोनों ने बड़ी मेहनत और त्याग तपस्या से इस पाठशाला की नींव रखी थी।
एक दिन अचानक गुरुजी का निधन ने सभी को चौंका दिया। सरस्वती पर तो मानो एकाएक दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सहानुभूति सांत्वनाओं का दौर चला। कब छह माह बीत गए, आभास ही ना हो पाया। समय इंसान को कठिन परिस्थितियों में चलना सिखा देता है। स्वाभिमानी सरस्वती ने कमर कस ली। स्कूल के पास पड़ी जमीन पर खेती करने लगी। जिससे गुजर - बसर चलने लगा।
पांच बरस गुजर गये थे। एक दिन गांव की चौपाल का बुलावा आया। नेताजी ने उसे विशेष रुप से बुलाया है। शाम की सभा में गांव के कई लोग एकत्र हुए। नेताजी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा - भाइयों और बहनों, हमारे गांव के लिए खुशी का समाचार आया है। एक सरकारी स्कूल खोलने का प्रस्ताव है। मेरे मन में विचार आया है कि क्यों न सरस्वती विद्यालय  को शासकीय विद्यालय में परिवर्तित कर दिया जाए। फिर यहाँ भव्य स्कूल के साथ - साथ खेल का मैदान भी बन जाएगा। मेरे ग्रामवासियों एवं आदरणीय सरस्वती देवी। यह सपना हमारे गुरुजी का था। उसे पूरा करने का आज अवसर मिल रहा है। त्याग - तपस्या बलिदान और चिंतन ने गांव को नई दिशा दी है। सरस्वती देवी यदि स्कूल के साथ - साथ अपनी खेती की जमीन दान में दे दें तो हम सभी उनका यह उपकार कभी नहीं भूलेगें। हम सभी उनके कृतज्ञ रहेंगें। जहाँ तक उनके गुजर - बसर का प्रश्न है। हम सभी उनकी जिम्मेदारी लेते हैं। शेष जीवन वे आराम और सम्मान के साथ गुजारेंगी। वे किसी प्रकार की चिंता न करें।
सरस्वती ने अपने साठ वर्षीय जीवन का लेखा - जोखा लगाया फिर शेष क्षणों को उंगलियों पर गिना। नेता जी के आश्वासन को पाकर वह संतुष्ट हो गयीं। गुरुजी के सपनों के सामने उसे अपना जीवन तुच्छ एवं बौना नजर आया। सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी।
गाँव की चौपाल जय - जय कार के नारों से गूँज उठी। सभा समाप्त हुई।
सरस्वती के पास सिर छिपाने को एक कमरा और छोटी सी परछी भर शेष रह गयी थी।
वह नेताजी के आश्वासनों की गठरी कुछ वर्षों तक ही सहेज पायी। गाँव की चौपाल भी भूल गयी उसके त्याग और बलिदानों को। अपने किए गए वायदों से लोग मुकरने लगे। सम्मान की जगह दया की पात्र बन कर रह गयी। कभी उसने सोचा था शिक्षा से ज्ञान का आलोक बिखरेगा। लोगों के अन्तस मन में मानवता के भाव जागेंगे। शिक्षा उनके अन्दर संस्कारों का बीजारोपण करेगी। भविष्य में सभी को उस वृक्ष से अमृत फल मिलेगा। जिससे समाज राष्ट्र अजेय और अमर हो जाएगा।
किन्तु सरस्वती को क्या मिला ? कृतध्नता, उपेक्षा और हाथ में दया की भीख का वह टुचका पिचका खाली कटोरा ...। जो आज दो दिनों से खाली थी। मटके की तलहटी से पानी निकाला और फिर खाली पेट को भरकर समझाने का प्रयास किया किन्तु व्यर्थ रहा ...।
सुबह परछी के उसी खम्बे के पास ज्ञान की प्रतिमूर्ति सरस्वती का पार्थिव शरीर एक ओर लुढ़का पड़ा था। उसकी निगाहें सरस्वती विद्यालय की ओर थीं। जैसे उसकी पथराई आँखें अब भी उससे कुछ उम्मीद कर रही थीं। गाँव के बस दो - चार लड़के उसके इर्द - गिर्द खड़े थे। उसकी निर्जीव शरीर पर कृतध्नता की मक्खियाँ बुरी तरह भिनभिना रहीं थीं।
यह मूक दृश्य गाँव के सामने ही नहीं वरन देश के सामने एक प्रश्न बन कर खड़ा था। यदि त्याग, बलिदान का यही प्रतिफल है तो भविष्य में कौन इस महायज्ञ की बेदी पर अपनी आहुति देगा ?
  • पता - 58, आशीषदीप, उत्तर मिलौनीगंज, जबलपुर (म.प्र.) मो. 9425862550

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