इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 4 जून 2013

बलवती होती मान - सम्मान पुरस्कार हड़पो नीति




मान - सम्मान, पुरस्कार हड़पो नीति आज बलवती होती जा रही है। मान - सम्मान और पुरस्कार के आज हकदार वे होते जा रहे हैं जो राजनीतिक गलियारों में दखल रखते हैं। तुलसीदास के कर्म प्रधान की जगह चाटुकारिता प्रधान ने ले लिया है। जो जितना अधिक चाटुकारिता करेगा उसे उतना ही ज्यादा मान सम्मान, पुरस्कार मिलेगा।
कई लेखक है जो नित्य कर्म में रत लेखन कर रहे हैं मगर न तो वे मान - सम्मान पाने के भागीदार बन पाते हैं न पुरस्कार उन तक पहुंच पाता है। ऐसा क्यों ? कभी - कभार दो - तीन लाइन की कविताएं, गीत, $ग$जल या एकाध कहानी लिखने वाला व्यक्ति साहित्यकार होने का प्रमाण पत्र जुगाड़ कर लेता है और पुरस्कार हड़प लेता है मगर जो सैंकड़ों रचनाएं करता है वह  प्रमाण पत्र का मुखड़ा भी देखने तरस जाता है , ऐसा क्यों ?
मुंशी प्रेमचंद जीते जी और मृत्यु के बाद भी मुंशी प्रेमचंद ही रहे। मगर आज मुंशी प्रेमचंद और उनकी रचनाओं पर शोध करने वाले डाक्टरेट हो गये। इन शोध ग्रंथों के आधार पर देश का शीर्ष लेखक कहलाने का हकदार बन गये। ऐेसे लोग क्यों अपने आप में ऐसी ऊर्जा उत्पन्न क्यों नहीं करते कि उनकी रचनाओं पर भी शोध किया जा सके। जीवन भर अभाव से ग्रसित मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं पर शोध कर या अन्य उपयोग कर लोग आज ढनाड्य बन गये। मगर प्रेमचंद, मुंशी के मुंशी ही रहे।
मुंशी प्रेमचंद तो एक उदाहरण है। आज भी ऐसे कई साहित्यकार है जो जीवंत रचनाएं कर रहे हैं मगर राजनीतिक गलियारे में घुसपैठ नहीं होने के कारण वे पुरस्कार तो क्या, मान - सम्मान पाने के लिए तरस रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि पुरस्कार या मान - सम्मान व्यक्ति  की चाटुकारिता को नहीं अपितु उनकी रचनात्मक कार्यों का मूल्यांकन करके दिया जाना चाहिए। अगर इस पर अमल नहीं किया गया तो वे लोग सदैव पुरस्कार या मान सम्मान से वंचित रहेंगे जो कर्मपथ पर चल कर अपनी रचनाशैली से देश - समाज को दिशा देने का काम ईमानदारी के साथ कर रहे हैं और वे लोग पुरस्कार - मान - सम्मान को लुटते रहेंगें जो रचनाकर्म से दूर चाटुकारिता कर्म पर ही आश्रित रहेंगें।
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा भी शुरू से साहित्य के क्षेत्र में पंडित सुंदरलाल शर्मा साहित्य सम्मान पुरस्कार योजना शुरू  किया गया है पर मंथन करने पर कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि साहित्य का वह पुरस्कार उन्हें नहीं मिल पा रहा है जो सही में उस पुरस्कार के हकदार है। संस्कृति विभाग इस ओर गंभीरता से ध्यान दे तो निश्चित रूप में क्रमश: पुरस्कार उन्हीं लोगों को मिलने लगेगा जो उस पुरस्कार के हकदार है। और ऐसे लोग छंट जाएंगे जो राजनीतिक गलियारें में घुसपैठ कर पुरस्कार हड़पो नीति को अपनाते हैं।
फरवरी 2009
सम्‍पादक

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