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बुधवार, 5 जून 2013

हर आँख में पानी है


  • लक्ष्मीनारायण कुंभकार 'सचेत'
ये गीत नहीं सुन लो, टुकड़ों की कहानी है।
हर दिल में है टूटन, हर आँख में पानी है॥

अपने ही अपनों से, क्यों कटे हुए हैं लोग,
जात - पात के दल में, क्यों बंटे हुए हैं लोग,
क्यों एक नहीं होते, मुझको हैरानी है।
हर दिल में है टूटन, हर आँख में पानी है॥

पुतले हैं हम सबही, जब एक ही साँचे के
एक ही सिरजनहारा, सब एक ही खाँचे के,
क्यों रक्त नहीं उबला , क्यों सुप्त जवानी है।
हर दिल में है टूटन, हर आँख में पानी है॥

युग - युग से मानवता, होती है लहूलुहान,
ऊंच - नीच की खाई क्यों , भरा नहीं इंसान,
पशुओं सी तेरी कैसी, ये बेजुबानी है।
हर दिल में है टूटन, हर आँख में पानी है॥

क्यों इन्सानी छाया से कुछ लोगों को परहेज,
आज भी अपमानों की गाथा है रखा सहेज,
ये धर्म नहीं कोई, ये तो मनमानी है।
हर दिल में है टूटन, हर आँख में पानी है॥

उस रचने वाले ने तो, इंसान रचा केवल,
फिर किसने इस धरती में फैलाया अपना छल,
अब तोड़ो जीवन में, जहां वीरानी है।
हर दिल में है टूटन, हर आँख में पानी है॥
  • लुचकीपारा, दुर्ग ( छग.)

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