इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 3 जून 2013

वह अमेरिकन कन्या


  • डॉ. बच्चन पाठक 'सलिल'
जीवन में कुछ ऐसी आकस्मिक घटनाएं घटित हो जाती है जिनकी कल्पना व्यक्ति कभी नहीं किये रहता। इसी से पता चलता है कि जीवन सरल रेखाओं में गमन नहीं करता और सर्वथा पूर्व नियोजित नहीं रहता।
सनï् 1970 की बात है। अमेरिकन पीस कोर नामक एक अमेरिकी स्वयंसेवी संस्था के कुछ सदस्य भारत आये थे। उन्हें बिहार में दो वर्षों तक रहकर यहाँ के हाई स्कूलों के विज्ञान शिक्षकों को प्रशिक्षण देना था। पटना पाटलिपुत्र कॉलोनी में पीस कोर का कार्यालय था। इन विदेशी शिक्षकों को छह सप्ताह तक हिन्दी एवं भारतीय संस्कृति का प्रशिक्षण देने की योजना बनी। उस समय मैं जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज में हिन्दी अध्यापक था। मेरा चुनाव उक्त प्रशिक्षण के लिए किया गया।
मै पाटलीपुत्र कॉलोनी में उन विदेशी बन्धुओं के साथ रहता था। भारतीय संस्कृति का व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए उन्हें कार में बिठाकर गंगा किनारे, किसी मंदिर मे, पटना सिटी के गुरूद्वारा में या दियारा के गाँव में घुमाया करता था। उन्हें बतलाता था कि मंदिर में प्रवेश करने के पूर्व जूते खोल देने चाहिए या प्रसाद लेते समय कैसा आचरण करना चाहिए, महिलाओं के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए आदि। हिन्दी ज्ञान के नाम पर बातचीत के कुछ अंग्रेजी वाक्यों के हिन्दी रूपान्तर रटाया करता था।
परियोजना के निदेशक थे - जैक मैक्रेरी। श्रीमती मैक्रेरी समन्वयक थी। मैक्ररी दम्पति को दो तीन महीनों ही एक पुत्री थीं मैं उसे खेलाया करता था। वह भी मुझसे हिल मिल गयी थी।
एक दिन जैक ने मुझसे कहा - प्रोफेसर, इस लड़की का एक हिन्दी नाम रखो। यह नाम हमारे भारत प्रवास की स्मृति रहेगी।
मैंने कहा = पीस को हिन्दी में शान्ति कहते हैं। इस कन्या का नाम शान्ति रहेगा। वे खुश हो गये। बोले - सैन्टी, ओह नाईस। उसी दिन से वह कन्या सैन्टी शान्ति हो गई।
तैंतीस वर्ष बीत गए। स्वर्णरेखा का अकूत जल बह गया। समय का पहिया तेजी से घूमता रहा। मैँ भी विश्वविद्यालय की सेवा से निवृत्त हो गया। झारखंड राज्य बन गया।
सनïï् 2003 ई. में झारखंड सरकार के सचिवालय से मुझे फोन पर सूचना मिली कि सातवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन सूरीनाम में हो रहा है। मुझे भी राज्य की शिष्टïमंडल के सदस्य के रूप में जाना है।
झारखंड से कुछ साहित्यकार और समाजसेवी सूरीनाम दक्षिण अमेरिका के लिए रवाना हुए। मेरे अतिरिक्त डॉ. नागेश्वर लाल हजारीबाग, डॉ. दिनेश्वर प्रसाद, डॉ. अशोक प्रियदर्शी, डा. श्रवण कुमार गोस्वामी, डॉ. रविभूषण रांची, डॉ. भास्कर राव, प्रेमचन्द मंधान और लक्ष्मण टुडु जमशेदपुर शिष्टïमंडल में थे। यह मेरी पहली हवाई यात्रा थी। हम लोग दिल्ली से एम्सटर्डम हालैंड होते हुए पारामारिवों सुरीनाम पहुँचे।
सूरीनाम एक छोटा पर सुन्दर और मनोरम देश है। प्रशान्त महासागर के पास बसा यह देश अपने पुष्पों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। पारामारिवों का अर्थ होता है - फूलों का शहर। यहाँ एक ही वृक्ष की अनेक शाखाओं में भिन्न रंगों और आकार के फूल दिखाई पड़ते हैं। यहाँ 150 साल पहले भारतवंशियों के उत्तराधिकारी रहते हैँ और वे सूरीनाम के प्रतिष्ठिïत नागरिक हैं। वहाँ के उपराष्टï्रपति राम आयोध्या भी भारतीय मूल के हैं और अन्य भारतीयवंशियों की तरह घर में भोजपुरी बोलते हैं। युनेस्को ने पारामारिवो को इनहेरिटेज सिटी घोषित किया है।
मुझसे वहाँ के अधिकांश भारतवंशी भोजपुरी में बतियाते थे। एक मित्र राम पदारथ तो छाया की भाँति मेरे साथ लगे रहते थे और मैं सूरीनाम में भारत वंशियों की दशा पर सामग्री - संकलन कर रहा था।
हम लोग स्टारडस्ट नामक होटल में ठहरे थे। शाम के भोजन का वहाँ प्रबंध नहीं था। शाम को एक दूसरे होटल पाम पैलेस में जाना पड़ता था। चूंकि वहाँ प्राय: मांसाहारी होता था और वहाँ मदिरा की सरिता अबाध गति से बहती थी, इसलिए मैं नहीं जाता था। मैं अपने कमरे में ही रहता था, सूरीनामी मित्रों से बातें करता था और बिस्कुट, पावरोटी और कॉफी से काम चला लेता था।
हमारे होटल की प्रबंधक एक युवा अमेरिकी महिला थी। वह अपने काम में अत्यन्त दक्ष थी। टेलीफोन, मोबाइल और ई मेल से जूझते हुए अपनी सहेलियों के साथ होटल का सारा प्रबंध बहुत कुशलता से कर लेती थी।
उस मैनेजर को उसके सहयोगी सैन्टी कहते थे। मेरे दिमाग में एक प्रश्र कौंधा। कहीं यह सैन्टी पटना वाली कन्या तो नहीं ?
शाम को कार्यालय में भीड़ नहीं थी। साथी लोग बाहर चले गये थे। मैं एकांकी था और बरामदे से स्वीमिंग पुल तक का चक्कर लगा रहा था। मैंने उस युवती से उसका नाम पूछा। उसने कहा - सैन्टी ...।
मैंने कहा - हिन्दी में इसे शान्ति कहेंगे। इसका अर्थ पीस होता है।
वह चहक कर बोली - दैट इज माइ नेम। आज वाज वर्न इन इंडिया। वन  हिन्दी पंडित गैव मी दिस नेम।
अब संदेह की गुजाइश नहीं थी। मैंने कहा - वही पंडित तुम्हारे सामने खड़ा है। मैंने बचपन में तुम्हें गोदी में खेलाया है। वह अतीव प्रसन्न हो गई। अब वह मुझे अंकल कहने लगी। मैंने पूछा - जैक उसके पिता कहाँ है ? उसने मासूम होकर कहा - ही इज डेड। कुछ देर के बाद मैंने पूछा - ममी कहाँ है ? वह आवेश में आकर बोली - अंकल उसका नाम मत लो। पता चला कि पति की मृत्यु के पहले ही उसने तलाक ले लिया था और पुनर्निवाह किया था। सैन्टी को काफी संघर्ष करना पड़ा था।
उस दिन से संध्या समय मैं प्राय: सैन्टी के साथ व्यतीत करता। वह भी एक बेटी के समान मेरा आदर करती।
एक दिन होटल वालों ने हमें सूचना दी कि दूतावास से हमारे नाम अभी तक नहीं आये हैं, अत: तीन दिनों का किराया शाम तक चुका दें। यह एक नई आफत थी। हमारे पास उतने डॉलर नहीं थे फिर सरकारी निष्क्रियता का फल हम क्यों भोगे ? मैंने शान्ति से कहा। उसने तुरन्त टेलीफोन किया और फैक्स द्वारा प्रतिनिधियों के नाम मंगाए। मुझसे बोली - सूची आ गई है। झारखंड के प्रतिनिधियों के नाम टिक कर दो। किराया नहीं देना होगा।
सम्मेलन समाप्त होने वाला था। मैंने कहा - शान्ति, हम कल चले जायेंगे।
वह बोली - मत जाओ, कम से कम एक सप्ताह रूक जाओ। तुम्हारे रहने से मुझे मानसिक शान्ति मिल रही है। मैंने सोचा - यह एक अमेरिकन बेटी कहाँ गले पड़ गई ?मैंने कहा - हमारे टिकट सामूहिक है। रूकने से कैंसिल हो जाएगा।
शान्ति इतमीनान से बोली - अंकल, डोंट वरी। आइ शैल मैनेज।
तब मैंने कहा - क्या तुम अपने को मेरी बेटी मानती हो ?
- बिल्कुल । उसने कहा
- भारतीय पिता अपनी बेटी का एक भी गिल्डर सूरीनामी मुद्रा नहीं लेता। यह हमारी परंपरा है। मैंने कहा।
- ओह गॉड, वंडरफुल। यू आर ट्रैडिशनल। मैंने स्नेह पूर्वक उससे कहा - बेटा, हम भारतीयों के पास संस्कृति और परंपरा की ही थाती है। तुम्हारे यह प्रेम मेरे जीवन की सबसे बड़ी निधि है।
शान्ति में अपने हाथों से कॉफी बनाकर मुझे पिलाया। राम पदारथ ने उससे कह दिया - गुरूजी वेज हैं। शाम को भोजन नहीं करते। बेचारी कितनी उदास हो गई थी। बोली - मुझे पहले मालूम रहता तो मैं रोज फल मंगा देती।
मैं सोचता हूं - मानव ह्रïदय सर्वत्र एक सा है। वह देश और काल की सीमा नहीं मानता।
डी. रामदास भ_ïा, विप्टुपुर
जमशेदपुर

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