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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 29 जून 2013

बचपन

- हरप्रसाद ' निडर '  -

अंतर्मन की साँसे रिमझिम, जग में यूँ बगराया।
तब छंदो ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।
    शब्द - शब्द है अर्थ घनेरे,
    यादें बचपन की जिद्दी।
    फुदक रही है मन अँगना,
    डाल - डाल प्यारी पिद्दी।
जब - जब देखा उस अल्हड़ को, उसने खूब रुलाया।
 तब छंदों ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।
    आस लगी है वह जीवन हो,
    यह तो हो गया झमेला।
    लौट न पाता पर बेचारा,
    है लगता पड़ा अकेला।
फिर भी वह मौसम अलबेला, अपना कर्ज चुकाया।
तब छंदों ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।
    चंचल मन है बांध पखेरु,
    यहाँ - कहाँ वो रुकने वाला।
    उड़ चला विश्राम डगर पर,
    देख इधर का गड़बड़ झाला।
रात कटी, पल गुजरा बरबस, सपन सलोने भुलाया।
तब छंदों ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।

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