इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 27 जून 2013

क्या संस्कृति विभाग अपनी चैतन्य अवस्था का परिचय देगा ?




 न्याय जहां नीलाम चढ़ गया, यह कितना भीषण दुर्दिन है।
जहां दूध की नदियाँ बहती, पानी मिलना वहां कठिन है।


तीन वर्ष पूर्व की ही बात है। मैं छुईखदान गया था तब तक विचार वीथि में डॉ. रतन जैन की दो - तीन रचनाएं प्रकाशित हो चुकी थी। सच कहूं - मैं उनकी लेखनी से प्रभावित था । उनसे मिलने से मैं अपने आप को रोक नहीं सका। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। वे बड़ी आत्मीयता से मेरा स्वागत किये।
चर्चा चली। मैं पूछ बैठा - इतनी अच्छी रचनाएं लिखते हैं। पुस्तक क्यों छपवा नहीं लेते ? अब तो छत्तीसगढ़ राज्य बन गया है। मुख्यमंत्री भी अपने ही जिले के हैं। संस्कृति विभाग से अनुदान मिल ही जायेगा। उनका उत्तर था - मैंने मुख्यमंत्री से मुलाकांत की थी। उन्हीं के अनुग्रह पर मैंने पाण्डुलिपि संस्कृति विभाग को भिजवायी है। अनुदान मिलते ही पुस्तक छपवाऊंगा और पुस्तक आपको भिजवाऊंगा।
उनके चेहरे पर संतुष्टि और विश्वास झलक रहे थे। समय आया और चला गया। इस वार्तालाप के ठीक एक वर्ष बाद हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के अध्यक्ष वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने मुझे डॉ. रतन जैन की गीत - कविता संग्रह रक्तपुष्प नामक कविता - गीत संग्रह पुस्तक दी। मैंने सोचा - यह पुस्तक संस्कृति विभाग के सहयोग से छपी होगी मगर मुझे बताया गया कि संग्र्रह हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के द्वारा छपवाया गया है। संस्कृति विभाग का इसमें कहीं कोई सहयोग या योगदान नहीं हैं।
डॉ. रतन जैन के बारे में यह भी जानकारी मिली कि जीवन के अंतिम दिनों में वे अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने बाध्य थे। वे शासन से सहयोग चाहते थे।  संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ द्वारा अभावग्रस्त लेखकों / कलाकारों को जीवनयापन के लिए पेंशन दिया जाता है। इष्ट - मित्रों के कहने पर योजना का लाभ मिलें इसके लिए उन्होंने संस्कृति विभाग को आवेदन किया था। जिसका भी लाभ उन्हें नहीं मिला।
इसी कड़ी में एक वाक्या मेरे सामने और आया। ग्राम भंडारपुर निवासी गोपालदास साहू ने खड़ा साज नाचा एवं गीत लेखन में अपना जीवन आहूत कर दिया।  जीवन के अंतिम दिनों में गोपालदास साहू भी न सिर्फ अभावग्रस्त जीवन यापन कर रहे थे अपितु बीमारी भी उसे तंग कर रही थी। उन्होंने भी संस्कृति विभाग को आवेदन प्रस्तुत किया था। पेंशन मिलने की आस में उनका निधन हो गया पर संस्कृति विभाग से उनकी पेंशन को स्वीकृति नहीं मिली।  दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कि मुख्यमंत्री राजनांदगांव जिले का हो और उसी जिले के साहित्यकार कलाकार ही उपेक्षित और अनादरित जीवन यापन करते हुए मौत के आगोश में सो जाये ?
न जाने और कितने ऐसे ही साहित्यधर्मी - कलाधर्मी उपेक्षित - अनादरित जीवन व्यतित कर रहे हैं। क्या संस्कृति विभाग अपनी चैतन्य अवस्था का परिचय देते हुए ऐसे लोगों की खोज - खबर करेगा जो पूरी ईमानदारी से कला और साहित्य को जीवित रखने अपना जीवन होम कर रहे हैं? क्या इस सम्पादकीय के बाद ऐसे लोगों को वह मान सम्मान मिलेगा ,जिसका वह वास्तविक  हकदार है। या फिर स्वर्गीय डॉ. रतन जैन की निम्न पंक्तियाँ बरकरार रहेगी ...।
लो, सूख गया सावन कि भादो भटक गया। 
बदनाम हुआ मौसम की पानी अटका गया।।
ये सूखे खेत खड़े, अधरों में प्यास लिये। 

जीवन की मधुऋतु का झूठा विश्वास लिये।।
सम्‍पादक
सुरेश सर्वेद
फरवरी 2011

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