इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 20 जून 2013

एक टोकरी भर मिट्टी

  • माधवराव सप्रे 
किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोपड़ी हटा लें, पर वह तो कई जमाने से वही बसी थी। उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पांच बरस की कन्या की को छोड़कर चल बसी थी। अब यह उसकी पोती इस वृद्धकाल में एक मात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्व स्थिति की याद आ जाती तो मारे दुख के फूट - फूटकर रोने लगती थी। और जब से उसने अपने श्रीमान पड़ोसी का हाल सुना, तब वह मृत प्राय हो गयी थी। उस झोपड़ी में उसका मन लग गया था कि बिना मरे वहां से वह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए। तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरमकर उन्होंने अदाल से झोपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया। बिचारी अनाथ तो थी ही, पास पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।
एक दिन श्रीमान उस झोपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहां पहुंची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहां से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली कि महराज, अब तो यह झोपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आयी हूं। महराज क्षमा करें तो एक विनती है। जमींदार साहब के सिर हिलने पर उसने कहा कि जब से यह झोपड़ी छुटी है तब से मेरी पोती ने खाना पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत कुछ समझाया पर वह एक नहीं मानती है। यही कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बना कर रोटी पकाऊंगी इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराजकृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं। श्रीमान ने आज्ञा दे दी।
विधवा झोपड़ी के भीतर गयी। वहां जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों से आंसू की धार बहने लगी। अपने आंतरिक दुख को किसी तरह सम्हालकर उसने अपनी टोकरी मिटï्टी से भर ली और हाथ से उठा कर बाहर ले आयी। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी कि महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइए, जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूं।
जमीदार साहब तो पहले बहुत नाराज हुए, पर जब वह बार बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गयी। किसी नौकर से न कह कर आपही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगा टोकरी को उठाना चाहा पर जिस स्थानन पर टोकरी रखी थी वहां से हाथ भर ऊंची न हुई। वह लज्जित होकर कहने लगे - नहीं, यह टोकरी हमसे न उठायी जायेगी।
यह सुनकर विधवा ने कहा - महाराज, नाराज न हों, आप से एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठायी जाती और इस झोपड़ी में तो हजारों टोकरियां मिट्टी पड़ी है। उसका भर आप जन्म भर क्या उठा सकेंगे ï? आप ही इस बात पर विचार कीजिए।
जमींदार साहब धन - मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गये थे पर विधवा के उपर्युक्त वचन सुनते ही उनकी आँखे खुल गयीं। कृत कर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा मांगी और झोपड़ी वापस दे दी।

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