इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 25 जून 2013

चिन्हारी


  • सुशील भोले

- ददा, ए मन जतका झन नाचत हें, सबों के सबो अपन - अपन मुड़ी म गाय गरु के सिंग ल काबर बांधे हे ? सुखरु अपन ददा जगा बड़ा भोलापन ले पूछिस।
बुधरु वोला बताइस - बेटा, हमर देस म आदिकाल ले बूढ़ादेव महाराज भोलेनाथ के भक्ति होथे। वोकर भक्ति करइया म सबसे बड़े अउ मयारुक नंदी - भृंगी मनला माने जाथे, तेकर सेती वो संस्कृति ल आजो जतका झन जीयत हे अपन देवता के सुमरनी या भक्ति म नंदी - भृंगी मन के संवागा करके अपन आप ल धन्य समझथे। इही भाव के सेती सबो झन अपन - अपन मुड़ी म सिंग पहिरे हे। अउ संग म कौड़ी, घाघड़ा, खुड़की आदि जतका जिनीस पहिरे हे सब वोकरे प्रतीक आय।
- अच्छा, अउ ये माई लोगन मन बांस के डंडा मन ला भुइयां म पटक - पटक के त फेर काबर नाचत हे ?
- उहू हर भोलेनाथ के भक्ति के प्रतीक आय बेटा। वो मन महादेव खातिर भांग कुचरे अउ घोटे के बुता करत हे।
- ददा, अइसने वाला हमं नाचबो आयं ग ...।
- हां - हां, नाच लेबे न। काहत बुधरु ह अपन बेटा सुखरु ल बस्तर के रथजात्रा म सकलाय मेला के भीड़ ल चारों मुड़ा ले घुमाए लागिस। रथजात्रा देखे खातिर कटाकट भीड़ सकलाए राहय। देस - बिदेस के मनखे मन आए राहय। ये सृष्टिïकाल के परब मन संघरे खातिर। सुखरु परन दिन रतिहा जब ले अपन दाई बिटावन के मुंह ले सुने रिहिसे के ये मेला ह देस - दुनिया म भरइया जम्मो मेला ले बढ़के होथे, तब ले उहां जाए बर रो - रो के अपन ददा ल हलाकान कर डारे रिहिसे। तेकर सेती बुधरु ह वोला धर के बिहन्वे ले पांच कोस भुइयां ल रेंग के संझा के होवत - होवत रथजात्रा ठउर म पहुंचे रिहिसे।
पांच कोस भुइयां रेंगे के सेती पहिली दूनों झन एक ठन साल पेड़ के छांव म घंटा भर के पुरती सुरताईन, तेकर पाछू मड़िया ले के पीइन, अउ जब पेट ह दलगीर लागे लागिस तब फेर मेला - मड़ई किंजरे बर निकले रिहिन हे।
सुखरु मेला म जेन जिनीस ल देखय तेने ल लेहूं कहिके अपन ददा करा गोहरावय। कभू फिलफिली लेहूं काहय, कभू घुनघुना लेहूं काहय, कभू पुक लेहूं काहय त कभू तुतरु लेहूं काहय। एक पइत तो गजबेच होगे। जब कुकरा लड़ई म मगन दूनों कुकरा ल लेहूं कहगे गोहार पार - पार के रोए लागिस।
बुधरु वोला गजब मया करय, फेर लड़इया कुकरा मन ला लेवय कइसे ? वो सुखरु ल अपन कोरा म उठाके बजार भराय राहय तेती चल दिस। बाजार म आनी - बानी के दुकान सजे राहय। जेन दुकान ल देख तेस तेने म दू घड़ी बिलम के उहां के जम्मों जिनिस ल अपन घर लेग जातेंव तइसे लागय। मार लादिक - पोटा मन के मारे सुखरु ल दुकान भीतर के समान मन बने असन नइ दिखय तेकर सेती बुधरु ह वोला अपन खाध म बइठार ले राहय।
एक ठन दुकान म धनुस - बान, बरछी - भाला, टंगिया - बसुला जम्मों किसम के औजार बेचावत राहय। ते मेर बुधरु हा ठाढ़ होके सुखरु ल खांध ले उतारिस। तहां ले मोल भाव करके वोकर बर धनुस - बान लेके कहिस - बेटा, एला धर ... ए हर हमर काम के जिनिस आय। जंगल - झाड़ी म रहना हे। जंगली जानवर मन ले बांचना हे त एकर संग म रहना जरुरी हे। कहिके वोला सुखरु के खांध म ओरमा दिस।
मेला के एक मुड़ा म छालीवुड के कलाकार मन के फिलिम सूटिंग चलत राहय। दू झन टूरा मन एक झन टूरी ल अपन - अपन डहार तीरयं। तहां ले टूरी ह बचाव - बचाव काहय। वो मनला देख के एक मुड़ा म टोपी पहिन के खड़े मनखे ह कट काहय। तीन - चार पइत ले अइसने होइस। सुखरु ल वोमन ल देख के बहुते घुस्सा लागिस। वो अपन नवा धनुस - बान ल हेरत अपन ददा ल कहिस - ददा, ये दूनों टूरा मन ला टिप दौं का ? देखना वो टूरी ल घेरी - भेरी तीरथें अउ बपरी ह बचाव - बचाव कहिथे त वो टोपी वाला ह कट कहि देथे। मोला तो वो टोपी वाला ऊपर घलो गुस्सा लागत हे ... वो टूरी ल बचाए ल छोड़ के कट - कट करत हे।
बुधरु वोला समझाइस - अरे नहीं बेटा, एक मन फिलिम के सूटिंग करत हे। वो दूनो झन टूरी ल तीरत हे तेन मोहन - सोहन ये। वीडियो - फिलिम के बनइया। अउ वो टूरी ह जेन बचाव - बचाव काहत हे न तेनो वोकरे मन संग आए हे। उंकरे संगवारी ये। अउ वो टोपी वाला ह एकर मनके डायरेक्टर साहेब ये। उही एमन ल जइसे - जइसे इसारा करथे तइसे - तइसे एमन करथे - धरथे। लोगन ए मन इहां के बड़ परसिध कलाकार आयं कहिथें बेटा।
- अच्छा, इहां के कलाकार कहिथे। फेर ए मन तो एको झन इहां के मनखे बरोबर नइ दिखत हे ददा।
- कहां ले दिखही बेटा। कमाए - खाए ल आए रिहिन हे। फेर अब तो इही मन इहां के मालिक बनगे हे। हमर संस्कृति, इतिहास अउ चिन्हारी के प्रवक्ता बनगे हे। ए मन लोगन ल हमर बारे म जइसन बताथे - चिनहाथे, तइसने लोगन हमला जानथे - चिन्हथे।
- अच्छा ये बाहिर ले आए मन हमन ल हमरे बारे म बताथें ग ... भारी ताजुब के बात हे।
- अब बताथे का बेटा, भुलवारथे कहिबे तेने सोला आना ये।
- कइसे ददा ?
- अब काला - काला बताबे बेटा ... जम्मों इहां के जिनिस मनला अन्ते - तन्ते परिभासित करके वोला अपन संग बाहिर ले लाने संस्कृति के रंग म रंगत जावत हे। हमर मन के असली चिन्हारी ल निरमामूल सिरवावत जावत हे। काहत बुधरु ह सुखरु ल धर के रथ खड़े राहय तेन मुड़ा चल दिस।
सइघो बांस भर के ऊंचा अउ वइसने चउंक - चाकर के रथ ल देख के सुखरु गदगद होगे। वो बुधरु जगा गोहराए लागिस - ददा, एमा चघबो ग।
बुधरु वोला समझाइस - अरे नहीं बेटा, ए हर हमर मन के चघे के नोहय ग। एम तो दंतेसरी माई ल बइठार के घुमाए जाही।
- अच्छा त अइसने हमरो गांव म काबर नइ घुमावन ददा ?
- अरे नहीं बेटा, ए परब ल जम्मो परानी मिलके एके जगा मनाथे ग। सृष्टिï रचना के समे समुद्र मंथन होए रिहिसे न तकरे सेती आय कहिथे सियान मन। फेर अब के लिखइया - पढ़इया मन अन्ते - तन्ते लिख - लिख के हमर चिन्हारी ल भरमावत हे। बुधरु सुखरु ल समझावत कहिस - बेटा सुखरु, रतिहा अब थोरक गहिर होए कस लागत हे। चल कोनो मेर पेज पसिया के बेवस्था करबो। तहां ले रतिहा सूते - बसे के बेवस्था ल घलो कोनो पेड़ - उड़ के छांव म बनाबो। काली बिहन्चे जल्दी नहा - धो के तियार होए बर लागही। तहां ले टेहर्रा चिरई के दरस करबो तभे तो रथजात्रा अउ नीलकंठ दरस के पुन्न - परसाद ल पाबो।
दूनो बाप - बेटा भर पेट भोजन के बाद रतिहा नींद के जुगाड़ जमाए लागिन। चारों मुड़ा तो मनखेच - मनखेच राहयं। चारों मुड़ा के गांव के मन अपन - अपन इहां के देवताधामी मन ला धर - धर के समुद्र मंथन के ये परब म संघरे बर आए राहयं। तेकर सेती सूते - बसे के जम्मो ठिकाना ल लोगन अपन - अपन ले पोगरा ले राहय। कतको झन मेला म आए नाचा - गम्मत अउ खेल तमाशा म घलो मगन राहय। सुखरु घलो नाचा देखे बर अपन ददा जगा केलौली करीस। फेर बुधरु वोला बिहनिया जल्दी उठे बर लागही कहिके एक ठन साल पेड़ के छांव म चातर असन जगा देख के पटकू ल बिछाइस अउ अपन संग म सूता लिस।
सुखरु के नींद चारों मुड़ा के जगर - बगर अउ नाचा - गम्मत के हल्ला - गुल्ला म परते नइ रिहिसे। वो अलथी - पलथी करय। तहां ले फेर उठ के बइठ जाय। बुधरु वोला पोटार के अपन पेट भीतर लुकावय अउ माथा ल ठोंक के सुताए के उदिम रचय। दूनों बाप - बेटा के रतिहा अइसने करत - करत पहागे।
कुंवार महीना के अंजोरी पाख म बरसा अतर जाय रहिथे। कभू कभार एकाद ठन पल्हरा ह खोर किंजरा टूरा कस एती - तेती ले आवत दिख घलो जाथे, फेर वोकर ले जादा पानी बरसे अउ लोगन के फिंजे - टूटे के खतरा नइ राहय। एकरे सेती ये रथजात्रा परब म मनखे मन के मार लादिक - पोटा भीड़ जुरिया जाथे। रथजात्रा ठउर म तो रेंगत तक नइ बनय। कतकों पइत तो सुखरु ह चिचिया के रो डारय। कभू कोनो वोकर पांव ल खूंद दय ते, कभू मुड़ी ल लोगन के पेट पीठ म सटक जाय। वोकर घेरी - बेरी के रोवई के सेती बुधरु ह वोला अपन खांध म बइठार लिस।
रथजात्रा ले लहुटत खानी सुखरु अपन ददा ल चेंघ - चेंघ के पूछय - ददा, फेर वो रथ ह कइसे टूटगे ग ?
बुधरु वोला बताइस - बेटा, जम्मो सकलाए मनखे मन ओला आगू - पीछू तीरथे न, तेकर सेती टूट जाथे। फेर ये टूटई ल अशुभ नइ माने जाय बेटा।
- अच्छा, बड़ ताजुब के बात ये। सुखरु बड़ अचरज के साथ कहीस।
तब बुधरु वोला रथजात्रा के असली कारन ल बताइस - बाबू रे, ये रथजात्रा ह कोनो ल बइठार के घुमाय - फिराय वाला रथजात्रा नोहय। असल म ए हर समुद्र मंथन ले निकले ब्रिस के पान के परब आय। आज बिहिनिया ले जेन टेहर्रा चिरई के दरसन करे रेहे हन न, तेला आज के दिन भगवान भोलेनाथ के प्रतीक स्वरुप माने जाथे। काबर ते बिसपान के सेती वोला नीलकंठ केहे गे रिहिसे। ये टेहर्रा चिरई के ऐ नांव नीलकंठ घलो आय तकरे सेती एकर आज के दिन दरस करे जाथे।
बुधरु वोला बतावत रिहिसे - असली म रथ ह मंदराचल पर्वत के प्रतीक आय, अउ आगू - पाछू खिंचई म रथ ह टूटीस हे अउ वोकर बाद जम्मों मनखे एती - तेती भागीन हे। तेन ह समुद्र मंथन ले बिस निकले के परतीक आय। बाद म फेर सबो झन सकलाईन अउ तहां ले सबो झन ल दोना म मंद बाटे गिस वोहर भोलेनाथ द्वारा लोक कल्यान खातिर बिस पिए के प्रतीक स्वरुप आय।
बेटा तोला एक चीज अउ बता देथौं, समुद्र मंथन ले निकले बिस ल पीये के पांच दिन बाद अमरित निकले रिहिसे। तेकरे सेती ये बिसहरन परब के पांच दिन कुंवार पुन्नी जेला शरद पूर्णिमा घलो कहिथन तेन दिन अमरित पाए के परब मनाथन जी ... खीर बनाके रतिहा चंदा अंजोर म रखथन नहीं ... हां, उही अमरित पाए के परब आय।
बाप - बेटा समुद्र मंथन, बिस हरन अउ अमरित पाये के गोठ म अइसन मगन होगे रहिन हें के कब घर के मुहाटी आगे तेकरो गम नइ मिलिस।
  • 41 - 199, रिक्शा स्टैण्ड के सामने गली,  संजय नगर टिकरापारा, रायपुर  ( छ.ग.)

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