इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 24 जून 2013

पूज्‍य पिताजी


  • विष्‍णु प्रभाकर
 अपने में डूबा - डूबा वह घर लौट रहा था कि सहसा उसने अनुभव किया कि गलबहियां डाले दो मस्त किशोर आवाज कसते उसके पास से होकर आगे बढ़े।
उसने दृष्टि उठायी। आश्चर्य, वे एक लड़की की राह रोकने की चेष्टा कर रहे थे। लड़की कभी बांये बचती कभी दाये पर वे तुरंत आगे आ जाते। आखिर झुँझला पड़ी। बोली - बदतमीज कहीं के, हटो आगे से ...।  वे किशोर द्वय खिलखिलाकर बोले- जाने मन रास्ता किसी की जागीर नहीं हैं।
तब क उसने स्थिति से निबटने का निर्णय कर लिया था। वहीं से चीखकर उसने कहा - ए लड़के, तुमको शरम नहीं आती। भागो यहां से, आवारा कहीं के।
किशोरों ने तनिक भी प्रभावित हुए बिना उसकी ओर देखा। मुस्कुराये। बोले - ओ पूज्य पिताजी, जाइये, जाइये नहीं तो छुरा भोंक देंगे ....।
वह तमतमा आया और तेजी से उनकी ओर बढ़ा लेकिन किशोर ने उसकी ओर देखा तक नहीं। लड़की को  ही लक्ष्य करके बोले - जानी, हम तो राह में आंखें बिछा रहे हैं, पर तू तो भागी जा रही है, तेरी मर्जी।
- अरे। यह कहकर वे मुड़े। बोले - अब चलो यार, अपना काम हो गया।
वह देश के भविष्य के इस अद्य पतन पर कुढ़ता हुआ घर लौट आया। कपड़े बदलें। फिर हाथ मुंह धोने के लिए गुसलखाने में पहुंचा। सामने की खिड़की खुली हुई थी। उस पर के मकानों को वह अच्छी तरह से देख सकता था कि एक नवयौवना ऊपर की छत पर आयी। सद्य विवाहिता थी शायद। रूपसज्जा ने यौवन को अद्भुत निखार दिया था।
एक क्षण जैसे किसी ने जादू कर दिया हो। उसने पाया कि उसकी समस्त चेतना उस युवती के शरीर की परिक्रमा कर रही हैं और बांहे कसमसा रही है ....। तभी न जाने क्या हुआ, कहीं से आकर एक किशोर खिलखिलाहट उसकी छाती में भर उठी। किसी ने पुकारा - पूज्य पिताजी।
वह सहम सिहर गया - कौन हैं ?
वहीं मौन, मस्त स्वर जैसे कानों में फुसफुसा गया - पुज्य पिता जी,। दूर से छिपकर नहीं। पास आकर देखिए न। वह लड़की भी ऐसी ही जालिम थी। आपने भगा दिया उसे, लेकिन हम ....।
उसने तिलमिलाकर कहना चाहा - भाग जाओ, यहां से गुण्डे।
- कौन, हम कि आप। वे खिलखिलाये।
और वह खिलखिलाहट जैसे तन - बदन में कांटे बनकर समा गयी। उसने तेजी से खिड़की बंद की और उससे भी दोगुनी तेजी से पैरों पर पानी डालने लगा।
लेकिन कांटों की कसक पानी डालने से थोड़ी ही न मिटती है।

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