इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 जून 2013

जंगल में मंगल


  • नूतन प्रसाद

उस दिन जब डाकिया, डाक फेंक देने की पुरानी परम्परा को तोड़कर मेरे पास आया तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने मुझे अपने थैले से निकालकर एक लिफाफा थमाया। विद्युत गति से लिफाफा फाड़कर मैं पढ़ने लगा। उस कागज के अनुसार मुझे विन विभाग में नौकरी मिली थी। और जल्द से जल्द कार्यभार ग्रहण करना था। यद्यपि उसमें निवेदन न होकर आदेश था फिर भी नौकरी मिलने की खुशी में मेरा मन - मयूर नाच उठा। शुभ संदेश देने वाले डाकिये को राजपाट तक देने की खूब इच्छा हुई पर सम्राट तो क्या एक छोटे से गाँव का जमींदार भी नहीं हूं अत: मनमसोसकर उसे मात्र धन्यवाद देकर विदा करनी पड़ी।
माँ - बाप जो भीतर कमरें में चिंतामग्र बैठे थे, उन्हें नियुक्ति - पत्र दिखाया तो लाख मना करने के बावजूद मेरा माथा - गाला चूम ही लिया। उनके चरणों में अपने को समर्पित करने की कोशिश की तो मुझे अधर ही उठा लिया। आखिर ऐरे - गैरे विभाग में नौकरी तो नहीं मिली थी।
पत्नी जो सदैव कोपभवन में विराजमान रहती थी दौड़कर आई और सेवा करने लगी। तुरंत चाय बना कर लायी और फटी कमीज को सिलने बैठ गयी। मुझे खड़ा देखकर फट एक स्टूल लाकर रख दी। जो बीबी, कभी भी दांत बाहर निकालने का मौका नहीं देती थी, हमेशा शेरनी की तरह दहाड़ती रहती थी, अचानक भीगी बिल्ली हो गयी। आखिर ऐरे - गैरे विभाग में नौकरी तो नहीं मिली थी।
मोटे और तगड़े मित्र जो कुछ क्षण में मुझे जमीन सुंघा देते थे, उनके ही आगे सीना तानकर चलने लगा। जिस सेठ को सुबह - शाम सलाम बजाता था, उसे विवश कर दिया कि वह मुझे नमस्कार करें गाँव वाले मुझे कुछ भी नहीं समझते थे, उन्हें चैलेन्ज कर दिया कि अगर मेरी बिना इजाजत के जंगल से लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा भी आया तो मिट्टी पलीत कर दूंगा। मेरा ठसन मारना वाजिब था, आखिर ऐरे - गैरे विभग में नौकरी तो नहीं मिली थी।
अब निठल्ला बनकर बैठे रहना बेकार था अत: तीसरे ही दिन मैंने घर से प्रस्थान किया। हनुमानजी की तरह कठिनाइयों से जूझते हुए मैं आगे की ओर बढ़ रहा था। गढ्ढïे - नाले आदि ने रोकने का दुस्साहस किया लेकिन मैंने उनकी जरा भी परवाह नहीं की। कुछ दूर जाने पर मैनाक नामक पर्वत मिला। यह सोचकर उस पर पल भर विश्राम किया कि आखिर इसका भी उद्धार करना आवश्यक है। अंत में जब ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए अपने मुख्यालय पहुंचा तो शाम घिर आई थी। वहाँ मेरा स्वागत करने के लिए वन रक्षक पहले से तैनात था। मुझे देख हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और नयी कुर्सी पर बैठने की प्रार्थना की। थोड़ी देर सुस्ताकर मैंने प्रश्र पर प्रश्र करना प्रारंभ कर दिया। यद्यपि वे सवाल का जवाब विनम्रतापूर्वक दे रहा था फि भी मैंने घुड़की लगाई। जो सत्य बात पर ही ना डाँटे वह साहब कैसा? मेरे पीने के लिए महुए की शराब और खाने के लिए खरगोश एवं पराठे की तुरंत व्यवस्था हुई। आधुनिक फैशन के अनुसार मैंने पूरा पिया - आधा खाया और चद्दर तानकर सो गया।
दूसरे दिन अरण्य - निरीक्षण का प्रोग्राम बना। मुख्यालय से कुछ दूर जाने पर देखता हूं - आगे घनघोर जंगल है। नाना प्रकार के मोटे - मोटे वृक्ष आकाश को चूम रहे हैं। लताएँ उनसे प्यार कर रही हैं। मोर, हिरण, बारहसिंगा वगैरह स्वच्छन्द रूप से धमा - चौकड़ी मचा रहे हैं। करोड़ों की वन सम्पत्ति का मालिक बस मैं हूं, ऐसा विचारकर अपने ऊपर गर्व करने लगा। यद्यपि किसी वृक्ष का नाम ज्ञात नहीं था फिर भी अपने मातहतों पर रौब गालिब करने के लिए वृक्षों का नाम ही नहीं, उनकी उपयोगिता भी बतला रहा था। नीम को आम बनाने की कहावत को वैज्ञानिक सत्यता पर खरे उतर रहा था, लेकिन किसी ने प्रतिवाद नहीं किया। अपने पर घमंड करते हुए मैं बढ़ता ही चला जा रहा था कि शेर की दहाड़ सुनाई दी। ऐसी गर्जना से कभी साबका नहीं पड़ा था, अत: मैं भय से काँपने लगा। हाथ - पाँव फूल गये। अधिनस्थ कर्मचारी, जो ऐसे वातावरण के अभ्यस्त थे, खीं - खीं कर हंसने लगे। मैंने उन्हें अधिकार पूर्वक डाँटकर चुप कराया और लौट पड़ा। आते - आते उन्हें समझाया कि बड़ों पर हँसना नहीं चाहिए।
उस रात मुझे नींद नहीं आयी। रह - रह कर शेर के ऊपर गुस्सा आ रहा था जिसने चार आदमियों के समक्ष मेरी बेईज्जती की थी। बन्द कमरे में मैंने प्रतीज्ञा की कि एक जंगल में दो शेर नहीं रहने दूंगा।
दूसरे ही दिन मैंने बिना लाइसेंस की बंदूक मंगवाई और निकल पड़ा शिकार पर। मैंने एक शेर ही नहीं अपितु वहां जितने भी शेर थे, उन सबको ढूंढ -ढूंढ कर स्वर्ग भिजवाये। प्रतिशोध के रूप में मैंने बाघम्बर पहनने की खूब इच्छा हुई लेकिन सफारी का युग है, इसलिए उक्त विचार को त्याग दिया। आते वक्त कांटे - कंकणों ने पैर को छिल डाले थे। अत: जूते बनवाने के लिए सांभर भी मारे। बहुत से वन्य प्राणियों को पकड़ाकर शौकीनों के पास भेज दिया। इससे दो फायदे हुए। एक तो मारने के अपराध से बचा, दूसरा लक्ष्मी की प्राप्ति हुई।
अब सबसे महत्वपूर्ण कार्य बचा था - अपने आधीन जंगलों की सफाई करवाने का। मैंने समीप के सभी गँाव में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो भी मेरे आदेश का पालन करेगा, उसे सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य से अधिक मजदूरी दी जायेगी साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को पन्द्रह सौ बांस और पाँच बल्लियाँ पुरस्कार स्वरूप दी जायेंगी। जंगल की आग की तरह मेरी बात चारों ओर फैल गई।  अपने आवश्यक काम को छोड़कर ग्रामीण आये और लगे पेड़ों की कटाई करने। श्रमिकों को अधिक लाभ मिल रहा था, अत: वे पल भर भी विश्राम नहीं ले रहे थे। सरकार की आर्थिक स्थिति अक्सर खराब रहती है, इसलिए मजदूरों की मजदूरी मैंने अपनी जेब से दी।
जब कटाई का कार्य पूर्ण हो गया तो मैंने घाघ ठेकेदारों को गुप्त रूप से निमंत्रण दिया। वे जब आये तो उनसे मैंने कहा कि लकड़ियां ले जाने से पहले नकद रूपये लूंगा। चेक की दाल नहीं गलने वाली। मेरी बात मानकर वे नकद रूपये दिये और ट्रकों में लकड़ियां भरकर ले गये। अब वहां बचे मात्र पत्थर। उन्हें ग्रामीणों को मुफ्त में दे दिया। इस तरह मैंने दान करने का पुण्य भी कमाया।
हां, एक बात मैं भूल रहा हूं कि इस शुभकार्य में मेरा भर हाथ नहीं था। संभाग से लेकर राजधानी तक के अधिकारियों को यह राज मालूम था। सबका परसेंटेज बंधा था, इसलिए गोपनीयता भंग होने का डर नहीं था। एक वरिष्ठï अधिकारी की लड़की के विवाह में जो सोफासेट - पलंग दिये गये, वे मेरे द्वारा ही प्रदत्त थे। एक नेता के पास कुर्सी के साथ गोंद भिजवाया ताकि वह आजीवन उसमें चिपके रहें।
वन विभाग की कृपा से मैं सुदामा से कृष्ण बन गया। पत्नी के पास बजारू गहने तक नहीं थे, उसके लिए मैंने स्वर्ण एवं हीरे के आभूषण बनवाये। मां - बाप को गंगा स्नान करने भेजा। बच्चों के नाम बैंकों में खाता खोल दिया। मिट्टी का घर जो अब तब गिरने वाला था बंगलानुमा हो गया। जमीन खरीदी, पम्प लगवाया। और अधिक नहीं बतलाऊंगा क्योंकि आयकर अधिकारियों के आ धमकने का डर है।
अब मुझे नौकरी के प्रति जरा भी लगाव नहीं रह गया था। उसे छोड़कर आराम की जिन्दगी गुजारना चाहता था कि एक अनहोनी हो गई। हुआ यह कि - मेरे पिता अपने हमउम्र वालों के साथ बैठे थे। जब दूसरों ने अपने पुत्रों की बड़ाई की तो उनसे सहा नहीं गया। उन्होंने भरे सभा में चिल्लाकर कह दिया कि मेरा बेटा बहादुर और जिंदादिल इंसान है। अपने आधीन पूरे जंगलों का नाम निशान तक मिटा दिया लेकिन उसका बाल बाँका भी नहीं हो सका। यह बात एक कान से दूसरे कान होती हुई जब सभी जगह फैल गयी तो काफी हो हल्ला मचा। अखबारों में मेरे नाम के साथ चित्र भी छपे। विधानसभा में इसी विषय पर काफी वाद - विवाद हुआ। वहां पर मेरे शुभचिंतक बैठे थे अत: कुछ न बिगड़ा। मेरी बड़ी बदनामी हुई थी। सफाई देना आवश्यक था, इसलिए विश्व पर्यावरण दिवस के दिन स्तीफा देकर, सरकार के पास यह प्रतिवेदन प्रेषित कर दिया कि - मैं एक ईमानदार और नेक व्यक्ति हूं। मैंने अपने कर्तव्य का पालन किसी सजग प्रहरी की तरह किया है। बढ़ती हुई जनसंख्या के मान से कृषि योग्य भूमि की कमी पड़ रही थी, अत: उस समस्या के समाधान के लिए पेड़ों को कटवाकर, मैदान के रूप में बदलना राष्ट्रहित में था। ऊँचें जंगलों के कारण बादल रूक जाते थे और वर्षा हो जाया करती थी जगह - जगह कीचड़ होने के कारण आवागमन अवरूद्ध हो जाता था, अत: वनों को पूरी तरह नष्टï करना आवश्यक हो गया था। हिसंक पशु किसानों की फसलों को बुरी तरह से रौंद रहे थे। यही नहीं, ग्रामीणों एवं मवेशियों को भी खा रहे थे, इसलिए उन्हें मारना लाजिमी था। अब गांव वाले अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। दूसरी बात - वन्य प्राणी अपने जानवर स्वभाव को नहीं छोड़ रहे थे। उछल - कूद कर एवं शोर मचाकर वातावरण को बोझिल बना रहे थे, अत: उन्हें नष्टïकर विश्वशांति को एक नया आयाम दिया गया।
और अंत में यही निवेदन है कि इस पद को उसी व्यक्ति को दिया जाय जो मेरे ही समान कर्तव्यपरायण एवं राष्ट्रवादी हो ....।
  • पता - भण्‍डारपुर ( करेला ) पोष्‍ट - ढारा, व्‍हाया - डोंगरगढ़, जिला - राजनांदगांव ( छ.ग. )

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें