इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 10 जून 2013

चला कबीरा फिर से ...


कृपाशंकर शर्मा ' अचूक'

दुहराने जो आज लगे सब उसी कहानी को।
चला कबीरा देखो फिर से, पीने - पानी को॥

शब्द हठीले समझ सके न मन की बातों को,
पथराई आँखें अब देखें नित उत्पादों को,
शपथ निरर्थक हुई बुराई मिली जवानी को।
चला कबीरा देखो फिर से, पीने - पानी को॥

करते साधन हीन साधना नई सदी पाने,
गुमशुम कहीं - कहीं पर रहते खुद से अनजाने,
चक्रवात से कौन छुड़ाए, राजा रानी को।
चला कबीरा देखो फिर से, पीने - पानी को॥

अचरज यह कैसी निठुराई अपनी लाचारी,
नदियां सूखीं रेत उड़ रहा विपदाएं भारी,
परिवर्तन तो अटल सदा से , पानी धानी को।
चला कबीरा देखो फिर से, पीने - पानी को॥

हुई विभाजित मन की रेखा मकड़ी जाल बना,
वक्रदृष्टि ने घर में घुस के किया अपना काम,
नश्तर चुभते रहें रात - दिन अब तो ज्ञानी को।
चला कबीरा देखो फिर से, पीने पानी को॥
  • 38 ए, विजयनगर, करतारपुर, जयपुर

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