इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 25 जून 2013

सड़क



  • जसवंत सिंह बिरदी

मौसम कोई भी हो।
सर्दी हो या गर्मी, लम्बी - चौड़ी सड़क, प्राय: सुनसान, ट्रैफिक से रहित और अंधकारपूर्ण होती थी। मैं और दर्शी अंधेरे में सड़क के सीने पर चलते हुए दूर निकल जाते थे। दर्शी तो उस सड़क पर इस तरह चलती थी जैसे कोई किश्ती नदी की धारा के साथ बहने लगे।
वास्तविकता तो यह है कि उस बड़े और खुले घर में हमारा मन नहीं लगता था। और जब हम सुनसान सड़क पर घूमते तो दर्शी खुलकर हंसती, नई - नई बातें करती और मेरे कंधे से कंधा मिलाकर चलती। प्रतिदिन मैं यह अनुभव करता कि स्त्री का अस्तित्व भी पुरुष के अस्तित्वा के समान है। वे पल उसके लिए अनमोल होते , और मेरे लिए भी। जैसे मैं संसार के सुख - दुख से ऊपर उठ गया होऊँ। दफ्तर की गंदगी की याद कदापि न आती। शायद इसी लिए ही हम उस बड़े घर में से निकलकर छोटी और सुनसान सड़क की ओर दौड़ते थे जैसे वह सड़क हमारे विचारों की हमदर्द हो।
एक तो घर बहुत बड़ा था, अत्यधिक विशाल आंगन जिसके गिर्द लगभग पन्द्रह कमरे मैंने कभी गिनती नहीं की थी। और प्रत्येक कमरे में एक - एक परिवार दुबका रहता था। थोड़ी ऊंची सांस भी पड़ोसी को सुनाई देती थी। यहां तक कि जब मैं आंगन में बैठी हुई दर्शी को अन्दर से आवाज लगाता तो उसके साथ बैठी हुई सभी औरतें जोर से हँसने लगती जैसे उन्हें भी आवाज दी गयी हो।
- उठ री दर्शी, जा अपनेे पतिदेव की गोद में। कोई एक धीरे से कहती तो उनकी हंसी फूलों की तरह महकने लगती, खिल जाती। परन्तु मैं उस समय स्वयं में सिमटने के अतिरिक्त कुछ भी न कर पाता। औरतें उसे उठाती मगर एक कदम भी न हिलती जैसे उनको बता रही हो कि वह अपने पति उतनी चिन्ता नहीं करती जितनी वे करती हैं। वे औरतें सचमुच की अपने पतियों के इशारे पर थिरकतीं और आवाज सुनते ही - आई जी, आई जी ..। कहने लगतीं। जैसे उन्हें यही सिखाया हो। परन्तु दर्शी। एक बेपरवाह आत्मा। उसकी इस बेरुखी के कारण मैं उससे लड़ना भी चाहता परन्तु उसके कहने पर - बताओ जी कहती।
मैं कहता - सड़क पर सैर करते समय बताऊँगा। वह मेरी ओर अर्थपूर्ण दृष्टिï से देखती और मुस्कराने लगती। मैं उसके साथ क्या लड़ता, किस तर्क के सहारे लड़ता ?
संध्या समय दफ्तर से लौटने पर खाना तैयार होता। खाना खाकर हम तुरन्त उस सुनसान सड़क की ओर चल देते। कपड़े बदलने की कोई समस्या नहीं थी। क्योंकि हमारे पास रात और दिन के समय पहनने वाले एक ही कपड़े थे। और फिर हम नंगे तो नहीं थे ?
अंधकार में दूर तक नजर दौड़ाना बहुत सुखमय लगता था जैसे वह अंधकार हमारी ओढ़नी हो और उससे भी अधिक आनन्द ऊँचे स्वर में हंसने में आता था। हंसी - हंसी मे मैं कई प्रकार की आवाज निकालता। उस समय दर्शी मुझे प्रत्येक प्रकार की अच्छी - बुरी बात बतलाती जो उसने या उसकी पड़ोसिनों ने की होती। वह कहती - लो और सुनो, वह है न बड़े कमरे वाली पायी।
- हाँ, क्या हुआ पायी को ?
- उसने आज मुझे बताया कि उसने गौने के कई दिन बाद तक अपने पति का मुंह नहीं देखा था। पर मैंने उसकी हंसी में बढ़ोत्तरी करने के उद्देश्य से कहा  - दर्शी, उसे पूछना कि उसने अब भी कभी अपने पति का वास्तविक चेहरा देखा है ?
जब तक हम सड़क पर सैर करते रहते, इसी तरह की व्यर्थ बातें करते हुए जीवन का आनन्द लेते। हमारे लिए सबसे खुशी की बात यह थी कि वहां हमें देखने वाला कोई नहीं था ...। कम से कम पड़ोसी औरतें तो हमारी बातें नहीं सुन सकती थी।
हमारा आंगन और घर इसलिए भी औरतों से भरपूर रहता क्योंकि हमारी मकान मालकिन मिलखी दिन भर औरतों को छाछ बाँटती रहती और लोग मेरे पास भी आते - जाते रहते थे। अजी मैं बिजली घर का ही कर्मचारी हूं, क्लर्क। और उनके बिल जमा करवा दूं। पुरुष तो अपने - अपने काम पर चले जाते थे और औरतें दिन भर कहाँ धक्का खाती रहें ? मेरी दर्शी भी उनकी सिफारिश करती और फिर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती।
मैं उससे कहता कि औरतों को पुरुषों की भीड़ में खड़े होकर भी आनन्द मिलता है। तुम इन सुन्दरियों को इस आनन्द से वंचित क्यों करती हो ? परन्तु दर्शी उस समय तक उन औरतों से बिल और पैसे पकड़कर मेरी कमीज की जेब मे रख चुकी होती।
नोटो से भरी हुई जेब सहित कमीज को जब मैं खूंटी पर टंगी देखता तो मेरा मन कहता कि इस कमीज सहित कहीं भाग जाऊँ या इन पैसों से दर्शी को एक बढ़िया सा सूट दिला दूं। जैसे कि परन्तु उस समय मुझे किसी भी बढ़िया कपड़े का नाम याद न आता। बढ़िया कपड़ों के नाम मेरे मन - मस्तिष्क से ही निकल चुके थे।
अभी मैं यह बातें सोच ही रहा होता कि कुछ अन्य लोग मेरे द्वार पर खड़े होते। मैं सोचता कि अवश्य कहीं बिजली फेल हो गयी होगी या इनके घर का फ्यूज उड़ गया होगा। ये कम्बख्त अंधेरे का लुत्फ क्यों नही उठा सकते ? परन्तु शायद वे लोग भी बिजली बिल और पैसे लेकर ही खड़े होते थे। जैसे मेरा घर ही बिजली के बिल लेने वाला दफ्तर बन गया हो। हाँ, जब कहीं बिजली की बे्रक डाउन हो जाती तो भी लोग मेरे कमरे की ओर भागते। रोशनी के बिना लोगों के लिए जीवित रहना कठिन था। न जाने इन्हें रोशनी से इतना लगाव क्यों हो गया था ? उस समय अपनी जेब खाली होने पर भी मैं स्वयं को पूर्ण समझता था। प्रत्येक द$फा यह महसूस होता था कि जीवन में अन्य कुछ नहीं तो रोशनी बांटने का काम तो कर ही रहे हैं। उस समय दर्शी की आँखें भी उसकी आत्मा की रोशनी से चमक रही होतीं।
परन्तु आने वाले कुछ ही दिनों में कुछ इस तरह का घटित हो गया जिससे हमें रोशनी से घृणा हो गयी।
यह उन दिनों की बात है जब दर्शी थोड़े दिनों के लिए गाँव गई हुई थी और मैं दिन भर का थका हारा शाम को दफ्तर से घर लौटता। पड़ोसी औरतें भी उस समय अपने पतियों के संग होती और आंगन खामोश हंसी से रहित होता था। सभी औरतें दर्शी की हंसी की याद करती थी। दर्शी की अनुपस्थिति में मुझे भी अनुभव होता कि दर्शी की हंसी संगीतमयी और जीवन से परिपूर्ण थी। रात के अंधकार मेें भी मुझे उसकी हंसी की सुनाई देती थी। केवल रात के अंधकार में ही। मेरा मन चाहता था कि उस खुली सुनसान और वीरान सड़क पर जाकर सैर करुं। परन्तु मैं न जाता। उस सड़क पर सैर करने का आनन्द केवल दर्शी के संग ही प्राप्त हो सकता था और मैं स्वयं को उस सुनसान सड़क पर घूमते हुए देखता। अंधेरे में देखने का अपना ही अनुभव था। एक प्यार भरा अनुभव।
इन दिनों में ही सरकारी योजना के अनुसार उस सुनसान और अंधेरी सड़क पर हमारे विभाग ने बिजली के खम्भे लगा दिये थे और फिर पता चला कि मील भर की दूरी में सरकारी लाइट्स भी लग गयी थीं। परन्तु मैं फिर भी उधर न गया। मेरे पास समय ही नहीं था। कभी भी उस सड़क की ओर जाने का मन ही नहीं करता था। उस सड़क की याद के साथ ही प्राय: मुझे दर्शी की याद आ जाती। उसका कोमल बदन मेरी आँखों के सामने थिरकने लगता और वह भरी पूरी हंसी, जिससे उस सुनसान सड़क पर दीवाली जगमगा उठती थी।
उस सड़क की नीरवता में प्राय: स्वयं ही दर्शी को अपने समीप खींच लेता था और कभी - कभी मैं अनुभव करता कि वह स्वयं ही अंधकार के अस्तित्व को हमारे मध्य से समाप्त करने का प्रयत्न करती थी। उस समय हमें यह विचार कभी नहीं आया था कि गतवर्ष ही हमारा विवाह हुआ है और नई - नई शादी होने पर भी हमारे वस्त्र कितने पुराने और घिसे हुए प्रतीत होते थे। हाँ, इतना अनुभव अवश्य था कि सदैव ही ये काले दिन नहीं रहेंगे। कभी तो जीवन प्रकाशमय होगा ही ...।
उस समय मैं बिस्तर में लेटा - लेटा ही सोचता कि उस सड़क पर सैर करने का आनन्द अब आएगा। दर्शी क्या समझेगी कि हमारे जीवन में चिरकाल तक अंधकार ही रहेगा ? प्रकाश का अपना ही एक आनन्द है।
दर्शी गाँव में बहुत दिन तक रही। उसकी माँ बीमार हो गयी थी और बीमारी के समय में उसे बेटी के साथ अधिक स्नेह हो गया था। फिर दर्शी जब लौटी तो पहले जैसी ही थी अर्थात उसने वही सूट पहना हुआ था जो मैंने उसे जाते समय बनवाकर दिया था। दर्शी का कोई भाई नहीं था। लड़कियों का पितृ - गृह भाइयों के साथ ही होता है। यह एक ऐसा विचार था जिसके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था। मेरी पूरी तन्ख्वाह तो रसोई में ही खप जाती थी। और दर्शी एक ही सूती सूट में खुश थी। कम से कम खुलकर हंसती तो थी और हंसना कोई कला तो नहीं जिसे प्रत्येक व्यक्ति सीख लेगा।
गाँव से लौटने के बाद दर्शी शाम के समय अपनी सखियों के संग गप्पें  हांकती रही। रात का खाना खाने के बाद जब हम घर से बाहर निकले तो वह फूल की तरह खिल उठी। ऐसा लगता था कि वह आज ...।
मैं सड़क पर जाकर बताऊँगी। यह वाक्य उसके चहकते हुए अस्तित्व का प्रभाव स्पष्टï कर रहा था।
परन्तु दर्शी चुपचाप चलती रही। शायद वह सुनसान और अंधेरी सड़क की प्रतीक्षा कर रही थी परन्तु अब तो उस सड़क पर सरकारी लाइटस लग गयी थीं। हर तरफ प्रकाश था। हम किधर आ गये हैं ? दर्शी ने पूछा।
- जिधर प्रतिदिन सैर करते थे। मैंने प्रसन्न होकर उत्तर दिया और सोचा कि शायद दर्शी प्रकाश की प्रशंसा करेगी। परन्तु दर्शी ने पहले उस प्रकाशमान सड़क पर नए तेज और फैशनेबल चेहरों को इधर - उधर जाते हुए देखा और फिर घबरा कर मुझसे कहा - लौट चलो।
- क्यों ?
- मेरा मन नहीं मानता।
- दर्शी यह वही सड़क है, जिस पर हम खिलखिला कर हंसते थे। और मैंने हंसने का प्रयत्न किया परन्तु हंस न सका। क्योंकि उस समय अनेक चेहरे तीक्ष्ण दृष्टिï से हमें, हमारे वस्त्रों को, हमारी हरकतों को घूरते हुए जा रहे थे। औरतों के चमक - दमक वाले कपड़ों की चमक से सड़क का प्रभाव ही बदल गया था।
दर्शी की आँखें उस समय पूछ रही थी कि ये कौन लोग है जो अचानक ही इस सड़क पर घूमने लगे हैं ? और वह दूर तक जाती हुई उस प्रकाशमान सड़क को इस तरह घूर रही थी जिस तरह यह सड़क अब हमारी न हो।
एक क्षण में ही दर्शी के चेहरे पर अनेक रंग आये और गये। उस समय मैंने सोचा कि सड़क तो समाज की थी। देश की थी, तो हमारी कैसे नहीं थी ? मैंने फिर कहा - दर्शी अब यह सड़क भी प्रकाश से परिपूर्ण हो गयी है। हमारे विभाग ने दूर - दूर तक सरकारी बत्तियाँ लगा दी है। इनकी रोशनी को देखो। जैसे चन्दा की चाँदनी बिखरी हो, यह हमारे विभाग का।
दर्शी के तनावपूर्ण चेहरे को देखकर मैं अचानक ही चुप हो गया। उसे मालूम था कि विभाग में मेरा अस्तित्व बहुत छोटा सा है फिर भी उसने मेरी बात ध्यान से सुनी और फिर क्षण भर खामोशी के बाद उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे लौटा लिया और तीक्ष्ण स्वर में कहा -  आपने यहाँ रोशनी करने का विरोध क्यों नहीं किया ?ï
उसकी आँखें भीगी हुई थी और उसे धुंधला - धुंधला दिखाई दे रहा था।
  • 96, गोल्डन एवेन्यू, फेज - 1, जालन्धर शहर - 144022 [ पंजाब]

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