इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 27 जून 2013

माँ और मैं



- भीखम गांधी ' भक्त ' -

माँ आज तुम्हारे अस्तित्व से, अंश से बना मैं हूं।
माँ मुझे याद है कि तुमने मुझे कैसे
नौ माह कोख में रखकर अपने खून से सीचा है।
और मेरे अंग प्रत्यंग बनाने में अपने आप को भूलकर
अपने जीवन रेखा सीचा है।

नौ माह तक मेरे पुष्पित - पल्लवित होने तक
तुमने अपने आप को कम और
मुझे किस तरह सहेज कर रखा था।
तुम्हें अपनी चिंता कम और मेरी चिंता ज्यादा थी।
मेरे नवजीवन में प्रवेश के लिए मेरे दुश्मनों की
बीमारियों की तुम ही सबसे बड़ी बाधा थी।
चाहे फिर वो मेरे दुश्मन बीमारी हो या महामारी हो।

इस मुरझाए मुखड़े में थोड़ी सी खुशियां आ जाए।
आ साथ बैठकर थोड़ा सा खाना साथ में खाए।
मैंने सुबह से तेरे इंतजार में कुछ नहीं खाया है।
आ तेरे वास्ते मैंने बहुत कुछ बनाया है।
माँ, तुम मेरे वास्ते सुबह से भूखी हो।
तुम मेरे वास्ते, लगता है, मुझसे भी ज्यादा दुखी हो।

सच माँ तुम मेरा कितना रखती हो ध्यान
सच माँ तुम ही हो मेरी आन - बान और शान।
बहुत बाते हो गई बेटा अब इन बातों में।
हम न जाने खाना खाएंगे कब।
चल उठ, खाना खा और सो जा।

पता - 50,ग्रीनसीटी, राजनांदगांव (छ.ग.)

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