इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 4 जून 2013

छत्तीसगढ़ की महतारी - शबरी



  • आचार्य सरोज द्विवेदी
ाचार्य सरोज व्दिवेदी
       छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति के मूल जब हम झांकने का प्रयत्न करें तो हमें ज्वाजल्य मान नक्षत्र के रूप में एक मात्र नाम दिखाई देगा शबरी मा। श्री राम भक्त शबरी के पूर्व का कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है।
       इतिहास वेत्ताओं के अनुसार रामायण नौ लाख चौरासी हजार वर्ष पूर्व की घटना है और तब से लेकर अब तक छत्तीसगढ़ क्षेत्र के किसी व्यक्ति का नाम चल रहा है तो वह शबरी ही है। आदि कवि महर्षि वाल्मीकी ने रामायण में शबरी की भक्ति का धार्मिक चित्रण किया है।
       इतिहास बताता है कि गंगा से गोदावरी के मध्य भाग को कौशल क्षेत्र कहा जाता था। इन दिनों नदियों के बीच विंध्याचल पर्वत स्थित है। विंध्याचल के ऊपरी उत्तरी क्षेत्र को उत्तर कौशल और नीचे दक्षिणी क्षेत्र को दक्षिण कौशल कहा जाता है। हमारा छत्तीसगढ़ दक्षिण क्षेत्र में आता है। श्रीराम की वन यात्रा में दक्षिण कौशल को दण्डकवन कहा गया है। अब यह भी प्रमाणित हो गया है कि इस दण्डकारण्य में शिवरीनारायण बिलासपुर में ही शबरी का आश्रम था।
       शिवरीनारायण में महानदी, शिवनाथ और जोंक नदियों का संगम है। इस संगम के तट पर ही शबरी के गुरू महर्षि मतंग का आश्रम था। ऋषि मतंग के बाद शबरी इस आश्रम की आचार्या बनी। बाद में गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में भी शबरी कथा का मधुर और भावपूर्ण चित्रण किया है।
       छत्तीसगढ़ का नामकरण उन्नीसवीं सदी में हुआ किन्तु दक्षिण कौशल नाम उस समय प्रसिद्ध था। इसका प्रमाण यह है कि यहां की बेटी आरंग नरेश भानुमन्त की पुत्री कौशल्या नाम कौशल क्षेत्र की कन्या होने के कारण पड़ा, जैसे कैकय से कैकई। कौशिल्या दशरथ की बड़ी रानी थी। जिनके गर्भ से श्रीराम का जन्म हुआ। श्रीराम छत्तीसगढ़ की बेटी कौशिल्या के पुत्र थे।
       रामायण और रामचरित मानस में श्रीराम की वनयात्रा में शबरी प्रसंग सर्वाधिक भावपूर्ण है। भक्त और भगवान के मिलन की इस कथा को गाते सुनाते बड़े पंडित और विद्वान भाव विभोर हो जाते हैं। शबरी का त्याग और संघर्ष पूर्ण जीवन, नि: स्वार्थ सेवा, निष्काम भक्ति और गुरू तथा श्रीराम के प्रति समर्पण दूसरी जगह देखने में नहीं आता इसलिए शबरी आज भी जीवंत है।
       शबरी की सेवा से मुग्ध मतंग मुनि जब प्राण त्यागने लगे तब दुखी शबरी उनके साथ जाने की जिद करने लगी। मतंग मुनि ने कहा - शबरी, मेरी भक्ति अधूरी रह गई। मुझे श्रीराम के दर्शन नहीं हो पायेंगे किन्तु तेरी भक्ति पूर्ण होगी। श्रीराम तुम्हें दर्शन देंगे, वे तुमसे मिलने जरूर आयेंगे। तुम श्रद्धा और धीरज रखकर उनकी प्रतीक्षा करना।
       शबरी ने भक्ति और संयम के साथ प्रभु की प्रतीक्षा की। प्रतीक्षा के अंतिम दिनों में शबरी को ऐसा लगता था कि श्रीराम अब आये कि तब आये। वह प्रतिदिन मार्ग की सफाई करती, ताजे फल, फूल तोड़ लाती और प्रभु के मार्ग को एकटक निहारती रहती।
       श्रीराम जब लक्ष्मण के साथ शबरी के आश्रम में पधारे तो शबरी धन्य हो गई। वह सुधबुध खोकर नाचने लगी। उसे दुनिया तो क्या अपने वस्त्रों का भी ध्यान न रहा। शायद यही राम की सबसे बड़ी पूजा थी, क्योंकि आदर सत्कार तो वह भूल गई थी। लक्ष्मण जी ने जब याद दिलाया तब उसने मुग्धभाव से उनको बिठाया। चरण पखारे, पूजा की और फल, मेवे जो उसने संचित कर रखे थे, लाकर खिलाना शुरू किया। सभी फल पिछले दिनों के थे, केवल बेर के फल ताजे थे इसलिए उसने प्रभु को बेर खिलाना शुरू किया। भगवान बड़े प्रेम से बड़ाई करते हुए बेर खाने लगे। श्रीराम की बेर खाती हुई मुद्रा देखकर , शबरी पुन: मुग्ध हो गई। उसने मुग्धावस्था में छाँट - छाँटकर बेर प्रभु को दिए। राम पुन: बार बार बेर मांगने लगे तो वह अति प्रसन्नता में बेर चख - चखकर देने लगी। और भगवान वाह् - वाह् करते हुए बेर खाने लगे। दोनों भाईयों को शबरी के जूठे बेर खाते देखकर देवगण आकाश से फूलों की वर्षा करने लगे और दुन्दुभी बजाने लगे। इस समारोह को देखने आस पास के साधु संत और महात्मा भी इकठ्ठे हो गये। अन्नदाता को शबरी से बार - बार मांग कर बेर खाने की यह लीला देखकर सब धन्य हो गये। सबके सब शबरी को धन्य - धन्य कहकर जय बोलाने लगे।
       श्रीराम ने बाद में शबरी को धीरज से बैठाकर उसका कुशल क्षेम पूछा और अपने विलंब से आने के लिए खेद भी व्यक्त किया। उन्होंने शबरी के त्याग, तप, संयम, श्रद्धा और भक्ति की भूरि - भूरि प्रशंसा की। श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति नौ प्रकार की भक्ति का उपदेश दिया जो उन्होंने बड़े ऋषियों को नहीं दिया। शबरी दण्डकवन की कुशल जानकार थी। इतना ही नहीं शबरी दिव्य द्रष्टा भी थी इसलिए श्रीराम ने उसे सीताजी का पता तथा आगे जाने का मार्ग भी पूछा। शबरी ने उन्हें पंपासर जाकर सुग्रीव से मित्रता करके सहयोग से लंका विजय की सलाह दी।
       श्रीराम ने शबरी से वर मांगने कहा तो शबरी ने जनम - जनम भगवान की भक्ति माँगी। भगवान जब जाने लगे तो शबरी ने भाव विह्रïल होकर उन्हें बिदाई दी। प्रभु चले गये तो शबरी ने स्वयं योग अग्रि पैदा कर अपने नश्वर शरीर का परित्याग कर दिया। शबरी अमर हो गई।
       शबरी और श्रीराम का मिलन दक्षिण कौशल अब छत्तीसगढ़ के धार्मिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। इसलिए आज भी लोग इस कथा को पूरी श्रद्धा से गाते और सुनते हैं। शबरी कथा वर्णन रामायण और रामचरित मानस में ही नहीं अनेक प्राचीन ग्रंथों में है। महर्षि वेद व्यास ने शबरी का वर्णन पदम पुराण में किया है। किन्तु शबरी पर स्वतंत्र पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। गीता प्रेस गोरखपुर की अनेक किताबों और भक्ति ग्रंथों में शबरी को सम्मान जनक स्थान सदा मिलता रहा है
       शबरी का जीवन त्याग, तप, सदभावना, साधना, सिद्धि श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण है। धर्म के उच्च मानदंडों पर शबरी का जीवन खरा उतरता है। इसका प्रमाण यह है कि स्वयं श्रीराम उससे मिलने आये और उसे इतना प्रेम और सम्मान दिया। शबरी का व्यक्तित्व छत्तीसगढ़ की धरोहर है। सच कहा जाय तो दस लाख वर्ष पहले शबरी ने छत्तीसगढ़ के संस्कारों को जन्म दिया था। शबरी की जितना प्रशंसा की जाय कम है किंतु शबरी सदा से उपेक्षित है।
       आज जब छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ियों की सरकार बन गई है तब शबरी की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ का सर्वोच्च पुरस्कार शबरी के नाम पर होना चाहिए। जगह - जगह शबरी सेवा केन्द्र होना चाहिए। शबरी के नाम पर शोध पीठ होना चाहिए। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात का है कि हमारे आदिवासी समाज के लोग शबरी की ओर क्यों ध्यान नहीं देते ? शबरी इस धरती की प्रथम आदिवासी नारी है जिसने भगवान को प्राप्त कर लिया। शबरी दलित चेतना का सूर्य है।
  • ज्‍योतिष कार्यालय, मेन रोड, तुलसीपुर, राजनांदगांव (छग)

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