इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 14 जून 2013

हे शबरी के राम


  • आचार्य सरोज व्दिवेदी
मैं छत्तीसगढ़ ले बोलत हौं,पांव परत हौं भांचा राम,
तोर सेती हम भांचा मन ला,देवता कहिथन भांचा राम॥

मैं कौशल्या के भाई औं,अउ शबरी के बेटा आंव
जीहां जंगल - जंगल किंजरे,तोर पांव के लेटा तांव॥

राम तोर दण्डक बन होगे,अब जगमग छत्तीसगढ़ राज
शबरी कौशल्या के भाखा,छत्तीसगढ़ी पहिरलिस ताज॥

जिंहा - जिंहा तोर पांव परे हे,माटी सोना उगलत हे
ये ला कहिथे धान कटोरा,हीरा माणिक निकलत हे॥

दुनियां के हे लाखों देवता,छत्तीसगढ़ बर राम हे
तोर दया भर बने रहै,तब दूसर ले का काम हे॥

दया मया ल राखे रइबे,जोर हाथ मनावत हौं
शबरी के बोइर के तोला,सुरता राम देवावत हौं॥

सबके नावं में लगे हे राम,सबके मुंह म बसे हे राम
सुख में दुख में राम - राम,बस छत्तीसगढ़ में राम - राम॥

दण्डक बन छत्तीसगढ़,ये शबरी के धाम
तोर दया बरसे सदा, हे शबरी के राम॥
  • ज्‍योतिष कार्यालय,मेन रोड, तुलसीपुर, राजनांदगाव (छग)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें