इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 20 जून 2013

सुकारो दाई

  • कुबेर

सुकारो अपन घर मुहाटी के बाजू  आंट म बइठ के मेरखू के गोंटी मन ल बीनत राहय। मेरखू बिनई तो खाली बइठे  के बहाना रिहिस। वो तो नंदगहिन के रस्ता देखत रहय । बारा बजे के बेरा रिहिस । अघ्घन . पुस के घाम बनेंसुम. सुमलगत रहय। घंटा भर होगे रिहिस होही । अब तो घाम हा घला बिटौना लगे लगिस। सुकारो ह गोठियाय  बर कलकलत रहय । सोच थे -  कोन जाने, कहां झपाय  होही आज रोगही नंदगहिन हा। नंदगहिन नई हे त नई हे, कांकेतरहिन हा घलो कहां जा के मरगे होही आन दिन कइसे सुकारो.सुकारो कहिके सोरियात आके मुहाटी म जोम दे के बइठ जात रिहिन  मरे रोगही मन,  कोन्हो कहीं घलो जाय  सुकारो मने - मन गुंगवावत रहय असल बात ये आय  कि ओकर बहू आज होत बिहिनिया अपन मइके   गे हे ।  घर म रहितिस त कोन्हो न कोनो ओखी करके वोहा कतको घांव ले वोकर संग झगड़ा मता डरे रहितिस फे र हाय  रे किस्मत, आज पेट के आड़ी कइसे पच ही कोन जाने । सुकारो के मुहूँ अऊ  नानचुक होगे । मेरखू के सूपा ला भरर्स ले भिंया म पटक के ठऊं का उठे बर करत रहय ए ओतकी बेर नंदगहिन ओकर आगू म आके धम ले खड़ा होगे । ठुमक के कहिथे. झाऊ  --
सुकारो मने मन कंझाय  बइठे रहय , तऊ ने पाय  के नंदगहिन के आय  के गम ला नइ पा सकिस अऊ  उही पाय  के नंदगहिन के झाऊ  कहे ले वो हर अलरकरहा चमकगे । लेटेपटे अपन पागी.पोलखा ला संभाहिस अऊ  हफरत - हफरत मुटका बांध के नंदगहिन ला चमकात कहिथे - ''  तोर रोना पर जाय  ते  सियान - सामरत मनखे ला झझका - चमका के मार डारबे '' सुकारो अपन छाती के अंचरा ला अभी तक सोझियाय  नई पाय  रिहिस । गोलिंदा भाटा कस छाती मन डहर कनखही देखत -  देखत नंदगहिन हा बेलबेलात कथे.- '' ओ हो -- सियान , मैं कोनो डउका जात होतेंव, अभीच  झिंकत.झिंकत अपन घर म ओइलातेव तोेला ''
सुन के सुकारो के मुंह कान सरम के मारे ललिया गे । मुंह बिच का के कथे - ''जादा झन इतराय  कर रे छिनार बिलई भइसी, नइ ते कोनो दिन तोरेच  घर एकोठन बिजाड़ खुसरही ''
अतकी सुन के नंदगहिन कठल के हांसे लागिस। सुकारो घला मुसुर - मुसुर मुसकाय  लागिस।  भगवान हा बिचारी सुकारो के जिनगी म गजब परछो लेय  हे । भरे जवानी म वो हा खाली हाथ हो गे रिहिस ।  तब किसन के ऊमर विही पांच  साल के रिहिस होही।  बेटा के मुहु ला देख - देख के वो हा अपन सरी जवानी ला खुवार कर दिस । देवर, जेठ अऊ  पास.पड़ोस के भला -  बुरा नीयत ले अपन मरजाद के रक्‍छा करना रांड़ी मोटियारी बर कोनो सरल काम नोहे । ककरो नीयत ओकर जवानी म लगे राहय त ककरो नीयत ओकर जयदाद म,  फे र वाह रे सुकारो । कोन जाने सुकारो के अंतस म कोन देबी आके बिराज गे । न तो अपन जैयदाद म न अपन मरजाद म कोनो म टिकी लगन नइ दिस। अऊ  आज वोहा बेटा ला पढ़ा.लिखा के , ओकर बर.बिहाव करके, गंगा नहा डरिस । बेटा किसन पढ़लिख के सरकारी नऊकरी के आस लगाय  बइठे हे । खेत - खार कोती चिटको धियान नई देय । बिचारी सुकारो कतेक धियान करे, कतेक हलाकान होय । सोंचे रिहिस, नाती.नतुरा आ जाही तहां ले विही मन ला खवात. खेलात, बचे - खुचे जिनगी घलो पहा जही । फेर हाय  रे किस्मत, पांच  साल होगे, बहु आये, एको ठन तो फूल फूलतिस। बेटा तो अब बहु अलंग होगे।  एकेझन म दिन कइसे बीते । वोकरे सेती सुकारो ह अब बात -  बात म कंझावत रथे, अऊ बहु सन झगड़त रहिथे।
वइसने हाल नंदगहिन के । नंदगहिन के दू झन बेटिच  बेटि हाबे । दूनो झन के बिहाव होगे । नंदगहिन घर म एक झन रहिथे फेर वो हा गजब के बेलबेलही नारी ये । नत्‍ता देख - देख के बेलबेलाय  बर अऊ ठठा - मजाक करे बर कभू नइ चूकय । गांवेच  म नहीं अतराब म घला ओकर जइसन जचकी निबटइया अऊ कोनो नइ हे। ओकर बिना ककरो छट़ठी-बरही नई निभय।
सुकारो अऊ नंदगहिन जिंदगी भर के निकता गिनहा, सुख.दुख के संगवारी आय । सुकारो ह नंदगहिन ला कथे - कते डहर झपाय  रेहेस रे छिनार, दिन भर म अभी दिखत हस । ककरो संग गोठियाय  बर घला तरस गेन '' नंदगहिन कथे - अई बम फटाका फुटिस, तऊन ल नइ सुनेस भइरी कहीं के ।  घर भीतरी के आरो लेवत कहिथे . बहु के आरो नई मिलत हे, नई हे का।''
- '' अपन दाई घर गे हे, छुछवाही गत हा हुड़से सही सुकारो कथे
- ओकरे सेती तोर मुहुं उतरे हाबे न। जावन दे, बिचारी हा दू दिन तो घला हित लगा के खाही पीही।
- हव दाई, हम तो जनम के झगरहिन आवन । दुनिया भर ला झगरत गिंजरत रहिथन ।'' सुकारो हा रिसा के कहिथे  नंदगहिन कथे . श्श्राजा रिसाही त अपन गांव श्रा श्रिही ण् अऊ का करही ण्श्श् सुकारो अऊ भड़क गे ण् नंदगहिन श्रा कोन्हो श्रा भड़काय  बर आथेए तब मनाय  बर घश्रा आथे ण् वो हा सुकारो के कान म मुंहु श्रा टेका के कथे . ष्ष्सुनथस मंडश्रीनए मुकड़दम के बेड़ा म कोनो नइ हेए तइसे फकफक श्रे पंडराए सांगर . मोंगर कस टुरा श्रइका होय  हे ओकर बहु के ण् तभे दना.दनएदना.दन पांच  ठो बम फटाका फोरिस हे ण्श्श्

सुकारो के चेहरा म पानी आगे ण् कथे . ष्ष्अऊ ओकर मुहरन . गढ़न कइसन हेए तेश्रा तो नई बताय  ण् मुकड़दम के टुरा सरिख हेए के गौंटिया के टुरा सरिख हे ण्श्श् इसारा श्रा समझ के दोनों झन खिश्रखिश्रा के हांस डरिन ण् सुकारो कथे . गौंटिया के हरामी टुरा ह चार दिन हमरो घर कोती रमे सही करय  ण् फेर एक दिन सात पुरखा म पानी पकोयेंव रोगहा के ण् जादा करतिस ते ओकर खंडरी नीछ देतेंवए हाँ महू अपन बाप के बेटी आवंव ण्श्श्
छिन भर दुनो झन चुपचाप खड़े रिहीन ण् सुकारो के मुहरन अऊ  उतरे कस हो गे ण् नंदगहीन ओकर मन के बात श्रा ताड़ गे ण् बहू आए पांच  बछर हो गे हे  फेर आज श्रे नाती . नतूरा के दऊ हा नइ हे ण् एकरे सेती सुकारो दिन . रात संसो फिकर म घुरत रहिथे ण् कहिथे . ष्ष् जादा संसो फिकर झन करे कर मंडश्रीनए भगवान के किरपा होही ते तुहंरो घर ऐसो के आत श्रे फटाका फूट के रहही ण्श्श्
सुकारो कहिथे . ष्ष् मत श्रे तै भगवान के नाम श्रा नंदगहीन बहिनी ण् दुनिया बर वो भश्रे होहीए हमर बर नइ हे ण् भगवान होतिस त जिनगी भर हमश्रा अइसने रोवातिस घ् श्श् थोरिक थिरा के फेर कथे . ष्ष् नंदगहीन बहिनीए मैं तो बइद . गुनियाए तेश्रा . बातीए अऊ  दवाई . पानी करत . करत थर्रा गे हवंव ण् बेटा श्र कहिथंवएऐश्रा घर श्रे निकाश्रए अऊ  दूसर बिहाव करए फेर वो हा मोर बात काबर मानही घ्  श्श्
नंदगहीन कहिथे . ष्ष् बहिनीए नारी जात होके दूसर नारी के प्रति अइसन भाव मन म मत रखव ण्पांव भारी नइ होवय  ये मा बहु के का गश्रती हे ण् सरीर ताएएऊं च  . नीच  होवत रहिथे ण् बहु आये गाय  . गप नो हेए जऊ न श्र जब मरजी पाबे घर श्रे निकाश्र देबे ण् अऊ  दूसर बिहाव कराईया मन के किस्सा भुश्रा गेस का  घ् सुरता कर मंगश्रु के ण्का हाश्र होय  रिहिस वोकर ण् श्श् सुरता करके दुनों झन खिश्राखिश्रा के हांस डारिन ण्
इही गांव म एक झन मंगश्रू हे ण् च रवाहा श्रग . श्रग के बिचारा गुजर . बसर करथे ण् भाई बंटवारा म एक खोश्री के घर मिश्रे रहाय  ण् अपन मन खोश्री म सुतय ए दाई हा परछी म सुतय  ण् बिहाती श्रा बठिी कहीकेए वोहा दाई के उभरौनी म एक झन छड़वे डउकी श्र चुरी पहिना के श्रे आथे ण् अब सुते बसे के बेवस्था कइसे करे जाए ण् एक ठन खोश्री मे दुनो बाई के निरवाह नइ होइस त बिहाती के खटिया श्रा पटंऊ हा म च ढ़ा दिन ण् च ढ़े . उतरे बर निसैनी टेका दे रहाय  ण् भगवान के श्रीश्रा अरपरंपार होथे ण् जउन बिहाती श्रा बकठी कहाय ए वोकरे पांव पहिश्री भारी होगे ण् रात म एक दिन मंगश्रू हा घूमफिर के आइसए अऊ  खाल्हे वाश्रे के नींद परगे हे सोंच  के पटऊ हा डहर च ढ़ श्रगीस ण् नींद न खाल्हे वाश्रे श्रा आय  रहय  न
 ऊ पर वाश्रे श्र ण् खाल्हे वाश्रे ह उठीस अऊ  टप श्रे वोकर दुनौ गोड़ श्रा च मच मा के धर श्रिस ण् किहिस . ष्ष् एकरे बर मोश्रा चुरी पहिरा के श्राय  हस ण् उतर खाल्हे ण्श्श्
पटंऊ हा वाश्रे ह घश्रो जागत रहय  ण् अतिक दुरिहा च ढ़ के अब कइसे उतरबे कहिके ओहा मंगश्रू के दुनौ हाथ श्र च मच मा के पकड़ श्रिस ण् खाल्हे वाश्रे ह खाल्हे डहर खींचे उपर वाश्रे ह उपर डहर खींचे ण् खींच  तान म निसैनी ह घश्रौ गिर गे ण् अब तो मंगश्रु राम के देखो . देखो होय  श्रागिस ण् परान छूटत देखिस त अपन दाई श्र जोर . जोर से गोहराय  श्रगीस ण् दाई ह सबो बात श्र समझ गे ण् बेटा श्र बचाए बर दउड़िसए फेर कपाट भीतर श्रे बंद रहय  ण् कइसे खुश्रे अउ कोन खोश्रय  घ् मंगश्रू राम अधमरहा होगे फेर न उपर वाश्रे ह हाथ श्र छोड़िस न खाल्हे वाश्रे ह गोड़ श्र ण्
बेटा के परान छूट जाही कहिके दाई ह गश्री म खड़ा होके गोहरा . गोहरा के चि ल्श्राए श्रागिस ण् गांव भर ओकर मुहाटी म जमा होगे ण् सियान मन कपाट के गुजर श्र उसार के श्रटपट मंगश्रू राम के परान बचाइन ण्

हांसी श्रा श्रटपट थाम के सुकारो कहिथे . ष्ष् त का उपाय  करबो बहिनीए तहीं बता ण् तोर अतीक अऊ  कोन जानही ण्श्श्नंदगहिन कहिथे . ष्ष् मंडश्रीन बहिनीए आज के पढ़े . श्रिखे बहु . बेटा के बिचार म बहुत फरक आ गेहे ण् नरस बाई कहिथे न कि पहश्रा बच्चा अभी नहींए दूसरा कभी नहीं ण् बहु . बेटा मन कहीं अइसने सोंचे होही तब ण्श्श्
सुकारो कथे . ष्ष्ऊ खर सोंचे श्रे का होथे ण् भगवान दिही तउन श्रा ये मन रोक सकही का घ् श्श्
ष्ष्आजकश्र राके के कतको उपाय  निकश्र गेहे बहिनीए हमन नइ जाननएफेर ये मन सब श्रा जानथे ण् श्श् नंदगहिन हा समझाइस ण् ठंउका उतके बेरा किसन हा बजार करके आइस ण् नंदगहीन हा सुकारो श्रा अंखिया के कथे . ष्ष् पक जाए श्रइका तीर जाकेए भेद श्रेके आवत हंव ण् श्श्
थोरिक देर म नंदगहिन ह आ के हांसत . हांसत कहिथे . ष्ष् मोरे बात आखिर सच  होईस ण् फोकट चिंता फिकर म दुबरावत रेहेस ण्बाबू श्रा मय  हा सब समझा दे हंव  इही दिन के आवत श्रे तुहंर घर फटाका नइ फुटही त मोर सन गोठि याबे झनण्श्श्
सुकारो कथे . ष्ष् अईए हम का जानन बहिनी नवा . नवा के टेमटाम श्रा ण्श्श्हांसत . हांसत घर भीतरी आके बेटा श्रा कहिथे . ष्ष् किसन बेटाए बहु मइके च श्र देहे घर ह उदसहा . उदसहा श्रागत हे रे ण् बिहाने श्राए बर च श्र देतेस ण्श्श्किसन कहिथे . ष्ष् आजे तो गिस हे मां ण् दस पंदरा दिन तो रहन दे ण्श्श् सुुकारो कहिथे . ष्ष् ओकरे बर बहु श्राय  हन का रे ण् तय  नई जाबे त हम च श्र देबोन श्राय  बर ण् बहु श्रे घर के शोभा होथय  ण् बहु नोहे वो तो हमर बेटी ये का के श्राज सरम ण् श्श्
सुकारो मंडश्रीन के हिरदे के बदश्रे भाव श्रा नंदगहीन ह ताड़ गे ण् वो हा किसन श्रा कनखियाइस ण् दोनों झन के हंासी छुट गे ण् काकी भतीजा श्र हांसत देख के सुकारो हा झेप गे ण् सेत . मेत के गुस्सा करत किशुन श्र कहिथे . ष्ष् बेटा तोर तीर चि टको बुध हे रे घ् दाई श्र एश्रथस ण् चंडाश्र कहीं के ण् श्श्
किसन ह भीतर कोती भागीस ण् ऐती सुकारो अउ नंदगहीन दुनौ झन खिश्राखिश्रा के हांसन श्रागिन ण्
व्याख्याता, शा. उच्‍च. माध्‍य. शाला  कन्हारपुरी, राजनांदगांव ( छग)

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