इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 28 जून 2013

गाथा और इतिहास : कुछ अनुत्‍तरित प्रश्‍न


-  जीवन यदु  -
जीवन यदु
        लोकगाथा दसमत कैना की लोक व्याप्ति ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य पर कई सवाल खड़े कर देती है। क्या दसमत कैना ऐतिहासिक चरित्र है ? क्या वह मिथ मात्र है ? क्या सामंती जीवन पद्धति में चाटुकार चारणों के विरूद्ध लोक ने अपनी कल्पना को जीवंत चरित्र के रूप में गेयता प्रदान की है ?क्या जसमा ओड़न और दसमत ओड़निन एक ही चरित्र है ? इसी तरह के अनेक प्रश्न मनोमंथन के कारण बनते हैं।
       मेरा आग्रह है कि दसमत कैना की ऐतिहासिकता पर शोध अवश्य किया जाना चाहिए। किन्तु निष्पक्षता की सावधानी शोधकर्ता में अवश्य हो। मेरा यह आग्रह एकदम हवाई आग्रह नहीं है। लोक में इतिहास के कई उदाहरण मौजूद है। आल्हा के अनेक पात्र ऐतिहासिक चरित्र है, किन्तु वह एक लोक गाथा ही है। लोक रंजकता ने उसमें ऐतिहासिक घटनाओं के साथ गैर - ऐतिहासिक दृश्यों को घोल दिया है। जिससे सामंती जीवन मूल्यों, मान्यताओं और क्रिया - कलापों की स्पष्ट झलक मिलती है, तथापि उस लोक काव्य की ऐतिहासिकता प्रमाणित है। ग्यारहवीं सदी में घटित यह इतिहास लोकगाथा के रूप में लोगों के होठों पर आज भी जीवित है। यदि हम निकट इतिहास की बातें करें तो अवध - क्षेत्र में गाया जाने वाला राणा वेणी माधव का पवाड़ा है। जिसके संबंध में डां. कृष्ण बल्देव उपाध्याय ने अवधि लोकगीत पृष्ट - 3 लिखा है - सऩ् उन्नीस सौ सन्तावन ई . में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने वाले राणा वेणी माधव की लोक - गाथा गाँवों में आज भी गायी जाती है।
       लोकगाथा में किसी क्षेत्र के खण्ड विशेष का इतिहास भी हो सकता है। मौखिक परम्परा से यदि खंड - विशेष का इतिहास प्रकाश में आता है तो खण्डों के सामूहिक अध्ययन से न केवल सम्पूर्ण के इतिहास को रौशनी मिलती है अपितु उसका लोक कल्याणकारी पक्ष भी उभरकर सामने आता है। लोक विज्ञ बद्रीनारायण ने लोक संस्कृति और इतिहास नामक पुस्तिका पृ . 55 में लिखा है - इतिहासकार इतिहास में टूटे हुये सूत्रों को जोड़ने  के लिये लोक - संस्कृति को स्त्रोत - सामिग्रियों की तरह उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने सवॉल्टर्न खण्ड - 7 में संकलित ट्रान्सरेजर के शोधकार्य का उल्लेख करते हुए बताया है कि अफ्रीका के इतिहास का व्यापक भाग उनके लोक संस्कृति के अध्ययन से विकसित हुआ है।
       लोक - साहित्य की प्रसरणशील प्रवृत्ति के कारण किसी लोकगाथा को इतिहास की कड़ी से जोड़ने का कार्य निश्चित ही कठिन है क्योंकि उसके प्रस्थान बिन्दु की खोज का कार्य नितांत मुश्किल है। यदि शोधकर्ता ने तार्किक ढंग से प्रस्थान बिन्दु को खोज लिया, जैसा कि थियोडोर बेनफे पंचतंत्र के अनुवादक को उद्धत करते हुए डां. दिनेश्वर प्रसाद ने लिखा है - यूरेशिया की समस्त कथाएँ एक ही प्रसार केन्द्र से चारों ओर फैली है और वह केन्द्र भारत है। लोक साहित्य और संस्कृति पृ. - 68 तब भी प्रश्न रह ही जाता है। क्योंकि भारत कोई छोटा देश नहीं है। विशाल देश है। यहां प्रसार के वास्तविक बिन्दु पर अंगुली रख पाना कठिन है। यदि हम क्षेत्र - विशेष की लोकगाथा के विषय में बात करें तो शोधकर्ता की परेशानी थोड़ी कम अवश्य होती है। किन्तु इतनी भी कम नहीं होती कि पलक झपकते प्रसार के वास्तविक बिन्दु पर निर्णय देते हुये ठीक - ठीक स्थान निशानदेही कर ले। जब हम लोक - सम्पदा के साथ अतीत को खोलने की कोशिश करते हैं, तब पता चलता है कि ऊपर से सीधा और सपाट दिखाई देने वाला लोक अपने भीतर में अतीत के कई रहस्यों को छुपाये हुये है। क्या रहस्यों का भेदन इतना सहज है ?
       मान लीजिए, यदि शोधकर्ता ने गाथा - प्रसार के मूल स्थान को चिन्हित कर लिया तो उसके समक्ष प्रश्र यह आयेगा कि क्या यह गाथा क्षेत्र - विशेष की संस्कृति और वहाँ के तत्कालीन मानस को खोलने वाला जन लोक गढ़न्त मिथ है अथवा वह लोकगाथा अनजाने इतिहास के पृष्ठों को खोलने वाली वास्तविक घटना है ? अथवा दोनों का मिला - जुला सांस्कृतिक - साहित्यिक रूप है ? खोजी व्यक्ति के सामने प्रश्रों का एक सिलसिला हमेशा रहता है। अनजाने अतीत में प्रारम्भ हुई गाथा की महानदी, न जाने कितनी छोटी - छोटी घटना - नदियों को अपने अंदर समो कर अपने रूप को परिवर्तित करती हुई वर्तमान के महासागर तक पहुँचती है। ऐसे में गाथा के मूल पाठ को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं लोकगाथा के जितने गायक है, उतने ही भिन्न - भिन्न पाठ मिलते हैं। दसमत कैना के भी अनेक पाठ उपलब्ध है। यद्यपि मूल कथा एक सी होती है तथापि कुछ - कुछ घटनाएं किसी - किसी पाठ में पात्रों के नामों में भी थोड़ा बहुत परिवर्तन दिखाई देता है। ऐसे में गाथा और इतिहास को जोड़ने के इच्छुक शोधी जन के सामने निश्चित रूप से कठिनाई पैदा होती है। कठिनाई तब भी पैदा होती है, जब उसके सामने लोकगाथा के सम्बन्ध में भावुक किस्म के विद्वानों के मुद्रित - विचार आ जाते हैं। क्योंकि लोकगाथा को इतिहास से जोड़ते हुए दो भिन्न मुद्राओं वाले मुद्रित विचार प्राय: मिलते हैं। प्रथम - लोकगाथा को अपने क्षेत्र के किसी ऐतिहासिक कालखण्ड से जोड़ कर देखते हुए गौरवपूर्ण एकाधिकार घोषणा का प्रयास और द्वितीय पूर्व में की गई एकाधिकारिक घोषणा को नकारते हुए गाथा को अपने क्षेत्रीय - इतिहास से जोड़कर क्षेत्रीय स्तर पर खींचतान की स्थिति पैदा करने का प्रयास। दोनों प्रकार के प्रयासों में तर्कहीनता इस स्तर पर पहुंच जाती है कि वे गाथा नायक के बाणों के निशान अपने क्षेत्र की किसी पहाड़ी चट्टान पर दिखाने से नहीं चूकते। उन्हें घोड़ों की टापों के गहरे चिन्ह भी पत्थरों पर अपने क्षेत्र में मिल जाते हैं। इन्हें वे अपने पक्ष को सबल बनाने और विपक्ष का विरोध करने के लिए ऐतिहासिक प्रमाण मान कर सामने रखते हैं। उपरोक्त दोनों प्रकार के प्रयास लोक - साहित्य और इतिहास के लिए अनुपयोगी ही नहीं हानिकर भी है।
       लोकगाथा दसमत कैना की ऐतिहासिकता पर शोधपरक विचार करने के लिए अनेक बिन्दु हैं। जिन्हें आधार बनाकर आगे बढ़ा जा सकता है -
1 . दसमत कैना की गाथा को गाने वाली देवार जाति का इतिहास।
2. गाथा उड़िया नायक - नायिका से सम्बन्धित है, अत: छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के सम्बन्ध की खोज।
3. गाथा में नौ लाख उड़िया पुरूष और नौ लाख उड़िया महिलाएँ चम्पक - भांठा में डेरा जमाती है, अत: दुर्ग रजवाई का इतिहास।
4. ओड़ार बंद चूंकि राजनांदगांव के निकट है, अत: राजनांदगांव का इतिहास।
5. उड़ीसा की लोकगाथा।
6.दसमत कैना और जसमा ओड़न की लोकगाथाओं के बीच के सम्बन्धों का अध्ययन।
7.कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास।
       यद्यपि दसमत कैना की देवार जाति के गायक अब गायिकाएँ भी बरसों से गाते रहे हैं तथापि इस लोकगाथा का मुद्रित पाठ संभवत: पिछली शताब्दी के सातवें दशक में प्रकाश में आया। इसी के बाद लोगों का ध्यान इस लोकगाथा पर विशेष रूप से गया। दसमत कैना या दसमत ओड़िनिन एक तरह से देवार जाति को लोक - साहित्यिक - सांस्कृतिक धरोहर है। लोकसाहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि कई गाथाएँ ऐसी है जो जाति विशेष मे ही गयी जाती है। वैसे दसमत कैना की गाथा को सिर्फ देवार - जाति के लोग गाते हैं या बाँस वाद्य पर गायी जाने वाली गाथाएँ यादव लोग। जाति - स्तर या जाति या जाति - सीमित लोककथाएं जाति - गौरव से सम्बन्धित होती है। यादव जाति की लोक गाथाएँ उनकी जाति की सामंत कालीन या तो प्रेम कथाएँ है या वीराख्यान है। इसी तरह गोपाल साय बिझिया की गाथा देवार जाति की गौरव गाथा है। किन्तु दसमत कैना देवारों को जातीय - आख्यान नहीं है। यद्यपि वह लोकगाथा देवार गायकों द्वारा ही गायी जाती है, तथापि इसमें उड़िया जन के आदर्शों को रेखांकित किया गया है। यहाँ प्रश्र यह उठता है कि क्या देवार जाति का सम्बन्ध कभी उड़ीया से भी रहा है ? लोरिक चंदा और पंडवानी की गाथाएं लोक में न केवल कई जातियाँ गाती है, अपितु ये गाथाएँ देश के कई क्षेत्रों में परिवर्तित रूप में गायी जाती है। ये किसी एक जाति की धरोहर न होकर सम्पूर्ण लोक की धरोहर है। दसमत कैना केवल देवार जाति की सांस्कृतिक पूँजी है। इसका अर्थ यही निकलता है कि यह गाथा इसी जाति में पैदा हुई और इसी जाति में विकास भी पाया है। यदि ऐसा ही है तो गाथा के पात्र छत्तीसगढ़ी क्यों नहीं है ? गाथा के पात्र तो उड़ीसा से सम्बन्ध रखने वालेे हैं इसीलिये देवार जाति और उड़ीसा के सम्बन्धों पर प्रश्र उठता है।
       कुछ विद्वानों ने छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में फैले हुए देवारों का सम्बन्ध रतनपुर राज्य से माना है। रतनपुर अतीत में छत्तीसगढ़ की राजधानी थी। कुछ विद्वानों का विचार है कि देवारों की मूल भूमि मंडला है और वे वहीं से रतनपुर पहुंचे। मंडला के गोंड़ आदिवासियों से उनकी अभिन्नता रही है। विद्वानों के इस विचार से सहमत हुआ जा सकता है क्योंकि गोंड़ आदिवासियों में जो गोत्र पाए जाते हैं, वही गोत्र देवारों के भी होते हैं यथा नेताम, कुंजाम, मरकाम आदि। श्री निरंजन महावर जी का कथन है कि मंडला में देवार जन - जाति के लोग आज भी देवी के पुजारी का कार्य सम्पन्न करते हैं। यदि देवारों को सम्बन्ध मंडला के गोड़ों से मानते हैं तो दसमत कैना की लोकगाथा को लेकर कुछ सवाल खड़े होते हैं। क्या देवार जाति इस लोकगाथा को अपने साथ लेकर मण्डला से रतनपुर की ओर प्रस्थित हुई अर्थात रतनपुर में बसने से पहले मंडला की देवार जाति जो गोंड़ों के देवी मंदिरों में दीप जलाने का कार्य करती है, में दसमत कैना से मिलती - जुलती कोई लोक गाथा है ? पात्रों के नामों में थोड़ा बहुत परिवर्तन हो सकता है यह परिवर्तन क्षेत्रान्तर के प्रभाव से भी होता है। गाथा - गीतों में इस तरह के परिवर्तन की सम्भावना ऐसी जातियों के गायकों द्वारा भी बन जाती है। जो राज्याश्रित चारणों की तरह गायन करती है। श्री निरंजन महावर कहते हैं - ऐसा प्रतीत होता है कि मंडला के कुछ देवार परिवार रतनपुर के हैहयवंशी राजाओं के राज्य में आकर गोंड़ मिथकों एवं आख्यानों से सम्बन्धित गाथाओं का प्रस्तुतिकरण करने लगे । महावर जी के इस विचार को ध्यान में रखते हुए एक प्रश्र यह खड़ा किया जा सकता है कि क्या दसमत कैना की गाथा मंडला के किसी गोड़ - मिथक का परिवर्तित रूप है ?
       दैनिक समाचार पत्र नवभारत के 19 अक्टूबर 1999 के अंक में श्री रामअधीर ने छत्तीसगढ़ के यायावर देवार नामक लेख में लिखा है - जब छत्तीसगढ़ हैहयवंशी राजाओं की राजधानी रतनपुर रही तब यह जाति इस वंश के राजाओं के दरबार में जाकर मनोरंजन करती थी। देवार जाति के गायक गोपाल राय बिंझिया की गाथा भी गाते हैं। इसे वे अपना पूर्व पुरूष मानते हैं। गोपाल राय बिझिंया नामी मल्ल था और यह राजा कल्याण साय के दरबार में प्रतिष्ठित था। गाथा गायक अपने इस पूर्वज को राजा कल्याण साय का दूध - भाई बताते हैं। इसी मल्ल ने अपने राजा को दिल्ली के शहनशाह के बन्दी गृह से मुक्त कराया था। शहनशाह कौन ? कुछ विद्वान सम्राट अकबर का और कुछ जहांगीर का अनुमान लगाते है। वैसे कल्याण साय का राजत्व काल सन् 1544 से 1556 तक है। अकबर का शासन काल सन् 1556 से 1605 ई. है तथा जहांगीर का सन् 1605 से 1627 ई. है। इतिहास के प्रमाण से गोपाल मल्ल सम्राट अकबर के समकालीन है। गोपाल मल्ल की गाथा यह प्रमाणित करती है कि देवार गायकों ने मंडला से रतनपुर आकर भी गाथा सृजन किया है। क्या दसमत कैना की लोक  गाथा देवार गायकों द्वारा रतनपुर में निवास करने के बाद रची गई है?
        कुछ विद्वान दसमत कैना की गाथा को जसमा ओड़न की लोकगाथा से जोड़ कर देखते है। जसमा ओड़न की गाथा मालवा और गुजरात प्रांत में गायी जाती है। किसी भी रचना को, चाहे वह लोक- रचना ही क्यो न हो, हवाई और आधारहीन नही माना जा सकता। मालवा हो, गुजरात हो, छत्तीसगढ़ हो या मंडला- क्षेत्र हो- इस गाथा को वास्तविक घटना- जनित आधार मिला है। लेकिन कहां और कब? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।
       दसमत कैना की गाथा में ओड़िया- ओड़निन जाति इतिहास सम्बन्धी चिन्तन को दिशा देने वाली है। वास्तव में ओड़िया कोई जाति नही है, अपितु यह उड़िसा के लोगों की प्रादेशिक उपाधि की संज्ञा है। लोक में प्रादेशिक उपाधि भी जाति मान ली जाती है। दुर्ग नगर के निकट एक ग्राम है- कुरेटा खपरी। वहां ढाई तीन सौ की आबादी है, जो अपने ओड़िया जाति की बताती है तथा अपना संबंध दसमत कैना से जोड़ती है। वे यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि कभी उनका संबंध उड़ीसा से रहा है। महान प्रजातंत्रीय व्यवस्था में सत्ता हस्तगत करने के कूटनीतिक प्रयास में जब जाति  और समुदाय को हथियार बनाया जाता है तब भाषिक अथवा साँस्कृतिक स्तर पर छोटे - छोटे जन - समूह अपनी आर्थिक - सामाजिक सुरक्षा निश्चित करने की कोशिश में जाति में भी रूपान्तरित हो सकते हैं। अनेक ऐसी घटनाएँ है, जिनके कारण नयी जातियाँ निर्मित हुई हैं, जिनके कारण नयी जातियाँ निर्मित हुई है। आजादी के बाद भारत - पाक बंटवारे के समय दुर्भाग्यपूर्ण साम्प्रदायिक दंगों को झेलते हुए जो लोग छत्तीसगढ़ में आ बसे, जो जाति के कॉलम में सिन्धी लिखने और लिखाने लगे। उनकी प्रादेशिक उपाधि की संज्ञा ही लोक में जाति बन गई। आज सिन्ध उनकी स्मृतियों मं ही शेष हो सकता है। यह मात्र 57 - 58 वर्ष पहले की घटना है। जिन घटनाओं को घटित हुए सदियाँ बीत गई हो, उनकी स्मृतियाँ भी शेष न रहे तो कोई आश्चर्य नहीं, किन्तु परम्परा से चले आ रहे शब्दों में इतिहास का सत्य झलकता रहता है। ऐतिहासिक उथल - पुथल से उत्पन्न असुरक्षित स्थितियों में मनुष्य के मन में स्व - सुरक्षा की भावना प्रबल होती है। ऐसे में मनुष्य भाषा और संस्कृति को आधार बनाकर समूह में एकता बनाता हुआ एक नयी जाति को जन्म देता है। कभी - कभी सुनियोजित ढंग से मुहिम भी चलाई जाती है। किसी नयी जाति का बनना कोई नयी बात नहीं है। जिस काल में सर्वाधिक अंतर्भुक्यिाँ हुई, उसक काल में कार्यस्थ या कायस्थ जाति समाज - पटल पर उभरी। डॉ. रागेय राघव ने अपनी पुस्तक यात्रा - महायात्रा में अनेक ऐसी जातियों को गिनाया है जो पूर्वकाल में नहीं थी। यादव जाति में छत्तीसगढ़ में एक कनौजिया प्रजाति है जो कन्नौज से आकर पूर्वकाल में छत्तीसगढ़ में बस गई। अब उनका स्थानवाची नाम ही उसकी जाति है। तात्पर्य यह कि लोक में प्रदेशवाची अथवा स्थानवाची संज्ञा भी जाति स्वीकार ली जाती है। आज राजनीतिक पैतरेबाजी में जाति एक प्रमुख औजार है। अत: किसी छोटे या बड़े समुदाय का एक नवीन जाति बनती है। तब वह अपने लिए कोई एक प्रतीक भी गढ़ती है, जो उस जाति की पहचान बनता है। वह नई जाति किसी पुराने मिथ सिरजती है। इन दिनो जाति का मामला सर्वाधिक संवेदनशील है। अत: ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रखना ही श्रेयस्कर है। प्राचीन काल में उड़ीसा का क्षेत्र ओडू या उडू देश कहलाता था, जिसका अर्थ ऊँचा उड़ने वाला देश। इस राज्य की उन्नती ने इसे यह उपाधि दिलाई थी। महाभारत के सभापर्व ३१,७१ में इस देश का उल्लेख हुआ है- पांड्याश्च द्रविडांश्चैव सहिताश्चोड्रकेरलै: . . .। यह खोज का विषय है कि मंडला से निकले हुये देवार क्या  सीधे रतनपुर जाकर बस गए अथवा छत्तीसगढ़ की सीमा को पार करके उड़ीसा जा बसे? क्या वहां किसी लोकगाथा को आधार बनाकर एक नया आख्यान गढ़ लिया? क्या वे उड़ीसा से रतनपुर आए? यह ज्ञात करना भी दिलचस्प होगा कि किस काल में उड़ीसा में ब्राम्हणों का राज्य था। यह इसलिये आवश्यक है, क्योंकि गाथा का नायक एक ब्राम्हण राजा है, इसी कारण कुछ देवार गायक दसमत- कैना की गाथा को ओड़िया बाम्हन का गीत भी कहते है कुछ लोगों का मानना है कि सम्भवत: दसवीं- ग्यारहवीं शताब्दी के  आसपास उड़ीसा में ब्राम्हण राजा हो गये हैं।
       जिस तरह की घटना दसमत कैना में मिलती है अर्थात राजकुमारी से मजदूरिन बनी भतीजी पर राजा का आसक्त हो जाना , उस तरह की घटना जाना असंभव नहीं है किन्तु में यह घटना क्या किसी काल में प्रचारित रही होगी- यह खोजना भी दिलचस्प नहीं होगा। लोक ऐसी अनैकताओं पर परदे नहीं डालता, बल्कि उसका प्रत्यक्ष विरोध न करते हुए, अपने उस विरोध को रचनात्मक स्वरूप देकर चिरकाल तक जीवित रखता है। यदि अतीत में उड़ीसा में ऐसा कुछ घटा होगा, तो लोक में आज भी परिवर्तित रूप में ही सही, होना चाहिये। यदि दसमत कैना को हम इतिहास न मान कर मिथ ही माने तो भी उस मिथ का आधार क्या है?
        लोकगाथा की ऐतिहासिकता पर विचार करते हुये देश काल के सम्बन्ध में निर्णयात्मक बात कह देना उचित प्रतीत नहीं होता। जो भी निर्णय किया जाता है, वह ठीक- ठीक न होकर प्राय: लगभग ठीक के करीब होता है। मालवा क्षेत्र और गुजरात में प्रचलित जसमा ओड़न की लोकगाथा का प्रसार छत्तीसगढ़ क्षेत्र में हुआ या छत्तीसगढ़ की दसमतकैना की गाथा मालवा गुजरात तक फैली यह कह पाना लगभग कठिन है। यद्यपि कुछ विद्वानों ने निर्णय देते हुये कह दिया कि जसमा ओड़न को छत्तीसगढ़ के लोकगायकों ने दसमत ओड़निन कर दिया है। अर्थात जसमा ओड़न का प्रचार- प्रसार छत्तीसगढ़ में दसमत ओड़निन के रूप में हुआ है। क्योंकि छत्तीसगढ़ का लोक जन ओड़ जाति से परिचित नहीं है, किन्तु ओड़िया जाति से पूर्व काल परिचित है। उन विद्वानों का कथन है कि जसमा ओड़न की गाथा इतिहास प्रसिद्ध पाटन नरेश जयसिंह सिद्धराज से जुड़ी हुई है। इसके सम्बन्ध में उन विद्वानों को किस तरह के ऐतिहासिक साक्ष्य मिलेक है- मुझे ज्ञात नहीं है। यदि हम इन विद्वानों के कथन को सही मान ले तो कई प्रश्न खड़े हो जाते है:-
१. जसमा ओड़न की गाथा मालवा और गुजरात क्षेत्र से छत्तीसगढ़ किस तरह पहुंची होगी? व्यापार या धर्म सम्बन्धी कारणों से अथवा संचरणशील जातियों के कारण लोक की चीजें प्रचार- प्रसार पाती है। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि अतीत में आवागमन की सुविधा सुव्यवथित और सुरक्षित नहीं थी। क्या देवार जाति अतीत में संचरण शील जाति ही थी? लोकगाथा गायक उपरोक्त राज्यों के दरबारों में आए थे?
२. इतिहास में देवारों के दो ही ठिकाने मिलते है- मंडला राज्य और रतनपुर राज्य। क्या गुजरात अथवा मालवा  के लोकगा लोकगााळथ्ज्ञ
३. ओड़ जाति की अनभिज्ञता छत्तीसगढ़ के लोक- समाज में अब तक है। प्रश्न यह है कि तब का लोक समाज इस जाति की लोकगाथा से भिज्ञ कैसे हुआ?
४. देवार जाति ने क्या मालवा- गुजरात की यात्रा की थी? इतिहास के जानकार देवारों की यात्रा को मंडला से रतनपुर ही स्वीकारते है।
५. यदि यह गाथा मालवा- गुजरात से चल कर छत्तीसगढ़ आई, तो क्या जसमा ओड़न के गाथा गायक देवार जाति को ही बताकर चली गई? यह प्रश्न इसलिए उठता है, क्योकि दसमत कैना की गाथा केवल देवार जाति के ही गायक गाते है। यह गाथा केवल देवारों की ही धरोहर है, सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ी लोक ही नहीं। यदि यह सम्पूर्ण लोक की पूँजी होती तो सभी जाति के गाथा गायकों को यह गाथा मालूम होती और वे इसे भी गाते। उदाहरण के तौर पर लोरिक- चंदा की गाथा को लिया जा सकता है। इस गाथा को देश के अनेक हिस्सों में थोड़े- बहुत परिवर्तन के साथ गाया जाता है। छत्तीसगढ़ में लोरिक चंदा की गाथा यादव जाति के लोग बाँस- वाद्य पर गाते हैं तो अनुसूचित कही जाने वाली जाति एक विशेष के लोग इसी गाथा को चंदैनी के नाम से गाते हैं। ऐसी गाथाओं का उद्गम खोजना ज्यादा कठिन होता है। दसमत कैना जाति- सीमित गाथा है। यदि यह गाथा बहुज्ञापित होती तो छत्तीसगढ़ की अन्य जातियों के गायकों द्वारा यह गाथा गायी जाती। यह क्यों एक जाति में सिमट कर रह गई? ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि, इस लोकगाथा का मुद्रित रूप सन् १९६२ में प्रकाश आया और वह गाथा देवार गायकों द्वारा प्राप्त हुई थी। यह भी सत्य है कि पूर्व में यह किंवदन्ती के रूप में रही है, जिसका उल्लेख सन् १९२५ में अष्टराज- अम्भोज में ओड़ार बंद के सिलसिले में हुआ है, किन्तु किंवदन्ती भी बिल्कुुल वैसी नहीं है, जैसा कि गाथा में है।
६. क्या जसमा ओड़न और दसमत कैना गाने वाली जातियों में कोई आपसी सम्बन्ध पूर्व काल में था? यह प्रश्न जाति- स्तर की लोकगाथा होने के कारण उठता है।
७. यदि यह मान लिया जाए कि जसमा ओड़न की गाथा को मालवा गुजरात में कोई जाति विशेष नहीं गाती, अपितु वहां के सम्पूर्ण लोक की विभिन्न जातियाँ विभिन्न लयों एवं वाद्यों पर गाती है, तो प्रश्न उठता है कि देवार जाति ने इतिहास के किस कालखण्ड में मालवा भूमि पर और गुर्जर प्रदेश में अपना रूँझू बजाया था और जसमा- ओड़न की गाथा सीख आये? क्षेत्रान्तर जातियो के सम्मिलन में क्षेत्रीय संस्कृतियों का भी आदान- प्रदान होता है। उक्त क्षेत्रों में यदि देवार जाति गई थी तो वहां के लोकगीतों पर देवार जाति में गाए जाने वाले गीतों का प्रभाव होना ही चाहिये, कोई गाथा परिवर्तित रूप में मिलनी ही चाहिए- जसमा ओड़न की लोकगाथा को छोड़कर क्या ऐसा है?
       छत्तीसगढ़ी में प्रस्तुत दसमत कैना में आए व्यक्तिवाची और स्थानवाची नामों पर भी विचार करने की आवश्यकता है। इसमें दो राजाओं के नाम आते हैं - भोगदेव और महानदेव। दोनों आपस में भाई है। किसी - किसी पाठ में भोगदेव के स्थान पर भोजदेव आता है। लोक साहित्य की वाचिक परम्परा के कारण नामान्तर होना स्वाभाविक है। श्रीमती रेखा देवार की गायकी में भोजदेव आता है, जो ब्राम्हण जाति का है। दसमत कैना इसी की बेटी है -
राजा भोज बाम्हन कई बेटी
कुल बमनीन के जात
       श्री दलेश्वर साहू द्वारा एक वयोवृद्ध देवार गायक की गाथा - गायकी रिकार्ड की गई। इसमें राजा भोज के स्थान पर राजा भोगदेव मिलता है -
जात के बेटी नोहवं ग बाम्हन देवता
करम के बेटी आंव
राजा भोग के बेटी लगे भतीजिन तोर।
       यह नामान्तर तो समझ में आता है, किन्तु श्री निरंजन महावर द्वारा संकलित गाथा में दसमत कैना के पिता का नाम भोज या भोगदेव के स्थान पर राजा महर मिलता है -
राजा महर के बेटी ये दसमत
ये दे ओड़निन के ज्वान।
       इसका सीधा अर्थ है कि गाथा गायक अन्य गाथा - गीतों से प्रभावित होकर नामान्तर करने में हिचक अनुभव नहीं करते। जिन लोगों ने चंदैनी अथवा रोरिक चंदा की गाथा सुनी होगी, वे जानते हैं कि राजा महर गाथा नायिका चंदा के पिता है, दसमत कैना के नहीं। वाचिक परम्परा के कारण लोक की चीजें आपस में उलझी - उलझी और रहस्यमय प्रतीत होती है।
        राजा भोगदेव या भोजदेव के छोटे भाई का नाम गाथा में महान देव, महम देव या माहम देव मिलता है, जिसे गायकों का उच्चारण दोष माना जा सकता है। चूंकि देवार जाति रतनपुर के हैहयवंशी राजाओं के दरबार में मनोरंजन के लिये नृत्य गान प्रस्तुत करती रही है। उसे राज्याश्रय प्राप्त था, अत: यह सोचना लाजिमी है कि  हो सकता है हैहयवंशी राजाओं में ही कोई महानदेव और भोगदेव हुआ हो। किन्तु हैहयवंशी राजाओं में ये नाम नहीं मिलते। यह कोई समस्या भी नहीं है क्योकि त्रिपुरी के हैहय राजा कोकलदेव के 18 पुत्र थे। ये 18 पुत्र 18 मंडलों के मांडलिक थे। इन मांडलिकों के पुत्र - पौत्रों को भी जमीदारियां मिली होगी। संभव है उन्हीं में ये नाम हो। इतिहास केवल महत्वपूर्ण और शक्ति - केन्द्र सत्ताधारियों को उल्लेख मानता है।  किन्तु लोक दृष्टि इस तरह का भेद करना नहीं जानती। ईसा की पन्द्रहवी शताब्दी 1410 ई. में रतनपुर के कलचुरियों हैहयवंशी या चेदिवंशी की एक शाखा ने रायपुर को अपनी राजधानी बना लिया तब रायपुर राजधानी के अन्तर्गत दूसरे 18 गढ़ आ गए। इन गढ़ों में दसमत कैना की ऐतिहासिकता पर विचार करने की दृष्टि से तीन गढ़ महत्वपूर्ण है - रायपुर, दुर्ग और पाटन।
       इस अध्ययन के दौरान में जसमा ओड़न और दसमत कैना को एकमेव नहीं मान रहा हूं, बल्कि उपलब्ध जानकारियों को सामने रख कर केवल अनुमान लगाना चाहता हूं कि किन ऐतिहासिक सत्यों को लेकर दसमत कैना को आकार मिला है।
       पूर्व में कहा जा चुका है कि कुछ विद्वानों की स्थापना है कि अन्हिलवाड़ा गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह  सिद्धराज जसमा ओड़न के आधार पात्र है। जयसिंह सिद्धराज के पूर्वज और सोलंकी चालुक्य राज्य के संस्थापक मूलराज ने पाटन गुजरात में शिव मंदिर का निर्माण कराया था। सिद्धराज के पितामह राजा भीम का काल सन् 1022 से 1064 ई. माना जाता है। इस हिसाब से सिद्धराज 11 वीं - 12 वीं शताब्दी में वर्तमान थे। अत: जसमा ओड़न की घटना का सम्बन्ध उसी काल से माना जाता है।
        छत्तीसगढ़ में रतनपुर के कलचुरि नरेश राजा जयसिंह का काल भी 11 वीं - 12 वीं शताब्दी ही पड़ता है। रतनपुर के प्रसिद्ध विद्वान बाबू रेवाराम ने राजा प्रताप मल्लदेव के बाद की पीढ़ी की जो शोधपूर्ण तालिका प्रस्तुत की थी, उसमें सर्वप्रथम नाम राजा जयसिंह का आता है। हैहयवंशी प्रताप मल्लदेव सन् 1978 में नरेश हुए थे और उसके बाद, बाबू रेवाराम की तालिकाा के अनुरसार जयसिंह ने गद्दी सम्हाली होगी। किन्तु उनके समय में पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़ भले ही अस्तित्व मेें आ चुका रहा हो, रतनपुर राज्य के अन्तर्गत वह गढ़ में शुमार संभवत: नहीं था। पाटन का यह गढ़ के रूप में उत्कर्ष रायपुर के कलचुरि शाखा ने किया होगा और यह 14 वीं - 15 वीं शताब्दी की बात है। व्यक्तिवाची और स्थानवाची नामों का साम्य एक संयोग भले हो किन्तु इसमें लोकगाथाओं को आकार देने वाली और पुष्ट करने वाली किंवदन्तियाँ पैदा अवश्य होती है। इन किंवदन्तियों के दबाव में इतिहास पीछे छूट जाता है। कहा जाता है कि पाटन गुजरात में नरेशों ने अनेक तालाब खुदवाए। जहाँ तक प्राचीन राजाओं के द्वारा तालाब खुदवाने का प्रश्र है, जयसिंह सिद्धराज की तरह कलचुरि नरेशों ने भी अनेक तालाब खुदवाये हैं। रजवाड़े के जमाने में नदियों से दूरस्थ बस्तियों में तालाबों की भरमार होती थी। रायपुर के अनेक मुहल्ले तालाबों को पाटकर ही बसे हैं। छत्तीसगढ़ के अनेक गाँवों में चार आगर चार कोरी तालाबों की किवदन्ती आज भी सुनी जाती है। केवल इसी एक भौतिक तथ्य को लेकर लोकगाथा की ऐतिहासिकता प्रमाणित नहीं की जा सकती।
        दसमत कैना के नायक या खलनायक में तीन बाते प्रमुख है- प्रथम वह उड़िया है, द्वितीय वह ब्राम्हण है, और तृतीय वह राजा है तथा राजा भोगदेव भोजदेव का भाई है। प्राचीन काल के सामंती व्यवस्था वाले समाज में परगनाधीश, जमींदार और छोटे- छोटे सामंत भी प्रजा के द्वारा राजा ही सम्बोधित होते थे। वे इतने महान माने जाते थे कि उनसे बड़ा सारे संसार में कोई नही होता था। मराठा काल के गौंटिया अपने गांव में सर्वशक्तिमान समझे जाते थे। यदि दसमत कैना की घटना कलचुरी काल की है, तो प्रश्न उठता है कि क्या कलचुरी ब्राम्हण थे? न तो इतिहास उन्हे ब्राम्हण मानता और न कलचुरि नरेश स्वंय को ब्राम्हण मानते थे। कलचुरि राजा चेदिवंशी भी कहलाते थे। चेदि राज्य और कलिंग देश का निकट सम्बन्ध रहा है। कलिंग का इतिहास प्रसिद्ध राजा खारवेल भी स्वंय को चेदिवंशी कहता था। कलचुरी राजा जाजल्य देव  ने अपने राज्य का विस्तार उड़ीसा तक किया था। किन्तु इन बातों से कलचुरि न ब्राहा्रण सिद्ध होते है और न ओड़िया। प्राचीन इतिहास में इतनी उथल - पुथल है कि अतीत के सत्य शोधन के लिए अनुमान का ही सहारा लेना पड़ता है, और ऐसे में प्रश्रों का उठना भी अनिवार्य है। प्राचीन काल में राजा ब्राम्हणों को गाँव और सम्पत्ति दान में देकर जमींदार अथवा सामंत बना देते थे। अत: प्रश्र उठता है कि क्या किसी कलचुरि नरेश ने किसी उड़िया ब्राम्हण को गाँव इत्यादि दान में देकर प्रजा की दृष्टि में उसे राजा का सम्मान दिलाया था ?
       तखतपुर नगर को बसाने वाले कलचुरि नरेश तखत सिंह जो सत्रहवीं शताब्दी में विद्यमान थे, ने अपने दीवान एक बड़गैया ब्राम्हण से अपनी रानी का नियोग करवाया था और संतानवान बने थे। यह बात गुप्त थी, किन्तु भविष्य में गुप्त नहीं रही। तब उस बड़गैया ब्राम्हण को तखत सिंह का पुत्र राजसिंह, जो बड़गैया ब्राम्हण के वीर्य से पैदा हुआ था, अग्रि को समर्पित कर दिया। कौन था वह बड़गैया ब्राम्हण ? राजाज्ञा से राजतंत्र ने प्रजा के बीच कौन से जघन्य अपराध जिसमें जिन्दा जलाया जा सकता हो का प्रचार उस बड़गैया ब्राम्हण के लिए किया होगा ? सही बात का प्रचार तो निश्चित रूप से नहीं किया गया होगा। छत्तीसगढ़ दिग्दर्शन में मदनलाल गुप्ता ने इस घटना का उल्लेख किया है। गाथा के रहस्य को खोलने के लिए इस तरह के छोटे - छोटे औजार भी काम में आते हैं। गाथा गाकर मनोरंजन करने वाले देवार गायकों ने भी गाँवों - शहरों में उस ब्राम्हण की अनैतिकता, चरित्रहीनता और देहलोलुपता का प्रचार किया होगा, क्योंकि वे  राज्याश्रित कलाकार थे। दसमत कैना में प्रेम के बहाने ब्राम्हण राजा महानदेव की जो देहलोलुपता प्रकट हुई है, उसका आधार यही ब्राम्हण तो नहीं ?
दसमत कैना में वर्णित स्थान - नाम भी सोचने के लिए बाध्य करते हैं -
आगू रहिगे धार नगर
अब दुरूग कहाय
धार नगर के चंपक भांठा
डेरा परे नौ लाख।
       गाथागायक कहते हैं कि जो स्थान पहले धार या धारा नगर कहलाता था, अब वह दुर्ग कहलाता है। दसमत कैना में वर्णित स्थानों की ऐतिहासिकता पर तैयार करने से पूर्व एक स्थापित सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि लोकसाहित्य में सब कुछ सिलसिलेवार नहीं होता, जो उलझन और अनिश्चितता का कारण बनता है। इस बेसिलसिले का कारण गायकों का अज्ञान पात्र नहीं है, अपितु उनका उद्देश्य श्रोताओं के समक्ष मूलकथा को रखते हुए रसातिरेक की सृष्टि करना भी है। यह उनकी गायकी का प्रथम सोपान होता है। दूसरे सोपान में वे एक साथ गायक और श्रोता बन जाते हैं। वे अपने द्वारा सृजित रस में श्रोताओं  की तरह डूब जाते हैं। इस मस्ती के आलम में हम लोक गायकों से किसी सिलसिले की उम्मीद नहीं कर सकते। इस दशा में वे स्वयं को ऐसा विस्तार देत हैं कि सारी भौगोलिक ऐतिहासिक सीमाएं टूट जाती है। दसमत कैना का महान देव दसमत कैना को प्रलोभन देते हुए कहता है -
पान खाय ला पटना ल देहौं
चुरी बर फुलझर राज।
लुगरा पहिरे बर रायगढ़ ल देहौ
अउ चूरा बर चाँपा बाजार।
टिकुली पहिरे बर धमधा ल देहौं
अउ बइठे बर धौरागढ़ के राज।
श्रीमती रेखा देवार - सं. डॉ. सोनऊराम निर्मलकर
       क्या महानदेव इतना बड़ा राजा था कि उसके राज्य की सीमा पटना बिहार तक फैली थी। भविष्य का गाथा गायक इसमें रूस - अमेरिका भी दे तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि उनके द्वारा रससृष्टि के दौरान भौगोलिक सीमाएं राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय हो जाती है। गाथा गायक सृजक रचनाकार भी हो जाता है। जहाँ एक प्रश्र उठता है कि यह पटना कहीं पाटन तो नहीं जो दुर्ग के निकट है। छत्तीसगढ़ के गढ़ों में पाटन भी एक गढ़ था। अतीत को लेकर स्वाभिमान जागरण की बात करने वाले लोग छत्तीसगढ़ की सीमा को पटना बिहार तक खींचकर गर्वोक्ति कर सकते हैं, किन्तु छत्तीसगढ़ के इतिहास में ऐसा कभी नहीं रहा।
       लोक गायकों और लोक मर्मज्ञों का कथन है कि राजा भोगदेव या भोजदेव धारा नगर के राजा थे। साथ ही वे वर्तमान दुर्ग को धारा नगर कहते है। प्रश्र उठता है कि किस सन् - संवत में दुर्ग को धारा नगर कहा जाता था। क्या कलचुरियों की रायपुर शाखा बनने से पहले ? दुर्ग भी 36 गढ़ों में एक गढ़ शुमार होता था और यह कलचुरियों की रायपुर शाखा बनने के बाद प्रकाश में आया। दुर्ग के नाम से भी लगता है कि जब यहां गढ़ किला बना होगा, तभी इसका नाम दुर्ग पड़ा होगा। रायपुर शाखा ईसा की 14 वीं - 15 वीं सदी में बनी ऐतिहासिक नामावली नामक पुस्तक में विजयेन्द्र कुमार माथुर लिखते हैं - इसकी रायपुर की स्थापना संभवत: 14 वीं शती के अंतिम चरण में हुई थी। खलारी के कलचुरि नरेश राजसिंह ने प्रथम बार यहां अपनी राजधानी बनायी थी पृ. 794- 95 क्या इससे पूर्व दुर्ग नगर धारा कहलाता था ? गाथागायक और इतिहास दोनों धारा नगरी को राजा भोज की नगरी मानते हैं किन्तु दुर्ग के रूप में उसकी निशानदेही संतोषजनक नहीं लगती। विजयेन्द्र माथुर ने ऐतिहासिक स्थानावली में धारा नगरी और राजा भोज की जानकारी इस तरह दी है - संस्कृत के मध्ययुगीन साहित्य में प्रसिद्ध नगरी, जो राजा भोज के सम्बन्ध के कारण अमर है। राजा भोज रचित भोज प्रबंध में तथा अन्य अनेक प्राचीन कथाओं में धारा नगरी का वर्णन है। 11 वीं - 12 वीं शतियों में परमारों ने मालवा प्रान्त की राजधानी धारा में बनायी थी। इस वंश के राजा भोज उज्जयिनी से राजधानी हटाकर धारा को यह प्रतिष्ठा दी पृ. 466 गाथा और इतिहास में नाम - साम्य को देख कर यह प्रमाणित करने की कोशिश हो सकती है कि यह गाथा मालवा के परमार राजा से है, किन्तु मेरा प्रश्र अब भी अनुत्तरित है। दसमत कैना देवार जाति की जाति - बंद गाथा है। इस जाति के अतिरिक्त इस गाथा को अन्य जाति नहीं गाती। कोई गाथा या गीत जाति - बंद या जाति सीमित गीत तभी बन सकता है जब वह उसी जाति को सृजित हो, अथवा उस जाति  का सम्बन्ध क्षेत्रान्तर की ऐसी किसी जाति विशेष से रहा हो, जिसमें वह गीत पैदा हुआ है अत: मेरा अनुत्तरित प्रश्न यह है कि क्या देवारों का सम्बन्ध कभी भोज - परमार की धारा नगरी से रहा है ?
       कभी - कभी स्थान परिवर्तन के बाद मनुष्य अपने प्रिय नगर की स्मृति को अमर बनाने के उद्देश्य से पुराने नाम को नए नगर को दे देते थे। यही कारण है कि एक ही नाम के कई गाँव मिलते है। यदि दुर्ग का प्राचीन नाम धारा रहा होगा तो छत्तीसगढ़ के इतिहास में परमारों का नाम भी आना चाहिए। इतिहास बताता है कि छत्तीसगढ़ में परमारों का शासन कभी नहीं रहा। अत: किंवदन्तियों के आधार पर दुर्ग को धारा नगर मान लेना मेरे विचार से सही नहीं है। क्या गाथाकार ऐतिहासिक धारा नगरी और लोकप्रसिद्ध राजा भोज के नामों के उपयोग का लोभ संवरण नहीं कर सका ? प्राचीन काल में राजाओं के यश और अपयश किंवदन्तियों के माध्यम से फैलते रहे है। जो राजा जितना बड़ा होता था, उसके पास उतनी ही अधिक किंवदन्तियाँ बुन ली जाती थी।
        दसमत कैना धार नगर के साथ धौरा नगर भी आता है, जिसके विषय में कहा गया है कि वहाँ से कोई सुन्दरी लौट कर नहीं आती -
धौरा नगर ल जाबे ओ कइना
नइ फिर आबे राज।
       विद्वान शोधकर्ताओं के धारा नगर को दुर्ग नगर के रूप में खोज लिया, किन्तु धौंरा नगर के विषय में मौन है। गाथा के अनुसार धौंरा नगर कोई खतरनाक स्थान है, जहां महिलाएं अपहृत होती है किन्तु दसमत कैना का सत्तीत्व धारा नगर में संकट में पड़ा था। धौरा नगर में नहीं। धारा नगर के चम्पक भाँठा की पहचान दुर्ग - भिलाई के सुपेला भाँठा के रूप में हो चुकी है किन्तु धौंरा नगर के चउपट भाँठा की खोज अभी शेष है -
धारा नगर ले डेरा उसलगे
धौंरा नगर बर जाय।
धौंरा नगर के चउपट भाँठा
डेरा परे नौ लाख।
       धौंरा नगर की भोगोलिक पहचान क्या है ? कहीं धौंरा नगर और धारा नगर एक ही तो नहीं ? जिस तरह से धारा नगर और धौंरा नगर आपस में  गड्ड - मड्ड लगते हैं उसी तरह से चम्पक भाँठा और चउपट भाँठा ध्वनि साम्य होने के कारण संदेह उत्पन्न करते हैं। गाथा को इतिहास सम्मत प्रमाणित करने के लिये धारा नगर और चम्पक भाँठा की निशानदेही ही काफी नहीं है, अपितु चउपट भांठा, धौरा नगर, सुरगीडीह आदि की ताक्रिक ढंग से पहचान आवश्यक है। क्या सुरगीडीह राजनांदगांव जिले का वर्तमान सुरगी ही है ?
       वर्तमान में हमारे सामने दसमत कैना में वर्णित ओड़ार बाँध की भौतिक रूप में उपस्थित है। यद्यपि पिछली सदी के सातवें दशक में इस गाथा को लोक साहित्यिक पहचान मिली, तथापि ओड़ार बाँध के सम्बन्ध में किंवदन्ती पूर्व से ही लोक में प्रसिद्ध रही है। सन् 1925 में स्व. धानुलाल श्रीवास्तव डिप्टी इंस्पेक्टर आफ स्कूल्स, छुईखदान स्टेट की पुस्तक अष्टराज अम्भोज प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने राजनांदगांव स्टेट का वर्णन करते हुए लिखा है - इस स्टेट में एक गाँव है, जो शहर से पश्चिम की ओर 14 मील दूर है। यह एक वृहदाकार एवं अत्यन्त मनोहर तालाब है जो तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इस तालाब के बनने के विषय में यह कहावत प्रसिद्ध है कि दुर्ग के राजा मोहनदेव यहाँ के उड़िया जाति की रानी दसमत ओड़नी के रूप अनूप पर मुग्ध हो गए और हथियार के जोर से उक्त रानी को बलात्कार छीन लेना चाहते थे। इस साध्वी रानी ने अपने सतीत्व रक्षा का कोई उपाय न देख एक ही रात में एक लाख उड़ियों के द्वारा इस तालाब को खुदवाया और वह सब स्त्री - पुरूष  समेत उसी में डूब गई। इस प्रकार अपने पवित्र सतीत्व की रक्षा कर उड़िया जाति का मुखोज्वल कर गई पृ. 83 अष्टराज - अम्भोज के अनुसार ओड़ार बंद दसमत की ससुराल था क्योंकि वह वहां की रानी थी। श्रीमती रेखा देवार की गाथा गायकी में भी ओड़ार बांध को दसमत कैना की ससुराल कहा गया है। राजा महानदेव या मोहनदेव को अपना परिचय देते हुए दसमत कहती है -
भोज नगर में जनम लियेंव
अउ भोजनगर पगुसार।
भोज नगर मोर मइके हावय
ओड़ार बंद ससुराल।
       भोज नगर के राजा भोजदेव भोगदेव की पुत्री दसमत थी। भोजनगर अर्थात राजा भोज का नगर जिसे इतिहास में धारा कहा जाता है यदि वर्तमान दुर्ग को ही धारा मान लेते हैं तो दुर्ग दसमत का मायका हुआ। कहा जाता है कि उड़ीसा में भयंकर अकाल पड़ने के कारण नौ लाख उड़िया परिवारों ने चंपक - भाँठा वर्तमान सुपेला भाँठा में डेरा डाला था, जिसमें दसमत का परिवार भी था। गाथा के अनुसार दसमत का विवाह ओड़ार बंद में हुआ था उड़ीसा के किसी गाँव नगर में नहीं। अष्टराज अम्भोज के अनुसार दसमत ओड़ार बंद की रानी थी। यद्यपि लेखक ने इसे कहावत कहा है। किसी घटना का कहावत और किवदन्ती बनने में काफी वक्त लगता है। जो घटना इतिहास की दृष्टि में नहीं आ पाती, वह भी कहावतों किवदन्तियों में जीवित रहती है। अत: यह कैसे संभव हुआ कि भोज नगर धारा दुर्ग की कन्या विवाह के कारण ओड़ार बंद जाती है, फिर उड़ीसा चली जाती है और अकाल पड़ने के कारण अपने मायके के निकट नौ लाख उड़िया परिवारों के साथ चम्पक भाँठा सुपेला भाठा में डेरा डालती है। उस समय वहां का शासक राजा भोज का लघु भ्राता महानदेव मोहनदेव था, जो अपनी भतीजी के सौदर्य पर आसक्त हो जाता है और दसमत को अपने सतीत्व की रक्षा के लिए पुन: अपनी ससुराल ओड़ार बंद में शरण लेनी पड़ती है। प्रश्र यह है कि ओड़ार बंद की ओड़िया रानी दसमत कहावत के अनुसार को उड़ीसा क्षेत्र क्यों जाना पड़ा ? वह जीविकोपार्जन के लिए तो गई नहीं होगी।
       कलचुरी काल के राजाओं की सूची में दो मोहन हो गए हैं। बाबू रेवाराम ने प्रताप मल्ल देव के बाद के राजाओं की सूची बनाई, उसमें एक मोहन साय है। इसी तरह राजा कल्याण साय की संभवत: चौथी पीढ़ी में सन् 1635 में जगमोहन साय हुए थे। क्या इन दोनों मोहनों में से कोई एक गाथा का पात्र हो सकता है ?
दुर्ग का पूर्व नाम क्या था ? क्या धारा ? अथवा धौरागढ़ को ही धारा समझ लिया गया है ? किन्तु धौरा नगर और धारा नगर का उल्लेख अलग - अलग हुआ है। क्या दुर्ग में कभी ब्राम्हण राजा या सामंत रहे हैं, अथवा गाथाकार ने जगमोहन साय 1635 के वंशज तखत सिंह के राज भक्त्याघाती दीवान बड़गैया ब्राम्हण को गाथा में गूँथ दिया है ?
        लोकगाथाकार गाथा - बीज मिलती जुलती घटना को रंग देते समय स्मृतियों में बंद इतिहास और किंवदन्तियों से भरपूर रंग ग्रहण करते हैं। मेरा विचार है कि इस प्रक्रिया में गाथा - बीज इतिहास से कटता चला जाता है और किंवदन्तियों का प्रभाव शेष रह जाता है। यदि ओड़ार बंद की प्रचलित किंवदन्ती को सत्य घटना माना जाए तो यह ऐतिहासिक शोध का विषय होगा कि राजनांदगांव से 14 मील दूर ओड़ार बंद में उड़िया लोगों का राज्य कब रहा है ? ज्ञात इतिहास से इस बात की पुष्टि नहीं होती कि वहाँ कभी उड़िया राजा थे। क्या ओड़ार बंद इतिहास के अंधेरे में कभी महानगर था ? एक लाख अथवा नौ लाख उड़िया जनों की आबादी गाथाकारा की आसमानी कल्पना ही है क्योंकि अतीत में जन्म दर से अधिक मृत्यु दर रही है। अत: जनसंख्या वृद्धि दर बहुत कम थी। यदि ओड़ार बंद छोटी सी जमींदारी रही होगी तो उसके इतिहास लिखे जाने का प्रश्र ही नहीं उठता किन्तु यह भी सत्य है कि अतीत के बड़े - बड़े नगर आज  छोटे - छोटे गाँवों में और छोटे - छोटे गाँव बड़े - बड़े नगरों में तब्दील हाो चुके हैं। इतिहास में दर्ज 36 गढ़ों में से अनेक गढ़ कस्बे मात्र रह गए हैं। इतिहास के गर्भ में ऐसी उथल पुथल काल परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया है अत: आधिकारिक तौर पर कुछ न कह कर संभावना ही व्यक्त की जा सकती है।
        आज का महानगर दुर्ग अतीत में कैसा रहा होगा, यह कल्पना की बात है। मराठा काल में जब मराठों ने रतनपुर राज्य को हस्तगत कर लिया तब रतनपुर दरबार से देवारों का राज्याश्रय समाप्त हो गया और वह जाति जीविका की तलाश में पूरे छत्तीसगढ़ में बिखर गई। यह घटना सन् 1741 के बाद की है। तब तक दुर्ग नगर छत्तीसगढ़ का एक प्रतिष्ठित गढ़ हो चुका था। मेरा मानना है कि इस काल से पूर्व भी यह गाथा देवार गायकों द्वारा गायी जाती रही होगी। यदि दसमत की गाथा इसी काल में बनती तो गाथा में धारा के स्थान पर दुर्ग का गायन होता दुर्ग पर धारा नाम को थोपने का काम देवार गायकों ने नही किया, अपितु ऐसा लगता है कि पढ़े- लिखे अतीतजीवी लोगों ने ही ऐसा किया है।
        दसमत कैना की गाथा गाने वाली देवार जाति के दो भागों में बंटी है- रतनपुरिया देवार और रायपुरिया देवार। मेरा विचार है की कलचुरियों की एक शाखा रायपुर में राजधानी बनाने के बाद कुछ देवार परिवार रतनपुर से रायपुर में बस गए होंगे और वहां से फिर दुर्ग राजनांदगांव। इस फैलने और बसने- बसाने में भी काफी वर्ष लगे होंगे। राजनांदगांव की बसाहट उस काल में थी या नहीं थी, कह पाना मुश्किल है। संभव है, राजनांदगांव का इलाका सिंगारपुर गढ़ वर्तमान में एक छोटा सा गांव के अन्तर्गत आता रहा हो। राजनांदगांव का इतिहास मराठा काल से शुरू होता है, जिसकी राजधानी पांडादाह खैरागढ़ के निकट एक छोटा सा ग्राम थी। इसी काल मेें देवार गायक ओड़ार बंद की किंवदन्ती से परिचित हुए होंगे। उनकी स्मृति में सुरक्षित गाथा- बीज को ओड़ार बंद की किंवदन्ती से बल मिला होगा और दसमत ओड़निन एक सम्पूर्ण गाथा के रूप में उनकी गायकी में आ गयी होगी। यहां एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, जिसे हम लोक- धर्म और लोक प्रवृत्ति भी कह सकते हैं। किंवदन्ती से निकलकर गाथा में प्रवेश करती हुई दसमत ओड़निन ओड़ार बंद की रानी रहीं। वह मजदूरनी हो गई। राज्य के संरक्षण में रहने वाले देवार कलाकार शास्त्रीय कलाकार नहीं थे, लोक कलाकार ही थे। अत: उनकी कल्पना श्रमजीवी चरित्र के अधिक निकट थी। यहां एक बात और, जब राज्य प्रसार होता है, तब राजनैतिक उथल- पुथल भी बढ़ जाती है। युद्ध, कलह और अशांति राज्य के विस्तार का अनिवार्य हिस्सा होते है। राज्य दरबारों  में कलाशांति काल में पनपती रही है। राजनैतिक उथल- पुथल के बीच न कला का स्थान होता है और न ही कलाकार का। मुझे लगता है इस काल में राज दरबारों की ठंडी छाया इन कलाकारों के सिर से धीरे - धीरे खिसकने लगी थी। लोकगायकों नर्तकों ने ऐसे में निश्चय ही लोक में ही शरण ली होगी। किन्तु हमें स्वीकार करना होगा कि इसमें भी काफी वर्ष लगे होंगे। मानस दशा बदलने में पीढ़ियाँ खप जाती है। लोक की निकटता ने किवदन्ती की रानी को मजदूरनी में दिया होगा।
         प्रसिद्धता के आसपास अनेक किंवदन्तियाँ पैदा हो जाती है। किन्तु किंवदन्तियों को भी प्रसिद्धता के साथ जोड़ कर प्रामाणिक बनाने की कोशिश होती रही है। लोकगाथाओं में यह बात अन्य तरह से आती है। यहाँ गाथा गायकों का उद्देश्य किंवदन्तियों को प्रामाणिक बनाने का नहीं होता, किन्तु रस निष्पत्ति का प्रयोजन ही अधिक होता है। मेरा विचार है कि दसमत कैना के साथ भी यही हुआ होगा। गाथा बीज के साथ पहले लोक - प्रसिद्ध राजा भोज जुड़ा, उसकी प्रसिद्ध नगरी धारा जुड़ी और उसके बाद तत्कालीन हतिहास के प्रसिद्ध गाँव ओड़ार बंद की किंवदन्ती जुड़ी। प्रश्र उठता है, ओड़ार बंद की किंवदन्ती क्यों बनी ?
       उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के लोगों का सम्बन्ध प्राचीन काल से रहा है। दोनों क्षेत्रों की सीमाएँ जुड़ी हुई है। एक क्षेत्र के लोगों का दूसरे क्षेत्र में आना - जाना लगा रहता था। छत्तीसगढ़ के लोगों का उड़ीसा क्षेत्र में धार्मिक लगाव पूर्व से ही रहा है। प्राचीन काल में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में सामूहिक पलायन दुर्भिक्ष के कारण ही होता था। गाथा की भूमिका उड़ीसा में पड़े किसी महा दुर्भिक्ष से ही बनी होगी। उड़ीसा निवासी छत्तीसगढ़ में श्रेष्ठ खनिक के रूप में प्रसिद्धि पा चुके रहे होगे। कुएँ, तालाब, खोदने या बाँध इत्यादि बनाने का काम वे ही सबसे अच्छा करते रहे होगे। ओड़ार बंद का तालाब अथवा बाँध तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इसकी विशालता को देखकर लोगों ने अनुमान लगाया होगा कि इसे ओड़िया लोगों ने ही बनाया है। मेरा विचार है कि ओड़िया जाति से जोड़कर उस तालाब या बांध को ओड़ार बाँध या ओड़ार बंद कहने की प्रथा चल निकली होगी। यह भी हो सकता है कि कभी दुर्भिक्ष के मारे उड़िया लोगों ने पहाड़ियों से घिरे उस स्थान का अपना श्रम प्रदान कर बाँध का रूप दिया होगा। धीरे - धीरे उस तालाब या बाँध के आस पास रानी दसमत - ओड़निन की किंवदन्ती बन गई होगी। मैंने कयास लगाया है, किन्तु इतिहास में ऐसी घटना की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
       दसमत कैना एक सम्पूर्ण लोक गाथा है। लोककाव्य है। इसमें इतिहास का समोने का प्रयास मात्र है। काश, यह गाथा सूफी धारा या प्रेम मार्गी कवियों की दृष्टि में आ गई होती तो यह भी पद्मावत की तरह एक शानदार रंग में होती।
  • पता -' गीतिका ' खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

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