इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

मंगलवार, 25 जून 2013

यही तो समय है




  • कुबेर

यही तो समय है राम कुमार बेहार की सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह है। जिसकी आधी कविताएं बस्तर पर केन्द्रित है। बस्तर छत्तीसगढ़ का गौरव व देश की आदिम जन - जातीय सभ्यता - संस्कृति की विरासत है। अपनी प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों - संपदाओं यथा - सागौन और साल के घने जंगलों खनिजों, अयस्कों से लबालब दुर्गम पर्वत श्रेणियों - घाटियों गुफाओं, झरनों, प्रपातों और अपनी विशिष्ट जीवन शैली के लिए विश्वविख्यात बस्तर आज नक्सल आंदोलन और इस आंदोलन को दबाने के सरकारी प्रयासों के दो पाटों के बीच पिसते हुए अपनी विरासत और अस्तित्व की रक्षा के लिए तड़प रहा है।
बस्तर की बात होगी तो इन बातों के साथ बात होगी वहाँ की जीवन दायिनी नदियों - इंद्रावती, शंखनी डंकनी की। वहां की अनुपम गुफा कुटुमसठ की मोहक जलप्रपात चित्रकोट की और वहाँ के जन - जन की आस्था का प्रतीक दंतेश्वरी माई की।
बस्तर पर अनेक साहित्यकारों ने अपनी लेखनी चलाई है पर इस संग्रह की कविताओं में बस्तर की सभ्यता, संस्कृति प्राकृतिक संसाधनों और सामाजिक व्यवस्थाओं को नष्ट करने पर आतुर बाहा्र शक्तियों, औद्योगिक स्थापनाओं सरकारी एजेंसियों तथा नक्सलियों पर जिस बेबाकी से प्रहार किया गया है, वह स्तुत्य है।
नक्सलियों को ललकारते हुए वे कहते हैं -
बिछाते बारूद, फेंकते बम
हम कंटते, घास - फूस जैसे,
आदिवासी जन
...
सुनो भाई,
बहुत कह चुके तुम आततायी
अहं से नहीं
वयम से चलता संसार
...
अभी भी समय है मेरे भाई
सही राह पर आ जाओ भाई
बस्तर के आदिवासियों का हक छीनने वालों को भी कवि बखूबी पहचानता है और कहता है -
तथाकथित सभ्यों ने
आदिवायिों से जमीन छीनी
...
न्याय की किस धारा से
इसे साबित करोगे ?
कवि आततायी बाजार की निर्मम और कू्रर शक्तियों से भी परिचित है। बाजार के हाथों मानव और मानवी सभ्यता को महज एक उत्पाद या उपभोक्ता बनाये जाने के दुश्चक्रों के प्रति आगाह करते हुए कवि कहता है -
बाजार और साहित्य मं
कश्मकश है, जोर आजमाइश है।
...
हमें कबंध युग से निकलना है,
पेट में धंसे सिर को निकालना है
आदमी को उपभोक्ता बनने से -
बचाना है सांई मेरे।
सीधे - सपाट शब्दों में रची गई यह रचना सीधे ही पाठक के मस्तिष्क पर प्रहार करती है परन्तु बिंबों और प्रतीकों की कमी खटकती भी है।
  • पता - ग्राम - भोढ़िया, जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)   

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