इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 29 जून 2013

प्रेम और अनुराग का लोकस्‍वर : ददरिया




-  पीसी लाल यादव -

        लोक का नाम जब भी हमारे सामने आता है, तब वह हमारी वाणी और हृदय को सरसिक्त कर जाता है। हमारे अंतस में भावात्मक और रसात्मक आनंद की हिलोरें पैदा करता है। और हमारी आँखों के सामने रुपायित होता है सहज, सरल, भोले - भाले, परिश्रमी, झूमते, नाचते - गाते लोगों का समूह, जो अपनी परम्परा, सभ्यता और संस्कृति को अपनी लोक कलाओं के माध्यम से पोषित करता है। यही वह लोक है जो कोयल की तरह गाता है, मोर की तरह नाचता है तथा श्यामल मेघ की तरह सबकी प्यास बुझाता है।
       शिष्ट जन इस लोक को अशिष्ट कहते हैं। शायद शिष्टता का उन्हें ही ज्यादा ज्ञान हो ? पर मुझे लगता है कि किसी को अशिष्ट कह कर हम शिष्ट नहीं हो सकते। शिष्ट का संसार भौतिकता की चकाचौंध से आप्लावित स्वप्निल, काल्पनिक और जीवन के सत्य से दूर, बहुत दूर होता है। वहाँ केवल दिखावा ही दिखावा और छलावा ही छलावा होता है। न शांति होती है न प्रेम। केवल आपाधापी, तनाव और कुंठा का बोल बाला होता है। भला ऐसे में क्या तथाकथित शिष्ट सुखी हो सकता है ? कदापि नहीं। लोक का अपना सहज, सरल परन्तु सुखद और यथार्थ परक संसार होता है। भले ही लोक सुविधाओं से वंचित होता है, पर प्रेम, शांति, सद्भाव और साहचर्य से परिपूरित रहता है। इसकी अनुभूति तो लोक का सानिध्य प्राप्त कर ही किया जा सकता है। इसकी प्रतीति तो इनके साहित्य का अध्ययन और मनन कर की किया जा सकता है। लोक का साहित्य लोक साहित्य कहलाता है। लोक साहित्य लोक की निधि है। इस निधि में है लोक - गीतों के हीरे - मोती, लोक कथाओं और लोक गाथाओं के नीलम, लोकोक्तियों और पहेलियों के पन्ना जवाहरात। यदि संपत्ति शिष्टता का सूचक है, तो भला इतनी सारी संपत्तियों का मालिक लोक अशिष्ट कैसे हो सकता है ? हाँ निरीहता, अभावग्रस्त, गरीबी, सहजता और सरलता अशिष्टता का बोधक है तो लोक जरुर अशिष्ट है, असभ्य है पर अपनी परंपरा और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में इनकी यह अशिष्टता व असभ्यता कला - संस्कृति व प्रेम और प्रकृति के मामले में शिष्ट से भी विशिष्ट है। लोक की यही विशिष्टता लोक जीवन का माधुर्य है। लोक जीवन तो सदानीरा नदी की तरह आदिम काल से लोक मंगल के हित प्रवाहित हो रहा है। यदि कोई इस नदी से दूर रहकर प्यासा है तो गलती नदी की नहीं उस प्यासे की है, जो शिष्ट का आचरण कर दंभ के कारण नदी के पास जाने में भी अपनी तौहीन समझता है। नदी का जल कंठ की प्यास बुझाता है और लोक गीत कंठ से निसृत हो श्रवणेन्द्रिय से प्रवेश कर मन और आत्मा की प्यास बुझाते हैं।
       लोक गीत जहाँ जीवन में रस घोलते हैं, वहीं श्रम की क्लान्ति को भी मिटाते हैं। लोक गीत लोक के लिए ऊर्जा और प्रेरणा शक्ति का कार्य करते हैं। लोक में लोक गीतों की महत्ता कभी कम हुई न होगी। लोक गीतों के उद्गम और अंत के विषय में डॉ. श्याम परमार ने लिखा है - लोक गीतों के प्रारंभ के प्रति एक संभावना हमारे पास है, पर उसके अंत की कोई कल्पना नहीं। यह वह धारा है, जिसके अनेक छोटी - मोटी धाराओं ने मिलकर उसे सागर की तरह गंभीर बना दिया है। सदियों के घातो - प्रतिघातों ने आश्रय पाया है। मन की विभिन्न परिस्थितियों ने उनमें अपने मन के ताने - बाने बुने हैं। स्त्री - पुरुष ने थककर इसके माधुर्य में अपनी थकान मिटाई है। इसकी ध्वनि में बालक सोये है। जवानों में प्रेम की मस्ती आई है, बूढ़ों ने मन बहलाए हैं। वैरागियोंं ने उपदेशों का पान कराया है। विरही युवकों ने मन की कसक मिटाई है। किसानों ने अपने बड़े - बड़े खेत जोते हैं, मजदूरों ने विशाल भवनों पर पत्थर चढ़ाए हैं और मौजियों ने चुटकुले छोड़ें है। कहने का आशय यह कि लोक गीत जीवन को स्पंदित करते हैं। लोक जीवन के सुख - दुख को अपने में समेट कर लोक में आश्रय पाते हैं। लोक के हर वर्ग और जीवन के हर रंग के चितेरे हैं लोकगीत।
       छत्तीसगढ़ तो लोक गीतों का कुबेर है। छत्तीसगढ़ के मेहनतकश इन्सानों की धरती है। किसान और बसुंदरा की धरती। यहाँ न जंगल - जमीन की कमी है न डोली - डाँगर की और न ही जाँगर की। हरे - भरे खेत खार, जंगल - पहार, धन - धान्य से भरे कोठार जैसे इस धरती के श्रृंगार है। इस रत्नगर्भा धरती की कला और संस्कृति भी ठीक इन्द्र - धनुष की तरह बहुरंगी है। इसकी अलौकिक आभा लोक जीवन को अवलोकित करती है। यहां लोक गीतों का अक्षय भंडार है। इस अक्षय भंडार का अनमोल हीरा है ददरिया।
       ददरिया श्रम की साधना और प्रकृति की आराधना में रत किसानों और श्रमिकों का गीत है। यह प्रेम और अनुराग की लोक अभिव्यक्ति है। लोक साहित्य के विद्वानों का कथन है कि दादर यानी ऊंचा स्थान, जंगल - पहाड़ में गाए जाने के कारण इसका नाम ददरिया पड़ा। यदि ददरिया के नामकरण के पक्ष में इस तथ्य को सही माना जाय तो यह भी सच है कि ददरिया केवल ऊँचे स्थानों अर्थात जंगलों - पहाड़ों में ही नहीं गाया जाता। यह मैदानी इलाकों में, सपाट खेतों में भी गाया जाता है। कुछ विद्वान दादरा से शब्द - साम्यता के कारण दादरा गीत ताल से इसके नामकरण का सूत्र तलाशते हैं। यह भी सत्य है कि ददरिया में वाक्य का प्रयोग नहीं होता। तब ताल के नाम पर नामकरण का सवाल ही नहीं उठता। विद्वानों ने ददरिया के चार भेदों का भी निरुपण किया है। ठाढ़ ददरिया, सामान्य ददरिया, साल्हो और गढहा ददरिया। बैलगाड़ी हाँकते गाड़ीवानों द्वारा गाए जाने वाला ददरिया गढ़हा ददरिया कहलाता है। संभवत: इसी आधार पर साल वनों में गाए जाने वाले ददरिया को साल्हो कहा गया हो ? तो क्या नांगर जोतते हलवाए द्वारा गाए जाने वाले ददरिया को नंगरिहा ददरिया कहा जायेगा ? इस प्रकार ददरिया का भेद उचित नहीं जँचता। जो भी हो, पर ददरिया है गीतों की रानी। ठाढ़ ददरिया और सामान्य ददरिया को खेतों में काम करते ग्रामीणों से सुना जा सकता है। इसकी स्वर लहरी बड़ी मीठी होती है।
       पारंपरिक रुप में ददरिया खेतों में फसलों की निंदाई कटाई करते, जंगल - पहाड़ में श्रम में संलग्र लोगों द्वारा गाया जाता है। यह और बात है कि अब मंच पर ददरिया वाद्यों के संगत में गाया जाता है। लड़के - लड़कियों को नचाया जाता है। इसलिए शहरी परिवेश में जीने वाले लोक कला के मर्मज्ञ ददरिया को लोकगीत न कहकर लोक नृत्य कहते हैं। पर यह कला का विकास नहीं है। यह पारंपरिकता के साथ खिलवाड़ है। उसके मूल रुप को विकृत करने का प्रयास है। मेरी दृष्टि में ऐसा कोई भी प्रयास न लोक कला के हित में है न ही लोक कलाकार के।
       ददरिया का सामूहिक स्वर सुनकर जिसने उसका रस पान किया होगा, वही व्यक्त कर सकता है ददरिया के आनंद और अनुभूति को। इसे अकेले - दुकेले भी गाया जाता है, सवाल - जवाब के रुप में। साथ देने वाला हो तो माधुर्य द्विगुणित हो जाता है -
बटकी म बासी, अऊ चुटकी म नून।
में गावत हंव ददरिया, ते कान देके सुन।
       ददरिया मुक्तक श्रेणी का लोक काव्य है। यह दोहे की शैली में होता है। इसका प्रभाव दोहे की ही तरह मर्मस्पर्शी होता है। ददरिया की श्रृंखला बड़ी लंबी होती है, पर ये परस्पर भिन्न होते हैं। इनका परस्पर संबंध विच्छेदित रहता है। सतसई के दोहे के बारें में जिस प्रकार कहा जाता है -
सतसईया के दोहरे, ज्यों नाविक की तीर,
देखन में छोटे लगे, घाव करत गंभीर।
       निष्ठुर, निर्दयी और निर्मोही व्यक्ति को भी ददरिया मोम की तरह पिघला देता है। पत्थर में भी प्रसून खिला देता है। लोककंठ में गूँजने वाले ददरिया का माधुर्य मंदिर में गूंजती घंटियों की तरह मन को शांति देता है। काम करते - करते जब काया थकने लगती है तब ददरिया की तान थकान मिटाती है। या यूं भी कहा जा सकता है कि ददरिया गाते - गाते काम करने से थकान आती ही नहीं। बल्कि यह शरीर में ऊर्जा और मस्तिष्क में चेतना का संचार करता है।
       ददरिया में विषयों की विविधता है पर मूलत: विषय श्रंृगार है। इसमें कृषि संस्कृति और आदिवासी संस्कृति पूर्णत: प्रतिबिम्बित होती है। क्योंकि यही लोक जीवन के मूलाधार है। लोक व्यवहार के शब्द ददरिया के श्रृंगार हैं। फलस्वरुप ददरिया की पंक्तियों के भाव का हृदय में अमिट छाप पड़ता है -
आमा ल टोरे खाहूँच कहिके।
तैं दगा दिए मोला, आहूँच कहिके।।
       प्रेम और अनुराग इसका मूल स्वर है। प्रेम तो जीवन का तार है। श्रृंगार है। प्रेम के बिना सारा संसार निस्सार है। युवा हृदय में जब प्रेम की कोंपले फूटती है तो वह किसी का प्रेम पाकर पल्लवित होती है। ददरिया प्रेमी हृदय की अभिव्यंजना है। ददरिया में प्रेम और अनुराग का ही वर्चस्व होता है। प्रेम गंगा जल की तरह पवित्र होता है। प्रेमी हृदय जिस छबि को अपनी आँखों में बैठा लेता है, वही उसका सर्वस्व होता है। उस प्रेम मूर्ति को वह अपनी कोमल भावनाएं पुष्प की तरह अर्पित करता है। मरने पर ही प्रीत छूटने की बात कहता है -
माटी के मरकी, फोरे म फूट ही।
तोर - मोर पिरित, मरे म छूटही।।
       लोक मन का यह अनुराग, लोक मन की यह प्रेमाभिव्यक्ति और विश्वास धरती की तरह विस्तृत, आकाश की तरह ऊँचा और सागर की तरह गहरा है। भला कोई प्रेम की ऊंचाई और गहराई को नाप सकता है? प्रेमी हृदय की ललक और प्रिय की तलाश को कितनी सार्थक करती है, ददरिया की ये पंक्तियाँ -
बागे - बगीचा दिखे ल हरियर।
झुलुप वाला नई दिखे, बदे हँव नरियर।।
       लोक जीवन के क्रिया व्यवहार का यथार्थ भी प्रस्तुत करता है ददरिया। जब मुद्रा का प्रचलन नहीं था तब लोग वस्तु - विनिमय द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे तथा परस्पर वस्तुओं को अदल - बदल कर अपने रोजमर्रा की चीजों की पूर्ति करते थे। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में अभी भी छिटपुट यह प्रथा देखने में आती है। जैसे रऊताईन कोदो या धान के बदले मही देती है। गाँवों में लोग बबूल बीच के बदले नमक लेते हैं -
ले जा लान दे जँवारा,कोदो के मिरचा ओ,
ले जा लान देबे हो ...
धाने रे लुवे, गिरे ल कंसी।
भगवान के मंदिर में बाजथे बंसी।।
नवा रे मंदिर, कलस नइ हे।
दू दिन के अवईया, दरस नई हे।।
       ददरिया के शाब्दिक सौन्दर्य, अर्थ गांभीर्य और इसके स्वर माधुर्य के कारण इसे गीतों की रानी कहा जाता है। यह सम्मान इसे इसकी सहजता, सरलता और सरसता के कारण भी मिला है। ददरिया वह गीत है जिसके रचनाकार का पता नहीं है। यह वाचिक परंपरा द्वारा एक कंठ से दूसरे कंठ तक पहुंचता है। कुछ छूटता है, कुछ जुड़ता है। इस छूटने और जुड़ने के बाद भी यह कभी निष्प्रभावी नहीं हुआ। इसका तेज और लालित्य बढ़ता ही गया। लोक गायक जो देखता है, उसे ही गीत के रुप में गढ़ कर गाता है। और समूह के कंठ में जो बस जाता है, वही लोक गीत कहलाता है। ददरिया लोक को भाने वाला गीत है -
संझा के बेरा, तरोई फूले।
तोर झूल - झूल रेंगना, तोंही ल खुले।।
बगरी कोदई, नदी म धोई ले।
तोर आगे लेवईहा, गली म रोई ले।
तिली के तेल रिकोयेंव बिल म।
रोई - रोई समझायेंव,नई धरे दिल म।।
       ददरिया की कड़ियाँ एक दूसरे के साथ पिरोई जाती है। ददरिया की धुने अलग - अलग होती है। पर एक  ही कड़ी को भिन्न - भिन्न धुनों में भी गाई जा सकती है। ददरिया की यह भी विशेषता है। ददरिया गाने वाले चाहे वह स्त्री हो या पुरुष वे इतने कुशल होते हैं कि अपनी कल्पना शक्ति से तत्काल ददरिया की पंक्तियाँ जोड़ लेते हैं। यदि इन्हें आशु कवि कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी परन्तु इस सृजन में उनका कोई व्यक्तिगत प्रभाव नहीं होता। उनकी अभिव्यक्ति लोकमय हो जाती है। लोक तो निस्पृह और निराभिमानी होता है। वह केवल अपनी स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ता है तथा लोकमंगल का अर्थ गढ़ता है।
       ददरिया की एक सुनिश्चित गायन शैली नहीं है। भिन्न - भिन्न धुनों, भिन्न - भिन्न रागों में एक लोक कंठ से फूटता है। राग का आशय यहाँ शास्त्रीय रागों से कतई नहीं है। लोक में सुर को राग कहा जाता है। शास्त्रीय राग में बंधन होता है। लोक को बंधन स्वीकार्य नहीं। वह तो फूल की खुशबू की मानिंद है जो सब को सुवासित करता है। ददरिया की कड़ियों को जोड़ने के लिए घोर का प्रयोग किया जाता है, जिसे हम टेक भी कहते है। ये पंक्तियाँ ददरिया की कड़ियो के बीच - बीच में दुहराई जाती है :-
हवा ले ले रे, पानी पी ले रे गोला
नई साग रांधे, मही म कुुंदरु।
गाड़ी भागथे दबोल म,
नई बाजय घुंघरु।।
हवा ले ले .....
रस्ता ल रेंगे, हलाय कोहनी,
तोर आँखी म सलोनी,
खोपा म मोहनी।।
हवा ले ले .....
कांचा लिमऊ के रे, रस चुचवाय
भौजी बिना देवर के, मन कचुवाय।
हवा ले ले .....
       ददरिया में धुनों की विविधिता के कारण इसके गायन में किसी प्रकार की दुरुहता नहीं आती बल्कि इस विविधता के कारण इसकी एकरसता समाप्त होती है। अक्सर गीतों की एकरसता श्रोता के मन में ऊब पैदा करती है। ददरिया से तो ऊबने का सवाल ही नहीं है -
ये भगाबो पल्ला का गा,जाम झिरिया में
हवा में कलगी डोले, एक पेड़ आमा, झऊर करे।
मया वाली दोसदारी बर दउड़ करे।।
सायकिल चलाए, हेंडिल धरि के।
तोला बइठे ल बलायेंव,कंडिल धरि के।।
बाँस के लाठी, चुने ल भइगे।
तोर खातिर मयारु, गुने ल भइगे।।
नांगर के मुठिया, दबाय नहीं।
तोर दिए खुरहोरी, चबाय नहीं।।
नंवा रे हँड़िया, भरे ल मड़िया।
निकलत नई बने, रांधत हड़िया।।
       ददरिया सवाल - जवाब के रुप में अभिव्यक्त होता है। एक समूह सवाल करता है, दूसरा समूह जवाब देता है। या ऐसा भी कह सकते हैं कि दो प्रेमी हृदय परस्पर सवाल - जवाब करते हैं। ददरिया हृदय में अंकुरित प्रेम को अपनी स्वर लहरी से सींचता है। उसे अनुराग का आश्रय देता है :-
ये दे संझा के बेरा, बगइचा में डेरा
तोला कोन बन खोजवं रे ...
ये दे संझा के बेरा .....
गहूँ के रोटी, जरोई डारे।।
मोला बोली बचन में हरोई डारे।।
बासी ल खाए, अढ़ई कौरा।
तोला बइठे ल बलाएंव बढ़ई चौरा।।
चंदा रे उवे सुरुज लाली ओ।
बखरी ले ढेला मारे पिरित वाली ओ।।
       ददरिया छोटे पद का गीत है। थोड़ी शब्द सीमा में बहुत अधिक कह देना लोक गीतों की विशेषता हैं। यह सामर्थ्य ददरिया के पास अधिक है। लोक जिव्हा में रचे - बसे शब्द हीरे - मोती की तरह शोभा पाते हैं। इसमें मात्राओं की कमी - बेशी को गायक अपनी लयात्मकता से पूर्ण कर लेता है। शब्दों की कमी पड़ने पर संगी, संगवारी, दोस, मयारु, जहुरिया आदि शब्द जोड़ लिए जाते हैं। यह उनकी गायकी का कमाल होता है। लोक  गायक तो वैसे भी स्वर - पूर्ति में कुशल व परिपक्व होते हैं। ददरिया गायन में कभी - कभी स्वर संतुलन के लिए अतिरिक्त पंक्ति भी जोड़ी जाती है :-
फूल रे फले, धनई के रवार।
कोन गलियन में होब,
मोर जीव के अधार
तुक - तुक के गोटी मारे,
किंजर के आना
खाल्हे बाहरा म रे ....
खाए कलिंदर रे, फोकला बघार।
इही गलियन में आबे,
मोर जीव के अधार
तुक - तुक गोटी मारे, गिंजर के आना
खाल्हे बाहरा म रे ....
घर के निकलती रे, कुरिया के टोंक
मैं बोल न नई तो पायेंव,
रे अदमी के झोप।।
ओली के हरदी, कुचर जल्दी।
देरी होगे पतरेंगी, निकल जल्दी।।
       लोक की अपनी मर्यादा हैं। अपनी सीमा हैं। लोक मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता। ददरिया गाँव की गलियों में नहीं गाया जाता। इसे खेत खार, जंगल पहार में ही गाया जाता है। वहाँ भी लोक समूह की उपस्थिति इसे मर्यादित रखती है। प्रेम और अनुराग का यह गीत यदा - कदा अश्लीलता को छूने का प्रयास भी करता है। यह प्रयास कुछ हम उम्र मित्रों के हास - परिहास के रुप में होता है, सार्वजनिक नहीं। समूह इस प्रयास को अस्वीकार करता है। नदी यदि तट का उलंघन करे तो वह अहित कर ही होता है।
करे मुखारी, जामुन डारा ग
बइठे ल आबे तै, बइहा, हमर पारा।
       ददरिया में बही बइहा का संबोधन प्रगाढ़ प्रेम को प्रदर्शित करता है। बही अर्थात पगली, बईहा माने पागल। प्रेम में तो आदमी पागल ही होता है। जो अतिप्रिय है उसे ही पागल कहने का अधिकार दिया है प्रेम ने। भला कोई दूसरा पागल कह सकता है।
चांदी के डबिया, सोने के ढकना।
नानपन के संगवारी, देवथे सपना।।
आघू नंगरिहा, बइला हे टिकला।
डोली म उतरहूं, हो जही चिखला।।
       ददरिया की पंक्ति - पंक्ति कानों को सुकुन देती है और आत्मा को तप्ति। यूं तो ददरिया में प्रेम का रंग गाढ़ा है। ददरिया में प्रेम के दोनों रुप संयोग और वियोग का समन्वय मिलता है। इसके साथ ही ग्रामीण रीति - नीति, धार्मिक आस्था और लोक विश्वास तथा समकालीन परिस्थितियाँ भी इसमें आकर लेती है :-
सियाराम भजले संगी
चरदिनिया जिनगी ग ....
सिया राम भज ले
चारे रे खुरा के चारे पाटी।
कंचन तोर काया, हो जही माटी।।
       इधर छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने भी ददरिया छंद में गीत लिखना प्रारंभ किया है। ये गीत लोकप्रिय भी हुए हैं। पर पारंपरिक ददरिया का सौंदर्य और माधुर्य उनमें भी नहीं आ पाया है। शायद इसका कारण मौलिक प्रयास हो। व्यक्ति विशेष की छाप हों। जबकि दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि इसमें ग्रामीण जीवन के शब्दों का अभाव रहता है। इसलिए लोकमन में ये गीत गहरे उतर नहीं पाते। छत्तीसगढ़ के कुछ गायक कलाकारों व रचनाकारों ने नाम लिप्सा के कारण ददरिया को अपनी रचना बताकर रचनाकार के रुप में अपना नाम जोड़ने का कुत्सित प्रयास किया है। या पंक्तियों को इधर - उधर कर इसके मूल स्वरुप को क्षति पहुंचाई है। जिन पारंपरिक ददरियों को एक पैसठ वर्षीय लोक कलाकार अपनी किशोरावस्था से गाते आ रहा हैं, उन गीतों के साथ तीस वर्षीय कलाकार रचनाकार के रुप में अपना नाम जोड़ता है। यह कितनी हास्यास्पद स्थिति है। पारंपरिक गीतों को पारंपरिक ही रहने दें तो क्या हर्ज हैं ? पारंपरिक गीतों को अपनी मौलिक रचना बताना अच्छी बात नहीं है। नाम ही चाहिए तो नाम के लिए अच्छे काम की जरुरत होती है।
       कुल मिलाकर ददरिया मेहनतकश लोगों के हृदय की अभिव्यक्ति है। पसीने की बूंदों से सिंचित लोक सर्जना है। प्रेमातुर मन का मादक स्वर है। लोक कंठ से झरता निर्झर है। जिसकी धारा कभी न क्षीण होगी न मलिन। ददरिया लोक मानस की शक्ति हैं इसमे प्रेम और अनअुराग की अभिव्यक्ति है। लोक की अभिव्यक्ति का यह सिलसिला अनवरत जारी रहे। लोक गीतों की रानी ददरिया का स्वरुप लोक हाथों से सजता रहे, संवरता रहे। यह लोक स्वर अतृप्त आत्मा को संतृप्त करता रहे। लोक गीतों का लोकमंगल स्वरुप बना रहें। यही मंगल कामना है -
छोटे हे केरी, बड़े हे केरा ।
राम राम ले, जाये के बेरा।।
जुन्ना लुगरा, कथरी के खिलना।
जिनगी रही त फेर होही मिलना।।
पता - '' साहित्‍य कुटीर ''
गण्डई पण्डरिया,
जिला - राजनांदगांव [छ.ग.]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें