इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

मन मा गजब उमंग रे

-  मुकुन्द कौशल -

सबो कती पिरथी मा बगरे, हरियर - हरियर रंग रे।
पानी के बरसे ले जागिस, मन मा गजब उमंग रे।।
खनन् - खनन् - खन् चूरी बाजै
बोलै मन के बात
सरर - सरर अँचरा उड़ि जावै
पुरवा के लहरात
घेरी - बेरी केंस बगर के करथे मोला तंग रे।
पानी के बरसे ले जागिस मन मा गजब उमंग रे।।
एक्के दारी देख के कइसन
जादू कस कर डारिस
आँखी के ढेंकी मा जिउ ला
चाँउर कस छर डारिस
ये अलकरहा पीरा पा के, टूटै जम्मो अंग रे।
पानी के बरसे ले जागिस, मन मा गजब उमंग रे।।
सोवत - जागत उन्कर सपना
देखत रहिथे आँखी
उनला पा के हमरो जिउरा
होगै सूवा पाँखी
मन करथे पानी मा फींजौ, पतरेंगा के संग रे।
पानी के बरसे ले जागिस, मन मा गजब उमंग रे।।

  • पता - एम - 516, पद्नाभपुर, दुर्ग छ.ग. - 491001  

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