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बुधवार, 26 जून 2013

गुलशन की मैं ...



डां. जीवन यदु

गुलशन की मैं सुनाऊं - एक दर्द की कहानी।
चिड़ियों की देखता हूं, आँखों में आज पानी।
कुछ लोग कह रहे हैं - आयी बहार है।
गुलशन की पर कमीज क्यों तार - तार है ?

कैसी है यह बहार कि कॉटों पे है जवानी।
कुछ लोग इस चमन के पौधे जला रहे।
हर फूल हर कली पर कैची चला रहे।
सूरजमुखी इधर, उधर जलती है रातरानी।
मासूम तितलियों के हैं पर कटे हुए।
खेमों में नासमझ सभी भौंरे बंटे हुए।

किस मुंह से गाये बुलबुल - यह शाम है सुहानी।
डूबा हुआ है माली कुछ गहरी नींद में।
जागेगा यह दिवाली या अगली ईद में।
सपने की बात है अभी पौधों को खाद - पानी।
सहमी हुई हवा है, झुकता सा हर तना।
पत्ते है चुप कि जैसे हो बोलना मना।

चिड़ियों को खा ना जाये चिड़ियों की बेजुबानी।
मेंहदी की बाढ़ थी जहाँ, साँपों का राज है।
खुशबू को पीना विष पड़े, कैसा रिवाज है
माटी की खुशबु तो बचे, कुछ तो बचे निशानी।
  • पता - '' गीतिका ''  दाऊ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव [ छत्तीसगढ़ ]

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