इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 जून 2013

गुलशन की मैं ...



डां. जीवन यदु

गुलशन की मैं सुनाऊं - एक दर्द की कहानी।
चिड़ियों की देखता हूं, आँखों में आज पानी।
कुछ लोग कह रहे हैं - आयी बहार है।
गुलशन की पर कमीज क्यों तार - तार है ?

कैसी है यह बहार कि कॉटों पे है जवानी।
कुछ लोग इस चमन के पौधे जला रहे।
हर फूल हर कली पर कैची चला रहे।
सूरजमुखी इधर, उधर जलती है रातरानी।
मासूम तितलियों के हैं पर कटे हुए।
खेमों में नासमझ सभी भौंरे बंटे हुए।

किस मुंह से गाये बुलबुल - यह शाम है सुहानी।
डूबा हुआ है माली कुछ गहरी नींद में।
जागेगा यह दिवाली या अगली ईद में।
सपने की बात है अभी पौधों को खाद - पानी।
सहमी हुई हवा है, झुकता सा हर तना।
पत्ते है चुप कि जैसे हो बोलना मना।

चिड़ियों को खा ना जाये चिड़ियों की बेजुबानी।
मेंहदी की बाढ़ थी जहाँ, साँपों का राज है।
खुशबू को पीना विष पड़े, कैसा रिवाज है
माटी की खुशबु तो बचे, कुछ तो बचे निशानी।
  • पता - '' गीतिका ''  दाऊ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव [ छत्तीसगढ़ ]

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