इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 27 जून 2013

दर्शन - प्रदर्शन




- रामसहाय वर्मा -

पता नहीं आजकल लोग दर्शन की जगह प्रदर्शन में ज्यादा विश्वास क्यों करते है? अथवा यह समझ लीजिये कि किसी चीज के दर्शन को नजरंदाज कर प्रदर्शन को ज्यादा तरजीह देते हंै। वास्तविकता का दर्शन कर लेने के पश्चात भी कुछ लोग हमेशा अपने प्रदर्शन के द्वारा दर्शन की हकीकत को नजरंदाज करते रहते हैं। भगवान के मात्र दर्शन करने में वह आत्मीय आनंद नही मिलता जितना आत्मीय आनंद भगवान के दर्शन का प्रदर्शन करने में मिलता है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी इस दर्शन एवं प्रदर्शन के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है।
   आजकल लोगों के पास इतना टाइम नहीं है कि वे भगवान को नियमित याद कर सकें लेकिन साल- दो साल में जब भी उन्हें फुरसत मिलती है अथवा उन्हें जब कभी अपना मतलब सिद्ध करना होता है तो वे अपने घरों अथवा अन्य प्रतिष्ठानों की छतों पर लाउडस्पीकर के बड़े- बड़े चौंगे स्थापित कर पूरे जोर शोर से पुकार कर भगवान को इसलिये परेशान करते हैं जिससे वह उनकी जल्दी सुन ले। ऊपरवाला भी सोचता होगा कि मै कहां फंस गया, इस ध्वनि प्रदूषण से तो मेरी कुर्सी ही डगमगा रही है। पर याचक को भगवान की परेशानी से कोई मतलब नहीं। यद्यपि इस क्रिया से दो फायदे होते हैं- एक तो पापी और महाअधर्मी व्यक्ति को भी लोग महाधर्मी समझने लगते है। दूसरे इस कान फोडू आवाज से वे अपने पड़ौसियों से भी बदला ले लेते है। क्योंकि पड़ौसियों के दुखी होने में उन्हें बड़ा सुख होता प्राप्त होता है। मंदिर- मस्जिद में तैनात ऊपर वाले के एजेंट पुजारी, मुल्ला पादरी आदि भी सुबह शाम लोगों को धार्मिक प्रवचन इसलिए जबरन सुनवाते हैं ताकि जो नहीं भी चाहता हो उसके खाते में भी कुछ पुण्य जमा हो जाये। उन्होंने उपासना स्थल के शिखरों पर लाउडस्पीकर इसीलिये स्थापित कर लिये हैं कि श्रोता में यदि थोड़ी भी शर्म बची होगी तो वह दौड़ा चला आएगा। श्रोता भी सोचेगा कि भयंकर शोर के कारण घर में मरने की अपेक्षा भगवान के दर पर दम तोड़ना उचित होगा। क्योंकि लोगों कि मान्यता है कि जिस व्यक्ति की दम उपासना स्थल पर निकलती है उसे स्वर्ग जाने में भगवान भी नहीं रोक पाता।
 धार्मिक संस्थानों एवं अन्य स्थलो पर भगवान को जोर शोर से याद करने के पीछे धारणा है कि उनके शोर- शराबे की आवाज जहां तक और जिन लोगो के कानो तक  पहुंचेगी उनकी शिराओं में तत्काल धार्मिक रक्त बहने लगेगा। जो शोर- शराबा कर रहे है उनका तो स्वर्ग का टिकट पक्का ही है साथ ही साथ उन लोगो को भी स्वर्ग ले जाने की वे भरपूर कोशिश कर रहे हैं जिनके कानो में वे ईशभक्ति उड़ेल रहे है। वे सिर्फ पड़ौसियों को ही नही बल्कि पूरी बस्ती को भी भजन कीर्तन से रात भर तड़पा-तड़पा कर पुण्य दिलाते हैं। इससे ज्यादा परोपकार का प्रदर्शन आपको अन्यंत्र कहीं भी नहीं मिल सकता। वैसे श्रद्धालु पुरूष घर के एकांत में बैठ कर भी भगवान को याद कर सकते हैं लेकिन इससे भगवान के दर्शन तो हो सकते है किन्तु उन की नकली भक्ति का प्रदर्शन नहीं हो सकता। बड़े- बड़े लाउडस्पीकर की ऊंची आवाज से लोगों के गले में जब धार्मिक घुटटी जबरन उंड़ेली जाती है तब श्रोतागण को स्वीकार करना ही पड़ता है वाह।़ कितना बड़ा श्रद्धालु व धर्मात्मा है। बेचारा अपने साथ पूरी बस्ती को स्वर्ग ले जा कर ही दम लेगा। पुलिस भी तो इसी तर्ज निरपराधी को अधमरा कर उस से जुर्म कबूल करवा लेती है।
   इस प्रकार के आयोजनो से लाभ ही लाभ हैं। भगवान के प्रति इस प्रकार की अनूठी निष्ठा के प्रदर्शन से कतिपय नास्तिको को यदि थोड़ा बहुत कष्ट पहुंचता भी है तो उस कष्ट के मुआवजे के रूप में आयोजक प्रसाद भी तो बांटते है। कुछ ऐसे श्रद्धालु भी होते है जो पूरी रात अपनी नींद खराब कर कीर्तन स्थल पर डटे रहते है। यद्यपि उनकी एक आंख कीर्तन की तरफ तो दूसरी आंख प्रसाद की तरफ लगी रहती है। एक दो बार तो वे सब की आंख बचाकर रसोई भंडार के चक्कर भी लगा आते है। लेकिन वो लोग क्या करें? जिन को न तो प्रसाद में दिलचस्पी है और न स्वर्ग जाने की जल्दी है फिर भी वे बेचारे रात भर कष्ट सहते रहते है। वे बेचारे आयोजको से कैसे कहे? कि हे स्वर्ग के ठेकादारो, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों पर थोड़ा रहम खाओ। भगवान को धीरे से ही पुकार लो। क्योंकि उन पर नास्तिक और अधर्मी होने का लांछन लग सकता हैं।
    मै दो प्रकार से बड़ा भाग्यशाली हूं। एक तो मै एक मंदिर के बिल्कुल पास में रहता हूं जहां भगवान के भजन कीर्तन सुन- सुन कर मेरी श्रवणेन्द्रियां इतनी ओवर फलो हो रही है कि मुझे अब कीर्तन के अलावा और कुछ सुनाई नहीं देता। इस कारण मै यह दावे के साथ कह सकतस हूं कि स्वर्ग में मेरी सीट पक्की हो चुकी है। यदि यमराज भी मेरी टांग पकड़कर नरक की ओर खींचे तो भी वे मुझे स्वर्ग जाने से नहीं रोक सकेंगे। कान तो चले ही गये हैं, बस जान जाना बाकी है। दूसरे मेरे घर से थोड़ी दूरी पर शिव जी की इतनी विशाल प्रतिमा है कि शिव जी भी यदि उस प्रतिमा को स्वयं देख  लेवें तो मूर्छित हो कर गिर पड़े। हो सकता है कि उस प्रतिमा को देखकर नंदी एवं पार्वती दोनो ही अपनी सेवा से त्यागपत्र देकर शिव जी से किनारा कर जायें। उस विशाल प्रतिमा के दूर से दर्शनों का मुझे भी सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। हां, तो मैं अपने पड़ौसी के मंदिर की बात कर रहा था। यहां भी शिखर पर टंगे लाउडस्पीकर के माध्यम से रोज खूब शोर शराबा होता रहता है। कभी- कभी खीज कर इच्छा होती है कि मंदिर के शिखर तथा गले में रस्सी बांध कर लटक जाऊं। लेकिन शिखर तक पहुंचूं कैसे?
    एक दिन इस मंदिर के पुजारी काफी ऊंची आवाज में लाउड स्पीकर बजा रहे थे। लाउडस्पीकर के भयंकर शोरगुल से मेरे पड़ौसी में बिमार चल रहें शर्मा जी बड़े बेहाल थे। लेकिन शर्मा जी के सुपुत्र उक्त लाउडस्पीकर को इसलिये बंद नहीं करवाना चाह रहे थे कि पिता जी के संयोगवश यदि इस बीच दिवंगत हो गये तो भगवान के भजन लगातार सुनने के कारण वे सीधे स्वर्ग पहुंचेंगे। शर्मा जी की बेचैनी जब मुझसे न देखी गई तो मैने मंदिर जाकर पुजारी से निवेदन किया- पंडित जी, इस भांैपू की आवाज को थोड़ा कम कर देंगे तो आपकी महान कृपा होगी। बीमार शर्मा जी को बहुत कष्ट हो रहा है। मंदिर के पुजारी मुंह टेड़ा कर के बोले- वर्मा बाबू.... आपको पता नहीं, इस भौंपू के माध्यम से हम अमृत वर्षा कर रहे हैं। सब की अलायें बलायें, दुख बीमारी एवं कष्ट बाधायें सभी दूर कर रहें है। शर्मा जी के लिये तो हम अच्छा ही कर रहें है। भोले की कृपा से, बजरंगबली की दुआ से शर्मा यदि अभी मर जायेंगे तो वे सीधे बैकुंठधाम पहुंचेंगे। उनकी स्वर्ग की राह में आप अनावश्यक रोड़ा क्यों बन रहे हैं? बंधु, आप स्वयं तो अधर्मी है ही पर दूसरे श्रद्धालुओं को आप धर्म के अमृतपान से वंचित कर रहे है। पुजारी के मुख से उक्त अमृतवाणी सुन कर मै बुरी तरह बिलबिला गया। इच्छा हुई कि इन लम्बोदर जी का गला घोट दूं जिससे ये भी तत्काल स्वर्ग लोक पहुंच जायें। यह श्रद्धालुओं को पानी तो पिला नहीं पाता अमृत कहां से पिलवायेगा? लेकिन मै इतना साहस जुटा न सका। दो दिन बाद बेचारे शर्मा जी चल बसे। पता नहीं वे अत्यधिक अमृतपान से निपट गये थे अथवा पुजारी की सिफारीश पर समय के पूर्व ही ऊपरवाले ने उनके लिये स्वर्ग के के पट खोल दिये थे?
   दीपावली जैसे तमाम उत्सवों पर दर्शन- प्रदर्शन काफी देखने को मिलता है। त्यौहारों के मनाने के ढंग में भी परिवर्तन आ गया है। अबमानव सोचता है कि भला उसकी मंूछ मेरी मंूछ से ज्यादा लम्बी क्यो? यदि सामने वाला अपने धर पर सौ बल्वों की लड़ी जला कर प्रकाश करता है तो वह दो सौ बल्बों की लगा कर प्रकाश करेगा। वह यह नहीं कि ज्यादा प्रकाश देकर लक्ष्मी पहले पड़ौसी के घर में घुस जायें और वह टापता रह जायें। इसी उत्सव पर आतिशबाजी की भी होड़ लगती है। यदि सामने वाला एक हजार रूपये की आतिशबाजी फूं केगा तो वह दस हजार रूपये की फंूक डालेगा। प्रदर्शन की इस होड़ में बच्चोंबूढ़े और दमा के मरीज भले ही वायु प्रदुषण और धमाकों की आवाज से रात भर विचलित रहें पर इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें तो बस अपना बढ़-चढ़ कर प्रदर्शन करना है। दीपावली के शुभ अवसर पर कुछ लोगों के यहां उपहारों और मिठाइयों का ढेर लग जाता है। इन उपहारों को लोग अपनी बैठक में सजा एवं अपने पड़ौसियों और मित्रों को चाय पर बुला कर इन उपहारों का खूब प्रदर्शन करते है। लेकिन उपहारों के मामले में मैं बड़ा दुर्भाग्यशाली जीव हूं।
मेरे ठीक सामने एक बैंक मैनेजर रहते हैं जिनके यहां दीपावली पर खूब उपहार आते है। वे उन उपहारों का खूब प्रदर्शन करते है। मै उनके उपहारों के दर्शनकर ईर्षावश मन ही मन कहने लगता हूं- स्साला।़ बड़ा आया प्रदर्शन करने वाला.... खूब ले ले बेटा उपहार.... बाद में जब इन उपहारों के बदले तुझे गैर कानूनी काम करने पड़ेंगे तब तुझे उन उपहारों की राजनीति समझ में आयेगी। अभी तो दूसरों के माल पर तू खूब इतरा रहा हैं। आजकल बाजार में उच्च स्तरीय प्रतिस्पर्धा के चलते नित नई वस्तुओं का आगमन हो रहा है। नई कीमती कारें भी बाजार में आ रहीं है। यदि आपके पास अकूत सम्पत्ति है तो फिर आप सस्ती कार क्यों खरीदेंगे? यद्यपि सस्ती कार भी आपको रास्ते में नहीं उतारेगी। हां, सस्ती कार खरीदने पर लोग यह जरूर कहने लगेंगे, स्साला। बड़ा कंजूस है, पैसा होते हुये भी यह सड़ियल कार खरीदी है.... सब यहीं धरा रह जायेगा। लोग महंगी वस्तु इसलिये भी खरीदते है जिससे वे पड़ौसियों के सामने प्रदर्शन कर उन्हे जलायें और अपनी मूंछ बड़ी सिद्ध कर सकें। सौभाग्सवश अगर कहीं विदेशी वस्तु हाथ लग जायें तो फिर उसका कहना ही क्या? मेरे एक पैंसठ वर्षीय पड़ौसी के लिये उनकी लड़की इंगलैंड से एक बरमूडा चडडी खरीद कर ले आई। अरे।़ सड़ी गर्मी पड़ रही है कह- कह कर पड़ौसी रात दिन चडडी में ही बाहर घूम कर प्रदर्शन करता रहता है। करते तो वे अपनी चडडी का प्रदर्शन हैं किन्तु लोग चडडी कम उनके एक फुट बाहर निकले हुये पेट के दर्शन कर खूब हंसते है। उसे बीच रास्ते में सिर्फ चडडी में खड़ा देखकर अधिकांश औरतें मुंह छिपा कर अपना रास्ता बदल लेती है। मुझे  तो ऐसा लगता है कि पड़ौसी ने इंगलैंड से उक्त चडडी अपनी शर्म बेच कर मंगवाई है। आपसे अपेक्षा है कि आप ऐसा प्रदर्शन कभी नही करेंगे।

  • मकरंद प्रकाशन, बी- 14, सेक्टर - 15, नोएडा - 201 - 301

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