इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 25 जून 2013

आंसू के कथा वस्‍तु

  वीना शुक्‍ल
 
       आंसू का प्रथम संस्करण 1925 ई. में प्रकाशित हुआ, जिसमें कुल 126 छन्द हैं। वेदनानुभूति एवम्ï करूणा की तीव्रता होने के कारण यहाँ कवि की भावना एकरूपता लिये हुये है और प्राय: सभी छंदों में वेदना का प्रसार है। इस दृष्टि से इसे विरह काव्य की संज्ञा दी गई। आरम्भ में मिलन के भी कुछ चित्र है, किन्तु उनकी अनुभूति क्षणिक है और सारा काव्य विरह की वेदना से आपूरित है। वियोगावस्था के मार्मिक चित्र यहाँ अंकित है। अंत में सुख और दुु:ख, मिलन तथा वियोग को चिरन्तन सत्य मानता हुआ कवि अपनी दार्शनिक, उद्ïभावना व्यक्त करता है-
चेतना लहर न उठेगी
जीवन समुद्र थिर होगा।
संध्या हो सर्ग प्रलय की
विच्छेद मिलन फिर होगा।
       आंसू के अधिकांश छंद अपने में स्वतंत्र है, जिनके कारण भावों को एक सूत्रता नहीं मिल पाती, साथ ही उनमें क्रमबद्धता न होने के कारण अन्विति का आभाव है। सम्भवत: इसीलिये शुक्ल जी ने आक्षेप किया था कि वेदना की कोई एक निर्दिष्टï भूमि न होने से सारी पुस्तक का कोई एक समन्वित प्रभाव नहीं निष्पन्न होता है। साथ ही आंसू की अनूठी उक्तियों ने उन्हें इतना प्रभावित भी किया कि वे उसकी प्रशंसा किये बिना भी नहीं रह सकें- पर अलग-अलग लेने पर उक्तियों के भीतर बड़ी ही रंजनकारिणी कल्पना, व्यंजक चित्रों का बड़ा ही अनूठा विन्यास, भावनाओं का अत्यन्त सुकुमार योजना मिलती हैंं।
    आंसू का दूसरा संस्करण 1933 ई. में प्रकाशित हुआ। वह इतना परिवर्द्घित था मानों कवि ने उसे एक नया रूप दे दिया हो। प्रथम संस्करण की अपेक्षा इसमें छंदों की संख्या भी अधिक है। इसमें कुल मिलाकर 190 छंद है। सभी छंदों के मुक्त होते हुए भी इनमें क्रमबद्घता है। जिससे कथा का आभास मिलता है। शिल्प की दृष्टिï से भी यहाँ संगठन लाने का प्रयास किया गया है और भाषा एवं छंद में अनेक परिवर्तन किये गये हैं, जिसमें कवि की कलागत प्रौढ़ता स्पष्टï होती है। उदाहरणार्थ-मैं बल खा खा जाता था के , स्थान पर
मैं बल खाता जाता था।
   द्घितीय संस्करण प्रसाद जी के सजग एवम्ï विकासमान व्यक्तित्व की सूचना देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रथम संस्करण के समय कवि पर वेदना की छाया बहुत अधिक थी और वह एक प्रकार से भावाभिभूति था। यही कारण है कि यहाँ पीड़ा की अनुभूति बहुत तीव्र है और एक प्रकार की भावाकुलता इस अवसर पर देखी जा सकती है। दूसरे संस्करण तक आते-आते आठ-नौ वर्षों में कवि अपने बहुत से उच्छवासों को नि:शेष कर देता है। जीवन के अन्य दृश्यों की ओर भी उसकी दृष्टि जाती है। इसे हम एक प्रकार से कवि व्यक्तित्व  का विस्तार अथवा प्रसार कह सकते है। जगत के अन्य दृश्यों से अपना सम्बन्ध स्थापित करने में उसे अधिक सफलता मिलती है। इस दृष्टिï से द्घितीय संस्करण का वेदना दर्शन विशेष दृष्टïव्य है। प्रथम संस्करण में कवि की वेदना व्यक्तिगत अधिक है, इसलिये वह निराशा के साथ समाप्त होता है, परन्तु द्घितीय संस्करण जीवन के दृश्यों से जुड़ा हुआ है।
आँसू की अंतिम पंक्तियाँ इसे स्पष्टï करती है-
सबका निचोड़ लेकर तुम
सुख से सूखे जीवन में,
बरसो प्रभात हिम कन सा
आँसू इस विश्व सदन में।
आँसू मुख्य रूप से प्रसाद जी की प्रणय गाथा है और इसे उनकी आत्म कथा से भी जोड़ा जा सकता है-
मधुप गुनगुनाकर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझा कर गिर रही पत्तियॉ देखो कितनी आज घनी।
इस गम्भीर अनन्त-नीलिमा में असंख्य जीवन इतिहास
यह लो करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मिलन उपहास।
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी- बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे- यह गागर रीती।
किन्तु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
यह बिडम्बना अरी सरलते तेरी हॅसी उड़ाऊॅ मैं।
भूलें अपनी, या प्रवंचना औरों को दिखलाऊॅ मैं।
उज्जवल गाथा कैसे गाऊँ मधुर चांदनी रातों की।
अरे खिलखिलाकर हँसते होने वाले उन बातों की।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
जिसके अरूण कपोलों की मतवाली सुन्दर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पन्था की?
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कन्था की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथायें आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नही कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे- मेरी भोली आत्मकथा?
अभी समय भी नही- थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
  प्रसाद जी की यह आत्म कथा हंस जनवरी, फरवरी 1932 के आत्मकथांक में प्रकाशित की गई थी। इसमें प्रसाद जी का सम्पूर्ण व्यक्त्वि निहित है। इसमें उनके सारल्य, विषाद और जीवन प्रेम का परिचय मिलता है। प्रसाद काव्य का सम्यक ज्ञान प्राप्त करने के लिये इस आत्मकथा का महत्व असंदिग्ध है। आंसू काव्य की पुष्टिï के भी स्पष्टï संकेत इसमें निहित हैं।
   आंसू के आरम्भ से अन्त तक कवि ने किसी से प्रेम करने की बात कही है। प्रेम में असफल होने पर आँसू में उसकी वेदना मानो साकार हो उठी है। वेदना की अतिशयता तथा प्रतीकात्मकता ने आँसू के कुछ पदों को रहस्य- वादी बना दिया है। और आलोचक उसे आध्यात्मिक प्रेम काव्य कहने का भ्रम कर बैठते हैं, पर इस असत्य कथा को दृष्टिï में रखते हुये एतद्ï- विषयक समस्त श्रम स्वत: निराधार हो जाते हैं।
   प्रसाद जी ने आँसू में अपनी वैयक्तिक जीवन की घटनाओं विशेषत: प्रेमानुभूति का उपयोग किया है। वैसे तो आँसू की कथा वस्तु अत्यन्त संक्षिप्त हैं या यों कहें कि इसमें कथा न  होकर जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना का विश्लेषण मात्र है। आँसू के आरम्भ में कवि के अन्तरतम्ï में उठने वाली व्यथित भावनाओं का चित्रण है। उसे बीती हुई स्मृतियाँ आन्दोलित करती है। प्रिय वियोग के कारण उसका हृदय व्याकुल हो उठा है, वेदना चित्कार कर उठी है। अनेक प्रश्न उसके हृदय में उठते हैं। उसके जीवन में अतीत की स्मृतियों की प्रधानता है, उन्हें वह नील निलय में फैले नक्षत्र लोक की संज्ञा देता है। कवि अपनी पीड़ा को व्यक्त करना चाहता है किन्तु वह आँसू बनकर उमड़ पड़ी है-
       जो घनीभूत पीड़ा थी,
             मस्तक में स्मृति सी छाई,
       दुर्दिन में आँसू बनकर
            वह आज बरसने आई।

       इस वेदना चित्रण के पश्चात्ï स्मृति मूलक के चित्र है। आरंभ में विषाद के चित्र मनोव्यथा को अभिव्यक्त करते हैं, इसके अनन्तर स्मृतियों के माध्यम से मिलन दृश्यों के संकेत हैं।
       पतझड़ में मधुमास की तरह उसकी प्रिया आती है। और उसकी समस्त चेतना में आवेष्ठिïत हो जाती है। प्रथम दृष्टिï में ही परिचित सी लगने वाली प्रियतमा का सौन्दर्य वह अपलक निहारा करता था। कवि की तन्मयता उसकी चेतना को विस्मृत कर देती हैं। प्रिया के सौन्दर्य चित्रण के साथ मिलन के जो मादक चित्र यहाँ अंकित है, उनमें कवि की भावना पूर्ण उन्मुक्त है। घनिष्टï मिलन के चित्रों के बाद वियोगावस्था का चित्रण है, बीते हुये क्षण को वह फिर लौटा लाना चाहता है। प्रकृति के हर दृश्य में उसे मिलन के मादक क्षण याद आते हैं, और उसकी व्याकुलता मुखरित हो उठती है। वियोग की ये घड़ियाँ कवि को व्याकुल भले ही कर देती हों, निरीह नहीं होने देती। मिलन की स्मृतियाँ उसमें नवजीवन का संचार करती हैं। उसकी वेदना समष्टिïगत्ï होकर एक नवीन स्वरूप प्रहण करती है। वह वेदना को चिरन्तन सत्य के रूप में स्वीकार करता है, जो मधुरता से ओत प्रोत है-
             लिपटे सोते थे मन में,
                   सुख दु:ख दोनों ही ऐसे।
            चंद्रिका अंधेरी मिलती,
                  माजती कुंज में जैसे।

    अन्त में कवि वेदना के मंगलमय रूप का दर्शन करता है जो जगत को आलोकित कर सके। अब वह उस वेदना की आकांक्षा करने लगता है जो उसके हृदय को मधुर एवम्ï कोमल भावनाओं से आपूरित कर सके। कवि के लिये वेदना जीव- संगिनी बन गई है। वह समस्त सृष्टिï में व्याप्त है। कवि संपूर्ण जगत के लिये मंगल की कामना करता है और अपने आँसुओं के द्घारा वह सम्पूर्ण जगत की कलुषता को धो देना चाहता है। अन्त में वह आँसुओं को वरदान समझता हुआ उनसे बरसने की कामना करता है:-
        बरसो प्रभात हिमकन सा,
            आँसू इस विश्व सदन में।
   आँसू का सौन्दर्य कवि की हृदयगत्ï भावना का सौन्दर्य है, इसीलिये इसे भावात्मक काव्य की संज्ञा दी जा सकती है। कवि की भावना का सरस प्रवाह उसे एकसूत्रता देता है। जिससे हम कथा की कल्पना कर लेते हैं। आँसू की गाथा वस्तुत: कवि की आत्माभिव्यक्ति ही है। यहाँ प्रेम पथिक या महाराणा का महत्व की भाँति कथा की नियोजना नहीं की गई है, वरन्ï कवि की अन्त: प्रेरित भावनायें जिन चित्रों का निर्माण करती है, उन्हीं से एक प्रकार का तारतम्य निर्मित हुआ है। भावनायें एक दूसरे से सम्बद्घ हैं। इस सम्बन्ध में राम प्रसाद खण्डेलवाल का कथन उचित जान पड़ता है- सहज प्रसन्न प्रवाह प्रसन्न, प्रवाहमयी जलधारा की तरह इसमें कोई कहानी नहीं चलती किन्तु इसके प्रभाव एवम्ï आकर्षण का मुख्य आधार इसकी रमणीय कल्पनायें और अभिव्यक्ति की अनेकानेक भंगिमायें हैं।
पता
बी 5 ,नेहरू नगर, बिलासपुर (छ.ग.)

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