इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 27 जून 2013

कलम जागरण गाती है



  • - हरप्रसाद निडर -

जब है दुनिया नींद में होती, कलम जागरण गाती है।
    चीर तिमिर के उर - बंधन को, नई किरण फैलाती है।
जुल्म नाचता त्याग शराफत, जस अंधड़ जवानी में।
लूट जाती है अबला जैसी, शील सच्चाई वीरानी में।
डूब लेखनी रंग कलब से, बलखाती इठलाती है।
चीर तिमिर के उर बंधन को, नई किरण फैलाती है।

    संस्कृतियों की तोड़ सरहदें, आतंकी धूम मचाता है।
    जग - जननी की शान धरोहर, निर्मम धूल चटाता है।
    नवांकुर औ नई बेल ले, कलम कलमी बन जाती है।
    चीर तिमिर के उर बंधन को, नई किरण फैलाती है।

समर भूमि में काम न आती, ताकत अकल जवानी है।
नैतिकता को घेर कालिमा, जब करती मनमानी है।
कौंध गगन उच्चारता, इक गीत नया प्रभाती है।
चीर तिमिर के उर बंधन को, नई किरण फैलाती है।

    नैसर्गिक विपदा जब - जब, प्राणी जगत संहार किया।
    आविष्कार विज्ञान वलय भी, अंत समय दुत्कार दिया।
    प्रतिपल आँक - आँक आंकनी, आकाशी बन जाती है।
    चीर तिमिर के उर बंधन को, नई किरण फैलाती है।
  • पता - गट्टानी कन्या शाला के सामने, अकलतरा रोड, जाँजगीर (छ.ग.) मो. 9826071023

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