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गुरुवार, 27 जून 2013

आमेली

ओड़िया कहानी का अनुवाद
मूल लेखक - डॉ. अर्चना नायक
आमेली

-  अनु.  कृष्णकुमार '' अजनबी ''   -

साल में दो - तीन मर्तबा मैं पॉण्डीचेरी जाती ही हूं और एक निश्चित रेस्ट हाउस में ठहरती हूं। उसकी चारों ओर प्राइवेट मकान बने हैं। कहाँ कौन रहता है, इस बारे में मैंने कभी नहीं सोचा। मगर हाँ, सामने वाला नीले रंग का मकान खूब लुभाता है मुझे। वहां रहते तक छत में जाकर सूर्योदय का दृश्य देखना मुझे अच्छा लगता है, वह भी समुंदर से उगते सूर्य। एक रोज मैंने देखा उस नीले मकान की छत पर एक युवती बैठी है। उसके सफेद रंग और सुनहरे बालों से स्पष्ट था कि वह विदेशी महिला थी।
दो दिन बाद देखती हूं उस नीले मकान के आगे एक कीमती गाड़ी खड़ी है। मैं अपने काम से निकल रही थी तभी पीछे से सुनाई दिया - एक्सक्युज मी। मैं पीछे मुड़ी। देखा वही युवती है। तभी उसने हेण्डसेक के लिए हाथ बढाते हुए कहा, आई एम आमेली थॉमस। मैंने हँसते हुए अभिवादन स्वीकार किया। वह मेरे साथ क्या कुछ वार्तालाप करना चाहती है जानकर मैं हर्पित हुई और जिज्ञासु भी। 
उसने बताया कि उस फलैट में वह सालभर से अकेली रह रही है। कई बार देख चुकी है मुझे और पता भी कर चुकी है कि मैं किसी कॉलेज के दर्शन विभाग में अध्यापिका हूँ। वह कुछ तथ्य मुझसे जानने की इच्छुक है। तभी मुझसे सहयोग मांग रही है। तभी दो प्याले कॉफी और कुछ स्नेक्स लिए आमेली लौट आई। कॉफी पीते - पीते उसने जानना चाहा कि भारत के लोग जन्म - जन्मान्तर और नियति को अधिक मानते हैं। तो क्या आदमी का फ्री उइल कुछ नहीं है ?
मेरे जवाब को उसने ध्यान से सुना, समझा या नहीं यह मैं कह नहीं सकती। पर कुछ सोच जरुर रही थी। मैंने उसका ध्यान बटाने पूछा - अच्छा आमेली, ये सब मूर्तियाँ कहां से ले आई ? उसने चौक कर कहा - नो नो, दे आर नॉट स्टेच्युज। दे आर रियल गॉड एण्ड गॉडेसेस।
- यस यस, दे आर ओनली स्टेच्युज। नॉट रियल गॉड एण्ड गॉडेसेस। मैंने कहा।
- मे बी, बट ए डे वील कम, दे वील बिकम रियल गॉडस।
- डु यू बिलिव इन इट ?
मेरे इस सवाल का जवाब दिये बिना ही वह ध्यान से उन मूर्तियों को एकटक देखने लगी। तब तक मैं चुप बैठी रही। मुझे पता था, तमिल और अंग्रेजी के जानकार द्विभाषी व्यक्ति के साथ वह अक्सर घूमने जाय करती है। ऐसा मैंने सुना था।
तभी उसने कहा कि तमिलनाडु के तांजोर के पास वाले गांव से ये सब बड़ी मुश्किल से ला पाई है। पहले पहल उस मूर्तिकार ने देने से साफ इंकार कर दिया था, पर बाद में पता नहीं क्या हुआ तो उसने स्वयं होकर दे दी थी, यह मूर्तियाँ। पर इनमें जीवन्यास नहीं हुआ है। चक्षुदान के बाद ही जीवन्यास हो पायेगा।
मूर्तिकार श्रीनंदन के कथानुसार जितने डॉलर देने पर भी आमेली के हाथों वह अभिमंत्रित जीवन्यास प्राप्त मूर्तियों को नहीं बेचेगा। ऐसा उसका मानना था। बार - बार आमेली निराश भी हुई है पर उसकी आकांक्षा दिनों दिन बढ़ती ही जा रही थी। लगातार वह वहां दस्तक देने लगी और मूर्ति की गुहार करने लगी। इससे मूर्तिकार बेहद त्रस्त और परेशान रहने लगा। अंतत: उसने हार मानकर एक ऐसी मूर्ति दे दी जिसका जीवन्यास होना बाकी था। उससे ही आमेली को संतोष हुआ और उसके मन में यह दृढ़ विश्वास हो गया कि अब आज नहीं तो कल इसका जीवन्यास होगा ही।
अब मैं अपने घर लौट आई थी। दिमाग में वही बातें घूम रही थी। प्रतिमा को लेेकर उसके मन में इतना आग्रह और आदर देख मैं भी हैरत थी। हम भी मंदिरों में जाते हैं पर हममें से कितने ऐसे हैं जो उन प्रतिमाओं में साक्षात देवी- देवताओं को देख पातें है या यह अहसास कर पाते हैं। परन्तु.. एक अलग संस्कृति से आई हुई लड़की के मन में ऐसी अभिप्सा देख मैं भी सोच में पड़ गई थी।
इस बीच छ: माह बीत गए। मैं पुन: पॉण्डीचेरी गई। वहां मैंने देखा फ्रांस से कुछ मेहमान आमेली के यहां आये हुए हैं। मैंने नौकरानी अम्मा लक्ष्मी से इशारे में पूछा तो उसने तमील में बहुत कुछ बड़बड़ाया पर मेरी समझ में कुछ नहीं आया तो फिर टूटी फूटी अंग्रजी में उसने दोहराया- आमेली मैरिज, बट... ब्लैक ब्लैक। मैं समझ गई। गोरी चिट्टी आमेली ने किसी ब्लैक तमिल से शादी कर ली है।
इस बार मैं दो तीन दिन के प्रवास पर आई थी। दूसरे दिन प्रात: तैयार होकर टैक्सी से प्लेटफॉर्म पहुँच गई। करमंडल एक्सप्रेस ट्रेन नौ बजे चेन्नई से छुटेगी पर गाड़ी अभी प्लेटफॉर्म में लगी नहीं थी। मैं वहीं बेंच पर बैठ कर अखबार देखने लगी। बीच बीच में गाड़ी की खबर लेने झांक लेती थी।
तभी मुझे अचानक प्लेटफॉर्म पर आमेली को आते हुए देखकर हैरत हुई। साथ में एक काला कलुटा युवक भी था जो कतई जंच नहीं रहा था। कहने का मतलब दोनों की जोड़ी बिल्कुल फब नहीं रही थी। आते ही आमेली ने आश्चर्य मिश्रित हर्ष के साथ हाथ मिलाया और परिचय करवाया। पर मैं हामी में बस सिर हिला पाई थी। फिर जिज्ञासु होकर पूछा - इनसे कैसे मुलाकात हुई ?
उसने विस्तार से बताया कि मूर्ति के लिए बार - बार वहां जाते रहने के कारण एक रोज इनसे मुलाकात हो गई। पहली मुलाकात में ही उसे अपना दिल दे दिया। और वर्षों की तलाश पूरी हो गई। दोनों में प्यार हो गया और शादी भी। अलग - अलग भाषा - बोली, रहन - सहन, होने के बावजूद भी दोनों ने एक दूसरे को अपना ही लिया।
मैंने इस बीच पूछा - क्या आपके घरवाले इस रिश्ते से सहमत है ?
उसने जवाब में कहा - नहीं, पर दो दिलों को जुदा करना किसी के वश में नहीं है। वह बेहद प्रसन्न मालूम होती थी, पर मुझे तो केवल यह पागलपन लगता था।
अचानक आमेली ने प्रसंग बदलते हुए प्रश्न किया - मैडम, आप टुइन सोल के बारे में तो जानती होंगी न ? एक आत्मा जब किसी कारणवश दो भागों में बंट जाती है और इस संसार में भटकती रहती है, पर जब ये दोनों पास आ जाती है तो फिर कभी जुदा नहीं होती ?
इस दार्शनिक सवाल का क्या जवाब दूं ? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। तभी गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आती हुई दिखी तो मैंने प्रश्न किया - अच्छा, आप लोग कहाँ जा रहे हैं ? उसने जवाब में कोलकाता कहा। मैंने फिर पूछा - क्यों, हनीमून के लिए ... ?
उसने हंसते हुए कहा - जी नहीं, आपको याद है, यह मूर्ति का अब जीवन्यास होने वाला है कोलकाता में। वहीं जा रहे हैं।
अब मेरे मुख से कुछ भी न निकले। मैं हैरत भरी दृष्टि से उसे निहारती रही। इस बीच हम परस्पर से विदा लेकर अपनी - अपनी कोच में सीट तलाशने में मशगूल हो गये। गाड़ी रफ्तार पकड़ने लगी। मैं फिर सोच में डूब गई थी। आमेली की श्रद्धा, आस्था, विश्वास एवं असीम प्रेम को देख मेरे मन में वर्षों से जमी हुई रुढीवादी भक्ति बर्फ की परतें आहिस्ता - आहिस्ता पिघलने लगी थी ...।

  • सं. सावित्री, 102,अभिप्सा, शहीद नगर, भुनेश्वर - 751007

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