इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 19 जून 2013

लापरवाह शुभचिंतक


  • श्रीराम ठाकुर ' दादा ' 
कार्यालय के पते से मेरी एक चिट्ठी आयी। मेरे कालोनी निवासी साथी ने सोचा - आज दादा की छुटटी है, उन्हें घर में दे दूंगा। उन्होंने चिटठी अपनी जेब में रख ली। दूसरे दिन मैं कार्यालय गया तब सहकर्मियों ने बताया - कल आपका कोई पत्र आया है, किसी ने रख लिया है। मैंने सबसे पूछताछ की लेकिन उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की। एक दिन चिटठी ले जाने वाले साथी कार्यालय में मिले। उसने सूचना दी - दादा, आपकी चिट्ठी घर में रखी है। आज शाम को भेज दूंगा। शाम को न मिलने पर अपने सुपुत्र को उनके घर चिटठी लेने भेजा। उनकी श्रीमती ने कहा - श्रीमान ने स्कूटर की डिक्की में रख ली है। कह रहे थे दफ्तर जाते समय दादा के घर दे दूंगा। दफ्तर में मिले तब वे बोले - आपके घर में कोई दिखा नहीं इसलिए आपके पड़ोस में दे दी है। उस पड़ोसी ने  पत्र में मेरा नाम देखकर फिर उसी साथी को देकर कहा - यह पत्र हमारा नहीं है।
एक दिन मैंने उस साथी से पूछा - तुम चिटï्ठी ले क्यों आये आफिस से ?
वह बोला - जिससे आप जल्दी पढ़ ले।  

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