इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 15 जून 2013

हरमुनिया

  • मंगत रवीन्‍द्र 
रमाएन तो कतको झन गाथें पर जेठू के रमाएन गवई हर सब ले आन रकम के होथे। फाफी राग ... रकम - रकम के गीद ल हरमुनिया म उतारे हे। जब पेटी ल धरथे ता सब सुनईया मन कान ल टेंड़ देथें। ओकर बिना तो रमाएन होबे नई करै। सरसती मइंया तैंहर बीना के बजईया ... उसाले पाँव बाजे घुंघरू ओ मइया छनानना, उसाले पाँव ...।
नानपन ले जिंहा रमाएन होवै तिंहा सुने ल चल देवै एक कोन्टा म बइठ के चित्त लगा के सुनै। कोन रात कोन बिकाल ले घर म फिरै। रमाएन सुनत - सुनत अतका तार पके हे कि कोनो मेर के कथा अऊ गीद ल पूंछ ले, मुंहखरा बता देथे। रकम - रकम के गीद हर ओकर पेट म भरे हे। कोनो गाये बजाये म चुकथे ता चटटे सुरता करा देथे। पर अड़हा ए बेचारा हर ... रमाएन ल बाँच नइ सकय। आखर के ज्ञान नइ हे तिही पाय के हिम्मत करके बियास  म बइठ नई सकय ... हां, ककरो संग बइठ के झोकै लागै।
एक दिन दसना म सूते - सूते गुनीस - धन मैं, थोरथार पढ़े रतेओं ता पेटी ल धर के गा ले तेओं। अड़हा ए कहिके मोला पारी नई देवैं। अइसे गुनत तो बिचारा के नींद परगे पर रात के सपना देखथे के ओकर बहिनी हर एक ठन हरमुनिया ल मुड़ म बोह के भाई घर अमराय ल आवत हे। कहिस - भइया, ऐ दे तोर हरमुनिया, बजा के देख तो ... अइसे बजाहूँ कहिस ओतके बेरा सारे बिलाई हर पटउहा म मुसवा धरे ल दमरस ले कूदिस ता जेठू हर झकना के जाग गे। का सपनावत रहे दद्दा कहत जोर से जम्हाईस अऊ फेर ढलंग गे ...।
बिहना मनटुटहा नहाये ल तरिया जावत हे। ओती ले रंगा महराज हर ओम नम: शिवाय ... ओम नम: शिवय कहत चेरू ल जेवनी हाथ म धरे आवत रहिस। पांय लागत हों महाराज।
- जय हो। जेठू ल उदास जान के महराज पूंछथे - कइसे जेठू, आज कइसे मनटुटहा हस ग ? नरसों बगचुंआ म नवधा के नेवता हे, जाबो न ?
- का कहौं महराज, जाये ल तो जाहूं। पर मोर मन म एक ठन पीरा हे।
महाराज कथे - अरे, तोला का पीरा हे ? दाई - ददा जीयत हे। घर म सुवारी। नोनी बाबू .. गांव म बहिनी भांटो के घर। फेर तोला का के तकलीफ हे चतुर मनखे ल।
- अइसे बात नई हे महाराज। मोर पेट म रकम - रकम के गीत भरे हे पर एक आखर पढ़े नहीं ता मोर मन हर कचवाथे। हरमुनिया धर के गा नई सकौ अतके मोर पीरा हे।
- हत जकहा, एमा संसो करे के का बात हे। गाँव म प्रौढ़ शिक्षा पढ़ाथे, उंहा अपन नाव ल लिखा दे अऊ रोज पढ़े ल एक घरी जा ... सब्ब ल सीख जाबे।
॥ गाँव म खुले हवै शिक्षा ज्ञान प्रौढ़ के॥
॥ जा न जेठू पढ़े तैंहर, रथिया कथरी ओढ़ के॥
- सीरतोन महराज ?
- अरे, तोला ठगहुं का ग ? मोर ठगे के नता थोरे अस ...।
- तोर भलबाद होय महराज, मोला अच्छा रस्दा बताये कहत तरिया के रोंट पार म चढ़गे।
चितकुंवर नोनी संतोषी उपास रहै। उदियापन के दिन संझा रमाएन के पोरोगराम हे। रमाएन मण्डली हर नेवताए हे। महराज घर तो बिहने ले दार - चउर हबरगे हे। भाई जेठू हर बिहने ले डेरा डारे हे, काबर ... बहिनी घर ए, कछु - कछु काम ल करे ल परत हे ....।
संझा होइस। छानही म सनत साउण्ड सर्विस के चोंगा टंगागे। पहिली पारी जेठू के हे ... टिपा गे। माखन ल कहिस - ले भांचा पेटी ल धर ... मंय गाहूं। फेर झन पूछ रमाएन झम्मक गें। ओ तो प्रौढ़ शिक्षा म जा के बज्जर पके हे। कथे ना -
॥ जन सुधरहिं सत संगति पाई॥
॥ पारस परस कुधातु सुहाई॥
सरसती मइया तैंहर बीनाके बजईया, उसाले पांव बाजे घुंघरू ओ मइया छनानना, उसाले पांव .. गीद ल सुन के रंगा महराज मूड़ी ल नदिया बइला कस डोलाइस। अहा, धन हस रे जेठू तोर फाफी राग। रमाएन छेवर होइस। परसाद झोकीन अऊ अपन - अपन घर रेंगीन ...।
कै दिन ले आन के गेड़ी म रेंगहूं। ओ दिन मोहन भांचा हर बजाईस। फलाना दिन जग्गू हर। अदरा बइला के आगू रेंगे ल परथे। सूरदास ल लाठी के मुड़ी धरईया लगथे। इही गुनाबात म जेठू हर सधवा घर के छटठी नेवता के रमाएन म गैर हाजरी करिस। रंगा महराज घोखत रहिस के अतेक बेर ले जेठू कइसे नई दिखत ए ... ओ दिन हर बुलकगे ...।
बहिनी चितकुंवर हर गांव म बिहा के गये रहिस। भइया ल छानी ओइरे ल बलाए हे। पागा मारे छानी म चढ़े जेठू हर खपरा ल ओइरत हे। नोनी कथे - भईया, सधवा के घर छटठी के रमाएन म तोर नरी ल नई सुनेओं। कहां गये रहे ग ? भउजी खिसियाईस का ?
- का कबे नोनी, तोर भउजी तो कलंकनीन ए ... कहूं कती जाबे रमाएन गाये ल ता बेड़ी ल हरक के सूत जाथे। फरिका ल उघार रे ... उघार रे ... कबे ता कड़ाए डोंड़का कस नरी म कथे - जा ... जा ओई कती ककरो आंट परछी म सूते रबे। गंवार नारी के संगति परगें ओ बहिनी। रोज - रोज दंतिया कस झकोरथे। दहंस म तन हर सुखाके कांटा होगे। जवरिहा - जउरिहा लोग लइका ... सुने म लाज लगथे। सोना चांदी रतिस ता कालीच नावा बदलके ले आतें पर अब का करौं जवानी के खसलती अऊ बुढ़ापा के लगती। चाबे कोंथे कस गोठियाथें। इही सोच के तुलसी बबा हर लिखिस काय ...।
॥ ढोल गंवार उदण्ड पसु नारी॥
॥ ये पांचों परखन के अधिकारी॥
नोनी, एक ठन मोर सउंक हर रह गये हे। पढ़े नई जानत रहें। एदे पढ़े ल सीख गये ओं। पर का करौं ए नारी के कुमत म कछु करते नई बनै।
- का सउंक हे तोर भइया, बताना। अरे, तोर से नई होही ता हमन कछु उदीम करतेन। ले बताना।
- नानमुन हरमुनिया ले हे के साध हे। सबे कथें - अब पेटी बजाए ल सीख जेठू, पेटी बजाए ल। ले मैं कहां ले बिसावँ ? ठेकली म तोर भउजी हर पैसा ल धरे हे अऊ तैं जानत हस ओहर जर घला के मंगनी नई देवै फेर बाजा ले डारबे ता तो मोरे बाजा बजा दिही ...।
भाई के गोठ ल सुन के चितकुंवर बहिनी ल दया आगे - भइया, थोरथार ल तो थाम दिहौं पर एक ठन गोठ कथौं - कंजूस के धन ल घुना खाथे। भउजी हर जम्मों चीज ल पोटार के धरे हे। ओकर बर गहना लेहे के नाव म सब पैसा ल ले ले अऊ तोर सउंक ल पूरा कर ले। जादा उपनबाय करही ता मैं थाम लिहूं। भउजी ल। नई तो तोर राहत काम के पगार मिलही तेकर ले देबे ...।
नोनी के सिखोना म जेठू आ गे। अंगना म बइठे जेठीन सूपा म चउर ल निकियावत रहिस। कथे - कस ओ चमेली के दाई, अरे गांव भर के डउकी परानी मन रकम - रकम के गहना पहिरे हें अऊ तोला तो क छु के साध नई लगिस।
- त मैं का करौं ... तोला तो दिन रात रमाएन हर धर खाये हे। कमई न धमई। रोज - रोज आधा रात ले किंदर के आथस। डउकी परानी के कभू सुरता करथस का ?
- अरे पगली, तोला राम रमाएन हर चाबथे का ? भगवान के भजन म जाथों। का तोर सउंक ल नई पुरोवॅव का। का के कमती हे घर म, बताना चुपे काबर हस ?
अतका सुनके जेठीन कथे - ले का कहत हस तेला बता।
- ओ ठेकली के पैसा ल हेर अऊ चल चली बुधवारी बजार। कछु गहना पहिर लेबे।
- हां - हां, मन के छांट लेबे कथस। छाती म गढ़त हे का पैसा हर ...?
- अरे जकही, मोर छाती म काबर गड़ही। मैं तो तोरे बर कहत हौं। ले ले, नई तो सबला मुरचा खा दिही। ओ दिन नोनी हर घलोक कहत रहिस।
का गुनीस, का समझीस जेठीन हर - हहो कहिस, तहिच्च चल देबे बजार ... मोला काबर ले जाबे ...।
आइस बुधवार, जेठू हर ठेकली के पैसा ल मोटरिया के संकेरहा ले बुधवारी बजार चल दिस। खैमो - खैमो मनखे मन करत हे। सोनार पसरा तो गइस पर मन छलहा ... ओकर धून तो हरमुनिया म लगे हे। दहात - दहात सदर कोती गइस, एकेटï्ठा हरमुनिया दुकान म जा के खड़ा होइस। कतेक ल गोठियाबोन, गहना छांड़ जेठू हर एक ठन सुघर हरमुनिया ल मलोके ले डारिस ...।
अइसे बजे तीनिक ... डरोपोको घर ओरथे। बजवट म पेटी ल मढ़ाईस अऊ झोला ल खूंटी म अरझा दिस। जेठीन तो डहर निहारत रहै। ओकर मन बड़ कुलकुला हे। झोला ल टमरिस .. दुच्छा .. बजवट म आने रकम के बकसा ... आंखी एती ओती नाचत हे।
जेठू हर सुवारी के सुभाव ल जानत हे के आज एहर कलंक मचाही। जी ल हूम दे के ए उदीम ल करे हे। चाहे कछु होय। मैं हर घर के सियान औं, मोरे चलही। जेकर घर डउकी सियान तेकर घर मरे बिहान ...।
जेठीन डबके अंधना कस पुरकत कथे- तैं काला लाने हस ... ए कोटना ल। एला थोथना म चाटबो। लड़हार के ठेकली ल फोरवाये, अउ अपन हाड़ा ल लाय हस।
का पूछबे भइया, गोठ के अंगरा बरसगे। जेठू बिचारा कान म ठेठी डार के सबला सुनत सहत हे। अतके बेरा नोनी चितकुंवर अऊ गांव के चैतु मण्डल घला आ गे। धीरे - बानी करके अंगना म चार झन जूरिया गइन। ए दे समझई - समझई म जेठीन हर कुवरंहा कस बादर एक कोन्टा म थिराईस ...।
दिन पहावत हे। संझा पगार के हांका परिस। के चला हो - अपन - अपन राहत काम के पगार ल झोंके ... जेठू के कान ठड़ियागे। गइस, पगार झोंकिस। जेठीन के अंचरा म ला के मढ़ा दिस। कहिस - नोनी संग चल देबे, हाट अऊ तोर मन के पहिर लेबे। जेठीन कुलक भरिस ...। हपताही म ननद संग चकचक ले गहना पहिर के आ गे।
अंगना म बइठे ननद के मुड़ ल जुंहा देखत भउजी कथे - कस चितकुंवर, बने फभै हौं न। तोर भइया बड़ मयारू हे ओ। देख तो अउंटाय लहू के पैसा म कतका सुघर पैरी अऊ झुमका ले दिस।
चितकुंवर कहिस - रानी बरोबर दिखत हस मोर मयारू भौजी, अब भइया ल झन लड़बे।
- चुप्प ओ, लड़े - भिड़े के बात ल कहिथस। कब लड़े हों तोर भइया ल, बता तो ?
अतके बेरा खखारत पुसाऊ गंउटिया आ गे। कथे - कहां हे ददुआ हर ? गंउटिया के आरो पा के ननद भउजाई उठ गइन। बइठा कका ससुर, पांव परत हौं। चिरोंजी रहा ...। ओ तो बेड़ा कती अभीच्च निकलीस हे।
- हं, ए दे संझा हमर घर रमाएन के नेवता हे। हौं ...। चल दिस गंउटिया हर ...।
खा पी के संझा चितकुंवर हर रमाएन सुने ल भउजी ल बलाए गीस। भउजी हर बने सम्हर पकर के तारा फरिका देके ननद संग रमाएन सुने जावत हे। पुसाऊ गंउटिया के मेल्ला आंट खचाखच मनखे भरे हे। एती जेठीन हर ननद संग झम्मक झम्मक पैरी बजावत रेंगत हे। अऊ ओती जेठीन के गोसईया नवा हरमुनिया म गावत रहिस -
॥ सरसती मइंया तैंहर बीना के बजइया,
    उसाले पांव बाजे घुंघरू
ओ मइया छनानना .... उसाले पांव ....॥
ननद के हिरदे म गीद हर समागे। भउजी ल कहिस - सुनत हस भउजी, भइया हर कइसे रमाएन गावत हे। अऊ तोर पइरी कइसे बोलत हे। ननद के गोठ ल सुन के भउजी के हिया भरगे। नोनी मैं का कहौं, तोर अंतस के गोठ ल। तोर भइया ल रात दिन ठेवना मारौं। आज सबे कहत होंही के फलालीन के गोसिया हर रमाएन ल गावत हे। धन हे मोर भाग, मोर लेढ़वा जोड़ी चार झन के बीच ऊंच मूड़ी करके हरमुनिया धरे गावत हे -
॥ सरसती मइया तैंहर बीना के बजईया ...
॥ उसाले पांव बाजे घुंघरू
ओ मइया छनानना ...।
  • शासकीय  उच्‍चतर मा. विद्या.कापन,
  • जिला - जांजगीर -चांपा(छ.ग.) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें