इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 1 जून 2013

उहाँ - इहाँ



  • हरप्रसाद निडर
सबे सहर अब गंगा होगे,
मोर गंवाई नंगा होगे।
घूसखोर उहाँ डूबकी मारैं
इहाँ रोटी बर दंगा होगे॥
कमइया जांगर ल देखा,
भुंजाये कस पापड़।
दू बर ल दू आषाढ़ फेर,
मंहगाई के झापड़।
उहाँ मरूरहा बैपारी अऊ,
सुकटा मुंशी दबंगा होगे।
इहां बीमारी भूखमर्री म,
कोठी हर भर भंगा होगे॥
साहूकार के सूदखोरी म
लोटा बटकी बूड़गे।
गहना धनहा भैसा गाड़ा,
करम दया के फूटगे।
उहाँ के चार बेच के
मंजिल रंग बिरंगा होगे।
इहाँ धान दुबराज खेत के
मंडी म करंगा होगे॥
हाड़ी - हाड़ी म राजनीति
भरगे दूहना म पानी।
तैंतीस कोटि देवी देव संग
चढ़गे खपरा छानी।
उहाँ कनवा थानेदार,
भैरा अधिकारी चंगा होगे
इहाँ बने बर कोटवार,
जाति धरम म पंगा होगे॥
  • गटटानी, कन्या शाला के सामने, अकलतरा रोड, जांजगीर (छग.)

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