इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 26 जून 2013

डाक बंगला



  • डॉ. श्रीमती शीला शर्मा

गोकुल सरकारी डाक बंगले में चौकीदार है। पास की एक खोली में वह सपरिवार रहता है। परिवार में वह स्वयं माँ तथा उसकी पत्नी है। बाल - बच्चा कोई न था। गोकुल की शादी हुए पूरे एक साल भी नहीं हुए। वैसे उसकी घरवाली अच्छी थी। काम - धाम में दुरुस्त। दो - चार साल के बाद ही बाकी बातें दिखती है। डाक बंगला का काम आसान तो नहीं होता। गोकुल की बात और उसकी माँ के कारण छोटे - बड़े अफसर प्रसन्न रहते थे। महीने में पचास रुपए मिलता है। इसमें क्या होता जाता है। आने - जाने वाले अफसरों की दुआ - सलामी से सौ सवा सौ रुपये महीने में पड़ जाता है। गोकुल का जीवन संयमित तथा नियमित था। ज्यादा टीप - टाप और शेखी तो इसमें थी नहीं। अपव्यय की बात नहीं थी। खर्च आराम से चल जाता था। किसी बात की चिन्ता नहीं थी।
गोकुल जब पांच बरस का था तभी उसका बाप चेचक से मर गया। गोकुल के लिए कोई न था। केवल जवान माँ। चारों ओर अंधकार था। चार दाना की पड़ी थी। घूम - फिरकर कैसे विपदा हल होगी। अतएव सोच - विचार कर गोकुल की माँ ने नौकरी की तलाश की। एक हवलदार ने उसकी सिफारिश कर दी। डाक बंगले में नौकरी तय हो गयी। नाममात्र के लिए गोकुल की चौकीदारी थी। बाकी काम धाम तो उसकी माँ ही करती थी। डाक बंगले की साफ - सफाई, लीपा - पोती और कभी - कभार कोई अफसर आया तो धोवन - धावन बस यही सब हल्के फुलके काम थे। गोकुल केवल माँ के पीछे - पीछे घूमता - फिरता थक तो कहीं पड़ा रहता था। हवलदार ने गोकुल की माँ को गंभीरतापूर्वक रहस्यपूर्ण अर्थों में समझा दिया था।
 गोकुल की मां, तू जवान है और उस पर बेमर्द। जमाना बड़ा नाजुक है। डाक बंगले की नौकरी है। छोटे- बड़े, अच्छे- बुरे अफसरों के नजरों से गुजरना पड़ता है। सेवा सुश्रुषा में भी कोई कसर नहीं रखती हैं। गोकुल को अभी बड़ा होना है। तू तो औरत है देह बांधकर रखना ही पड़ेगा....।
  गोकुल की मां अच्छी तरह समझ गई थी। उसे गोकुल को पाल- पोसकर बड़ा करना था। अपने काम में पूरी तरह वह भिड़ गई थी। डाक बंगले में टेबिल- कुर्सी तथा आदमकद आईने सजाकर रखे हुए थे। पलंग और उस पर के सफेद बिस्तर सदैव बिछे हुए थे, गोकुल की मां एक- एक वस्तुओं की झाड़- पोछ कर दुरूस्त रखती थी। आदम कद आईने के सम्मुख खड़ी होकर वह चोरी- चोरी अपना रूप निहारा करती कि उसी क्षण उस आईने में हवलदार की  
प्राकृति उभर जाती थी-
  गोकुल की मां तू विधवा है और उस पर बेमर्द- जमाना नाजुक है- अफसरों को प्रसन्न रखना है- गोकुल को बड़ा होना है... देह बांध कर...।
 वह झट डाक बंगले के बाहर निकल पड़ती और दालान में बैठ जाती थी। ठीक उस खोटे सिक्के की तरह उसकी तन्दुरूस्ती थी जिसे भुलाया नहीं जा सकता था।
  गोकुल की मां इसके पूर्व अपने को केवल एक बेवा औरत मानकर चलती थी। उसे उनकी जवानी और सख्त नारियल की तरह देह के विषय में तो उस आदम कद आईने ने ही संकेत किया। शायद इसीलिए विधवा को दर्पण   देखने का बंधन होता हैं।
  डाक बंगला शहर से दो मील दूर था। पास ही नाला था खेत खलिहानों के सिवा वहां और कुछ दिखाई न पड़ता था। गोकुल की मां बहुत दूर तक निगाहें दौड़ाकर आने-जाने वाले अफसरों की बाट जोहती। कोई थका- हारा उस डाक बंगले में उतरता तो गोकुल की मां मन ही मन कुलकुला उठती थी। उसको ऐसा लगता था जैसे वह डाक बंगला उसका अपना घर है और वहां ठहरने वाला अफसर उसके अपने लोगों में से है। वह सेवा सुश्रुषा में कोई कसर नहीं उठाती थी। नहाने के लिए गर्म पानी, पोछने के लिए स्वच्छ तौलिया, खाने के लिए मन - पसंद भोजन और सोने के लिए  बिछा हुआ शानदार बिस्तर आदि निहायत तैयार मिलते थे। कुछ खास अफसरों का तो डेरा लगा ही होता था। कभी- कभी अफसरान गोकुल से भी बातें करते थें। कोई नाम पूछता तो कोई उसे दौड़कर माचिस लाने को कहता इस तरह उन्हें भी मन बहलावे को साधन मिल जाता था। गोकुल भी साहबों के काम करने में बड़ा प्रसन्न होता था। वह दौड़कर काम करता और सदैव टन्च रहता था। गोकुल की मां अपने बेटे को अफसरों से बातचीत करते देखती तो फूली न समाती।
  पहले- पहले तो वह अपने काम- धाम में झेंपती थी। डाक बंगले में अफसरों के आमने - सामने होने में वह खूब संकोच करती थी। लेकिन धीरे-धीरे उसका संकोच जाता रहा। लज्जा मिट गई और अब वह खुलकर डाक बंगले में रहने लगी थी। अफसरों से मेल- जोल बढ़ता गया और संसर्ग में वह सब कुछ सीख- पढ़ चुकी थी।
  गोकुल का बाप जब मरा तभी से उसकी मां केवल सफेद साड़ी पहनती थी। डाक बंगले की नौकरी में वह घिसती गई। अब वह केवल रंगीन ही नहीं हो गई वरन चिकनी भी हो गई थी। रंगीन साड़ी, ब्लाउज तथा रूमाल के बिना गोकुल की मां बाहर नहींं होती थी। जब कभी डाक बंगले में कोई अफसर आता, उस दिन उसकी चमक- दमक और
बनठन का क्या कहना।
  वह डिपो वाला साहब अधेड़ उम्र का था। उंचा- पूरा हट्टा- कट्टा लेकिन स्वभाव का मिलनसार था। वह हर इतवार को डाक बंगले में आकर ठहरता, और आसपास के गांव में दौरा कर फिर शाम को लौट आता था, गोकुल की मां उस दिन खूब परिश्रम करने के बाद भी हताश नहीं होती थी। खाना बनाती, साहब को नहलाती और खाना पीना निपटाकर साहब के पजामें, तौलिया लेकर पास के नाले में साफ कर आती जिस कमरे में डिपो वाला साहब दोपहर या रात्रि में विश्राम करते गोकुल की मां उस कमरे को सजाकर रखती थी। जब कभी वह आदम आईने के सामने होकर गुजरती घुम- फिर कर अपना शरीर का निरीक्षण कर लेती थी। हवलदार के सबक के कबूतर तब कहीं उड़ते नजर आते थे।
   साहब के खुशबूदार साबू से वह स्वयं नहाती और साहब की धेाती पहनकर अपनी साड़ी साफ करती। उस दिन वह नहा- धोकर डाक बंगले के आईने में ही बाल ठीक करती थी।
  रात्रि में साहब को खाना परोसती। बचा- खुचा गोकुल और वह मिलकर खाते थे। काम- धाम से निबटती तो सीधे साहब के पास जा बैठती। बहुत रात तक साहब से बात- चीत करती, तब तक गोकुल की आंख लग जाती थी। मां उस पर एक चादर डालकर निश्चित हो जाती थी। बातचीत करते- करते साहब और गोकुल की मां को इशारो में जम्हाई आने लगती थी। डाक बंगले का मुख्य दरवाजा अकस्मात बंद हो जाता था।
  आधी रात में गोकु ल की नींद उचट जाती तो वह हड़बड़ा कर देखता था कि कन्डील पूरी तरह नहीं बुझा हैं। पास ही साहब और उसकी मां एक ही बिस्तर में सोए पड़े हैं। गोकुल तुरंत आंखे मुंद लेता और हड़बड़ा कर सोने का उपक्रम करता।
  नाक भी बजने लगती थी किन्तु उसके बाद सुबह होने तक गोकुल के कान खड़े के खड़े रहते। आंखे यूं ही मुंदी होती थी और सुबह हो जाती थी।
  गोकुल ने इसके बाद आंख मुंदकर सो जाना, नाक घुटेरना और कान खड़े रख कर नींद लेना पूरी तरह सीख - पढ़ लिया।
  अब तो गोकुल स्वयं ही चौकीदार हैं। उसे मालूम है कि उसकी 25 वर्ष की तमाम अवस्था, इस डाक बंगले की हैं।  गोकुल की पत्नी सुंदर है। उसकी बूढ़ी सास उसे खूब प्यार करती है। गोकुल की मां अब बूढ़ी है। वश नहीं चलता नहीं तो पतोह को वह परदे में रखती। गोकुल को वह आज भी डांट देती है। रात बहुत देर तक जागने से उसे मना करती है। अब उस परिवार के सभी लोग सरकारी खोली में सुख की नींद सोते हैं। गोकुल अब सचमुच में गहरी नींद सोता है। नाक घुटेरता है। बेसुध रात भर उसकी बूढ़ी माँ भी।

  • पता - श्रीमद् भागवत आश्रम, राजिम, जिला - रायपुर [ छत्तीसगढ़ ]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें