इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 22 जून 2013

मन फागुनी हे आज संगी



  • आनंद तिवारी पौराणिक 

महर - महर अमरईया महकै
बही - भुतही कस कोइली कुहकै
        लाली परसा, अंगरा कस दहकै
        सरसों पिंयर - पिंयर झलकै
        मातै नंगारा साज संगी
        मन फागुनी हे आज संगी।

    बाजै झांझ, मंजीरा, मिरदंग
        झूमत हे सब फाग के संग
        पिचकारी भर छींचय रंग
        गुलाल उड़त हे, होवत हे हुरदंग
    भांग के मस्ती चघगे, नइये सरम - लाज संगी
        मन फागुनी हे आज संगी

गाल के लाली तोर कमल पाइस कइसे
    होंठ के चटख रंग चंदैनी गोंदा लाइस कइसे
    जंगल भर बगरिस तोर पाँव के माहुर रंग
    चिरई - चरगुन तको झुमरगे,
    तोर पईरी के ठनझुन संग
    पधारे हे मतौना बसंत महराज संगी
        मन फागुनी हे आज संगी

मोर पीरा - पिरीत के संगी तिर म आ
    तन मन भांजय रंग तैं अइसन लगा
    छुट जाये दुनिया के सबो कच्चा रंग
    मीत - मया, जियत मरत नइ छुटय पक्का संग
    धरम, उमर, जात के वोहा,
    नोहय कोनो मोहताज संगी
        मन फागुनी हे आज संगी
  • पता - श्रीराम टाकीज मा्र्ग, महासमुन्‍द (छ.ग.)

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