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बुधवार, 19 जून 2013

सावन आगे


  • डां. जीवन यदु
बादर ऊपर, बादर छा गे।
        चल भइया, अब सावन आ गे॥
अब तरसे मन हा नइ तरसे,
रिमझिम - रिमझिम पानी बरसे,
अइसे लगथे अब किसान ल -
जइसे दाई थारी परसे,
कोंहड़ा ल हे गुड़ मा पागे।
चल भइया, अब सावन आ गे॥
        अलकरहा जब बिजली बरथे,
        घुड़ुर - घुड़ुर तब बादर करथे,
        बछरू दउँड़े पुछी उठाके -
        मनखे ऊपर ठाड़ अभरथे,
        इंदर हा जस गोली दागे।
        चल भइया, अब सावन आ गे॥
दउँड़े लागिन माड़े नरवा,
चूहे लागिन छानी - परवा,
कती - कती के काम ल देखे -
हवे जे मनखे हा एकसरूवा,
पल्ला मार के ढोंड़गा भागे।
चल भइया, अब सावन आ गे॥
        बादर आसो नइ हे लबरा,
        भरगे भइया खँचवा - डबरा,
        देखन डोली लगे लबालब,
        भुइँया हा हरियागे जबरा,
        नवा - नेवरनिन दुलहिन लागे।
        चल भइया, अब सावन आ गे॥
अनपुरना के जेमा बासा,
हे किसान बर ये चौमासा,
प्रकृति - पुरूष हा जेमा मिलथे -
इही हवे दुनिया के साँसा,
गजबे अक सपना सकलागे।
चल भइया, अब सावन आ गे॥
  • दाउ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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