इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 19 जून 2013

सावन आगे


  • डां. जीवन यदु
बादर ऊपर, बादर छा गे।
        चल भइया, अब सावन आ गे॥
अब तरसे मन हा नइ तरसे,
रिमझिम - रिमझिम पानी बरसे,
अइसे लगथे अब किसान ल -
जइसे दाई थारी परसे,
कोंहड़ा ल हे गुड़ मा पागे।
चल भइया, अब सावन आ गे॥
        अलकरहा जब बिजली बरथे,
        घुड़ुर - घुड़ुर तब बादर करथे,
        बछरू दउँड़े पुछी उठाके -
        मनखे ऊपर ठाड़ अभरथे,
        इंदर हा जस गोली दागे।
        चल भइया, अब सावन आ गे॥
दउँड़े लागिन माड़े नरवा,
चूहे लागिन छानी - परवा,
कती - कती के काम ल देखे -
हवे जे मनखे हा एकसरूवा,
पल्ला मार के ढोंड़गा भागे।
चल भइया, अब सावन आ गे॥
        बादर आसो नइ हे लबरा,
        भरगे भइया खँचवा - डबरा,
        देखन डोली लगे लबालब,
        भुइँया हा हरियागे जबरा,
        नवा - नेवरनिन दुलहिन लागे।
        चल भइया, अब सावन आ गे॥
अनपुरना के जेमा बासा,
हे किसान बर ये चौमासा,
प्रकृति - पुरूष हा जेमा मिलथे -
इही हवे दुनिया के साँसा,
गजबे अक सपना सकलागे।
चल भइया, अब सावन आ गे॥
  • दाउ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

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