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सोमवार, 24 जून 2013

गमछा के छोर में बंधाये कानून



  • दादूलाल जोशी ' फरहद '

पुनई जब भी अपने गांव के मेड़ पर खड़ी होती। तब दूध से भरी हुई धान की बालियों को देखकर उसका हृदय भी खुशियों से भर जाता। हवा के झोकों में झूमने वाली धाप की बालियों की तरह उसका मन भी लगता। झूमते हुए धान की फसल के बीच- बीच में, इक्के- दुक्के मकड़ी के गोल जाले भी दिखाई दे जाते थे, जो कि सुबह की सुनहरी धूप में चमकने लगते। जाले के ठीक बीचों- बीच शिकार की घात में,
ताक लगाये बैठी मकड़ी भी झूलतीर हुई सी प्रतीत होती थी। मकड़ी के जाले को ध्यान से देखने पर पुनई को लगता था कि मकड़ी के जाले से उसकी जिन्दगी का कोई हिस्सा मेल खाता है। उसे लगता था कि वह जाले के बारे में कुछ सोच सकती है, कुछ बोल सकती है। लेकिन क्या? कैसे? इसे वह ठीक से समझ नहीं पाती थी। वह समझना भी नहीं चाहती थी। यह तो उसके मन में एक पल के लिए उभरता और मिटता था।
  पुनई पढ़ी लिखी नहीं थी लेकिन प्रकृति की भाषा से भी अनभिज्ञ नहीं थी। बावजूद इसके वह किसी खास विचार को किसी खास अन्दाज में व्यक्त नहीं कर पाती थी। उसे इन सबसे कोई मतलब भी तो नहीं था
वह तो बस इतना जानती है कि महीने भर में, धान की फसल पक जायेगी और उसके बाद? ........ उसके बाद उसके चार महीने की खुराक घर में होगी। कुछ अनाज बेचकर अपनी बेटी मानवती को उसके ससुराल पहुंचा देगी। दामाद को समझायेगी। मनायेगी बरी बिहाई औरत को निभाओ। विघ्न मत करो। जब वह मानवती को पहुचाने जायेगी तब दामाद के लिए चार हाथ का गमछा जरूर ले जायेगी। उससे वह खुश हो
जायेगा और उसकी बेटी को रखने के लिए तैयार हो जायेगा। मानबती को दो महीने पूर्व उसके पति ने बात- बात के झगड़े में घर से निकाल दिया था। मानबती अपनी मां के पास आ गई और अब तक टिकी हुई
हैं इस बीच उसका दामाद उसकी बेटी को लेने नहीं आया।
  काहे को झगड़ना। चार दिन की जिन्दगी है। पति पत्नी को मेल जोल से रहना चाहिए। ऐसा ही कुछ अपने दामाद से बोलेगी उसके हाथों में कुछ रूपये और गमछा धरा देगी। वह जरूर खुश हो जायेगा। साल दो साल में उसकी बेटी के एक दो बच्चे हो जायेंगे। फिर सब टंटे टूट जायेंगे फिर किसे पड़ी है लड़ने झगड़ने की ?  यदि ऐसा हुआ तो यह जमीन भी बेटी कें नाम कर देगी। उसका क्या है ? रोज कमाना, रोज खाना। बिना मेहनत खाने - पीने और जीने में कोई मजा नहीं है। दामाद बेटी सुखी रहें ... बस किसी तरह बाकी के दिन कट ही जायेंगे।
कुछ इसी तरह खेत के मेड़ पर खड़ी होकर पुनइ सोचा करती थी। सोचती क्या थी ? फसल के बीच - बीच में छाये हुए मकड़ी के जाले की तरह वह भी सपनों के जाले बुनती थी। इतनी सी बात तो थी जिसे वह व्यक्त नहीं कर पाती थी।
पुनई विधवा है। बहुत साल पहले उसका पति बीमारी में चल बसा। बहुत उपचार करवाया मगर बीमारी में सारी पूंजी तो लूट गई मगर वह अपने पति को नहीं बचा पाया। तकलीफ क्या थी ? महज सिर और गले का दर्द। एक दिन संध्या समय अचानक सिर दर्द उठा। फिर टप - टप करके गले में भी दर्द उठा। दर्द बढ़ता ही गया। उसके गांव के डाक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में ले जाने के लिए कहा। वहां ले जाने के लिए उसने गांव के कुछ लोगों को इकटï्ठा किया। अकेली जान कहां - कहां दौड़ती ? फिर हिम्मत नहीं हारी। सब तैयारी कर बैलगाड़ी में पति को लेकर अस्पताल की ओर चल पड़ी। इधर उसके पति के सिर और गले का दर्द बढ़ रहा था उधर रात भी आगे सरक रही थी। इस सरकने में उसका कालापन और अधिक काला हो जाता था। ठीक पुनई के दुख की तरह। पुनई अंधेरापन से बहुत चिढ़ती थी। यह अंधेरापन चाहे रात का हो या उसके जीवन के दुख का हो। उसे हमेशा घुटन सा अनुभव होता था। वह छटपटाने लगती थी कालेपन की जद से बाहर निकलने के लिए। उसका जी होता था कि अपने दोनों हाथों से गला दबा दें इस अंधेरे और उसके कालेपन का। या फिर अपनी दोनों हाथेलियों को इतना रगड़े कि उससे चिनगारियां छूटने लगें।
  सहसा उसके कानों में हिचकी जैसी आवाज सुनाई दी। यह उसके चैतु के गले से निकली आवाज थी। वह तुरंत पास आई और देखा। चैतू के मुँह से पानी जैसा कुछ निकल रहा है। चैतु बोल नहीं पा रहा था। इशारे से पुनई को बताया कि उसकी सासों के आने जाने में कठिनाई हो रही है। पुनई उसके गले की मालिश करने लगी। चैतू ने बड़ी कातर नजरों से पुनई की ओर देख रहा था। उसकी आँखों से दो बूंदें ढुलक पड़ी। बड़ी बेबस थी ये बूंदें। पुनई ने साथ चल रहें सेखवा के हाथ से कंदील छीनकर उसकी लौ को और तेज कर दिया। कंदील की पीली रोशनी में उसने देखा, उसके पति का सिर एक ओर लुढ़क गया है। कांपती हुई हथेलियों से पुनई ने चैतू के बदन को छूकर देखा। वह तो ठंडा होता जा रहा था।
  अभी शहर की आधी दूरी तय नहीं हो पाई थी। एक घंटा और लगता शहर पहुंचने में। किन्तु अब रास्ता नापना फालतू था। सेखवा ने गाड़ी रूकवा दी। साथ चल रहे सभी लोगों ने वापस लौटना ही उचित समझा। बैलगाड़ी की दिशा बदल गई। साथ के सेखवा, परसा और मनसा के कदमों की चाल बदल गई। कंदील की रोशनी की रंगत तो कब की बदल चुकी थी। जब सभी लोगों और सभी वस्तु में परिवर्तन हो चुका था तब पुनई कैसे यथावात रह सकती थी? सबसे अधिक और स्थाई तौर पर वही बदल गई थी। सब खामोश थे किन्तु उस अंधेरी रात में केवल पुनई की चीत्कार की सुनाई दे रही थी।
 चैतू को गुजरे हुए एक अर्सा बीत गया है। अब तो पुनई उस दुख को भूल गई है। भूलती क्यों नहीं? उसकी बेटी मानबती उसका सहारा जो बन गई है। उसकी वही एक अकेली संतान हैं। पन्द्रह बरस की छोटी उम्र में ही पुनई ने उसका विवाह कर दिया था। एक साल बाद उसका यह सहारा भी उसे छोड़कर ससुराल चली गई। पुनई अकेले रह गई। दिन भर दूसरों के खेतों में मेहनत मजदूरी करके कुछ रूपये लाती और उससें ही गुजारा करती। धीरे धीरे दूसरों की मजदूरी से उसका जी ऊबने लगा था। वह सोचती कि यह रोज- रोज दूसरों के यहां मजदूरी करने के बजाय अपने ही खेत में मेहनत करती तो कितना अच्छा होता। कितना सुकून मिलता उसे। लेकिन उसके पास खेत कहां था? जो थोड़ी बहुत जमीन थी वह तो चैतू के इलाज में कब की बिक चुकी थी। केवज पच्चीस डिसमिल का एक टुकड़ा ही बचा था। वह भी सेखवा के खेत से लगा हुआ था इसलिए सेखवा को ही रेगहा में दे देती थी। परन्तु इतनी छोटी धरती पर खेती करना न करना एक बराबर था। अपनी जमीन पर अपना पसीना टपकाने के लिए पुनई का जी जब तक मचल उठता था। वह सोचती कि यदि कहीं से पैसा मिल जाता तो एक टुकड़ा जमीन खरीद लेती। लेकिन रोज कमाने खाने वालों के पास हजारों रूपये कहां से आयेंगे? वह मन मसोस कर रह जाती।
एक साल... दो साल... तीन साल.... अनमोल समय के तीन गट्ठर लुढ़कते हुए न जाने किस अनन्त में विलीन हो गये। पुनई की जमीन रखने की साध, साध ही रह गई थी। यह साध उसके जीवन में एक ख्वाब बन कर रह गई होती हमेशा के लिए लेकिन इन्हीं दिनों गांव में खुसफुसाहट होने लगी। लोग दबी जुबान से कहते थे कि सरपंच ने परती जमीन के दो एकड़ अपने खेत में मिला लिया है। यह बात तीन साल पहले की है। आज तक किसी को मालूम नहीं थी। मालूम भी नहीं होती यदि रमेशर कोटवार एक दिन सरपंच और पटवारी की गुफ्तगूं नहीं सुनता। रमेशर कोटवार के जरिये ही यह बात सब लोगों में फैल गयी। फिर क्या था, कुछ दिन बाद कोटवार ने भी पांच सात डिसमिल का एक टुकड़ा काटकर खेत बनाना शुरु कर दिया। कोटवार को देखकर दो चार किसानों ने भी अपने - अपने खेत से लगी चरोखर भूमि को कुतर - कुतर कर खेत में मिलाना शुरु कर दिया।
पुनई इन सब से बेखबर थी। एक दिन सेखवा ने आकर कहा - काकी, सबे झन परिया ला हथियावथे। तहूं हा अपने टेपरी ला बढ़ा ले ना। बुढ़ापा के सहारा हो जाही।
- कते परिया के बात करथस बाबू। पूनई ने आश्चर्य से पूछा।
- अरे उही परिया काकी, जेन मा गांव के जानवर चरथे।
- ओ हर तो सरकारी जमीन आय बाबू। कहूं सरकार जान परही त ओखी के खोखी हो जाही। पुनई ने आशंका व्यक्त की।
- जम्मों झन तो इही बुता करत हे। सरपंच हा संवागे दू तीन एकड़ जमीन ला दबोच ले हे। देखे हावस नहीं कतेक बढ़िया फसल होथे तेला ? सरकार हमर ऊपर कुछू करही त सरपंच के ऊपर घलो कार्यवाही करही। सेखवा ने समझाते हुए कहा।
- सरपंच तो सरकार के आदमी आय बाबू। पैसा वाला घलो हे। कानून कछेरी ल गमछा के छोर मा गठिया के रेंगथे। वो हा बांच जाही। अऊ हम फंसगेन त छूटना मुस्कुल हो जाही। पुनई ने कहा।
- जब होही तब देखे जाही। अभी कतेक मार खुशी हन। हमर करा हवेच का ? सेखवा ने मानो फैसला ही सुना दिया। इस बार पुनई चुप रही। वह सोच रही थी। सेवता वहां से चला गया। सेखवा पुनई का रिश्तादार नहीं था। दोनों के मकान आसपास थे। इसलिए सुख - दुख में एक दूसरे के काम आते थे। रात भर पुनई सपने में लहलहाती फसलों वाला स्वयं का खेत देखती रही। उसे अपनी साध पूरी होती हुई दिखाई दी। दूसरे दिन से पुनई ने भी अपने पच्चीस डिसमिल के टुकड़े को खोद - खोद कर परिया की ओर बढ़ाना शुरु कर दिया। वह रोज मजदूरी करके लौटती और एक दो घंटे उस टुकड़े पर कुदाल चलाती। चीड़े उखाड़कर मेड़ बनाती। बड़े धैर्य और लगन के साथ मेहनत करती रही। एक साल में ही उसका खेत डेढ़ गुना लम्बा हो गया था फिर आया आषाढ़ का महीना। वर्षा की गरमी से तपी हुई शुष्क धरती के सीने में तरलता पसर गई। इस तरलता को पुनई ने भी अपने ह्दय में पहली बार महसूस किया। गांव के एक किसान के पास अपनी पीतल की गुंडी और हाथ के चांदी के कड़े गिरवी रखकर धान और खाद ले आई। एक किसान से किराये पर हल चलवाया और बो दिया धान। उस वर्ष उसकी फसल अच्छी नहीं थी तो खराब भी नहीं थी। इतना लाभ जरुर हुआ कि उसने अपनी गिरवी रखी चीजें छुड़ा ली। दूसरे बरस की मेहनत से खेत और अच्छा बड़ा बन गया। प्रत्येक वर्ष फसल में बढ़ोतरी होने लगी। तीन चार साल बीत गये। खेत सज गया था। अन्य लोगों के खेत भी लम्बे चौड़े और सुन्दर बन गये थे। यह सब देखकर सरपंच की नीयत डोल गयी। जिन सात आठ लोगों ने सरकारी जमीन पर अपने खेत बढ़ाये थे उन सबकी जमीनें एक ही स्थान पर थीं। इन उपजाऊ खेतों को देखकर सरपंच का जी कुलबुलाने लगा। उसने मंसूबा बनाया। यदि इन सबको बेदखल कर दिया जाये तो इन खेतों का वह मालिक बन सकता है। एक विचार यह आया कि पंचायत में इस प्रकरण को रखकर निर्णय लिया जाय। लेकिन इसमें खतरा था, पंचायत के पंच ही उसके विरोधी बन सकते थे। उसके द्वारा हथियाये जमीन की भनक अधिकांश पंचों को लग चुकी थी। फिर आने वाले वर्ष में चुनाव भी है। अधिक बवाल होने से वह सरपंच पद जीत नहीं पायेगा। अत: दूसरे उपाय पर वह विचारने लगा।
बरसात के दिन फिर आ गये थे। किसानों ने बीज बोये। पर इस साल की बरसात दुखदाई साबित हुई। पौधे दो फीट के ही हो पाये थे कि आसमान से बादल गायब हो गये और ऐसे गायब हुए कि महीनों तक दिखाई नहीं दिये। अब हरी भरी फसलें जलनी शुरू हो गयी थीं। पुनई की रातों की नींद उड़ गई। बड़ी मुश्किल से दो बार खेत में बीज डल सकी थी। इस गांव में तथा आसपास सिंचाई की सुविधा नहीं थी। कुछ बड़े किसान  जिन्होंने कुंए एवं नलकूप बनवाये थे। वे तो सिंचाई कर लिए किन्तु छोटे एवं गरीब किसानों के पास कोई साधन नहीं था। किसानों में हाहाकार मच गया। पुनई ने हिम्मत से काम लिया। उसके खेत से कुछ दूर एक मुरम खदान थी। वहां एक गढ्ढा बन गया था जिसमें बरसात का पानी अब भी भरा हुआ था। पुनई रोज सुबह चार बजे उठती। मटका उठाती और चल देती उस गड्ढे की ओर। वह मटका में पानी भर कर लाती और अपने खेत के प्यासे पौधों की जड़ों में उड़ेल देती। सूरज निकलने के पहले तक वह पानी सींचती। सप्ताह भर की मेहनत से उसके खेत की जमीन तर हो गई। उसके आसपास के खेतों में भी इसी तरह पानी डालकर फसलों की रक्षा की। खेतों में किसी भी तरह से पानी डालकर सिंचाई करने वाले किसान खुश थे कि पूरी न सही कुछ तो फसल हाथ लगेगी। लेकिन उन किसानों का हाल बुरा था जिनके पास सिंचाई का कोई भी साधन नहीं था। उनकी फसलें आधे से अधिक नष्टï हो गई थीं। अखबारों में दुकाल की चिन्ता छप रही थी। राजनीतिक पार्टियां पूरे इलाके को अकाल प्रभावित क्षेत्र घोषित करने की मांग कर रही थी। सरकार किसानों और अन्य ग्रामीण जनता के लिए अधिक से अधिक सुविधाएं और राहत कार्य जुटाने का वायदा कर रही थी। इन सब चर्चाओं से बेखबर पुनई आज भी अपने खेत में पानी डालने गई थी। सुबह के सात बजे तक पानी सींचा उसने। उसके बाद खेत में उगे घास और करगा को उखाड़ कर खेत से बाहर करने लग गई। सूरज कब सिर पर चढ़ने का प्रयास कर रहा था, इसका उसे भान नहीं था। वह अपने काम में लगी रही। अचानक बहुत से लोगों की आवाजे उसके कानों में पड़ी। उसका ध्यान भंग हो गया। उसने सिर उठाकर देखा। गांव की ओर से आठ - दस आदमी आ रहे थे। उनके बीच में एक शहरी बाबू भी दिखाई दे रहा था। पुनई की समझ में कुछ समझ नहीं आया। काफी पास आने पर पुनई ने पहचाना। सरपंच और पंचों के साथ कुछ अन्य किसान भी थे किन्तु बीच के शहरी बाबू को वह नहीं पहचान पाई। उसने उसे कभी देखा नहीं था। पहचानती कैसे ? वो तो बाद में मालूम हुआ कि वह नायब तहसीलदार है। वह भी सरपंच के द्वारा बताये जाने पर। सभी लोग खेत के मेड़ पर आकर खड़े हो गये। नायब तहसीलदार ने वहीं से आवाज लगाई - ये बाई, तुम्हारा क्या नाम है ?
- मोर नाव पुनई हे बाबू। पुनई ने बताया।
- ठीक है, कोटवार, बाकी खेत वालों का क्या नाम है, जरा बताना । तहसीलदार ने कोटवार से कहा। कोटवार ने एक - एक करके सबका नाम गिना दिया। नायब तहसीदार ने सबके वल्दियत जाति और नाम लिखा। फिर खेतों का चक्कर लगाने लगा। पूरे खेतों को घूम लेने के बाद उसने सबको इकट्ठा किया और आदेश दिया - देखो, तुम लोगों ने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किये हो। यह जुर्म है। तुम सब जमीन खाली कर दो।
- महराज, ये जमीन ला हम चार साल ले जोतत बोवत हवन। फेर अइसन कभू नहीं होय रिहीस। परसा ने थोड़ा सा डरते हुए कहा।
- उस समय जानकारी नहीं थी। फिर सरकार से कोई आदेश नहीं आया था। इसलिए बच रहे थे। अब अवैध कब्जा हटाने शासन ने मुहिम चलाया है तो कब्जा छोड़ना पड़ेगा।
- अभी तो फसल खड़ी है। कइसे छोड़ देबो। अड़बड़ मेहनत करे हन। इस बार मनसा ने कहा।
- तुम लोग यदि सीधी तरह नहीं मानोगे तो तुम्हारी फसल को जानवरों को चरवा देंगे। नायब तहसीलदार ने कहा। उसकी बातें सुनकर पुनई को फांसी की सजा सुनाने जैसी लगी। उसने अन्दर ही अन्दर दुख और क्रोध को पीते हुए अपनी जुबान को एकदम दयनीय बनाकर कहा - महाराज, अभी अकाल के समय हे। फसल ला मत चरवाव। फसल ला काट लेन देव फेर जउन मन म आय तऊन कर लहू।
- ऐसा नहीं हो सकता। तुम्हें अभी इस जमीन को छोड़ना पड़ेगा। हम परसों फिर आयेंगे। तब यह जगह साफ मिलनी चाहिए। इतना कहकर नायब तहसीलदार, पंच सरपंच के साथ लौट गया। सभी लोग दुखी थे। पुनई काफी बेचैन थी। उसे बार - बार याद आ रहा था, उसका पानी सींचना। रात में उठ - उठकर गड्ढे का पानी सींचा था।  तब कहीं फसल, फसल कहलाने लायक बनी थी। दो बार बुआई करने के बाद वह अन्जान होने जा रहा था। अकाल के इस कीमती फसल को सरकार यूं चरवा देगी ? जैसे कोई आलतु - फालतू घास हो। पुनई तीन दिनों तक ठीक से खाना भी नहीं खा सकी थी। उस फसल पर न केवल उसका बल्कि उसकी बेटी मानबीत का सुखमय जीवन आधारित था।
बेदखली की चपेट में आने वाले सभी दस लोगों ने एक बैठक ली और सरपंच के पास जाकर कुछ करने के लिए निवेदन किया। किन्तु सरपंच ने कहा - अरे भइया, सरकारी चीज पर हाथ मारना कानूनन जुर्म है। तुम सब क्यों झंझट में पड़ते हो ? छोड़ दो जमीन।
इन लोगों को विश्वास हो गया कि सरपंच उनकी सहायता करने वाला नहीं है। वे लौट गये।
तीसरा दिन भी आ धमका। पुनई अपने खेत के मेड़ पर बैठी हुई विचार कर रही थी। बस आठ - दस दिन की बात है, फिर हंसिया गिरेगा फसल पर। फिर मिंजाई होगी। उसके बाद उसकी बेटी अपनी ससुराल चली जायेगी। वह भी कुछ दिन बेटी के पास रहकर आयेगी। पुनई स्वप्र लोक में खो गई थी। उधर तीन दिन पहले वाला नायब तहसीलदार का काफिला आया और मनसाराम के खेत में जानवरों को छोड़ दिया था। चर्र ... चर्र ... दस बीस जानवर मनसा के खेत को चर रहे थे। मेड़ पर बैठा मनसा फूट - फूट कर रो रहा था। पुनई का ध्यान टूटा। वह स्वप्र लोक से यथार्थ की धरातल पर आ गई। उसकी नजरें मनसा के खेत पर खड़े हुए नायब तहसीलदार पर पड़ी तो उसका दिल धकधका उठा। धीरे - धीरे एक खेत से दूसरे खेत की फसल को चराते हुए नायब तहसीलदार अपने काफिले के साथ आ रहे थे। अब जानवर सेखवा के खेत की फसल को चर रहे थे। उसके बाद पुनई के खेत की बारी थी। पुनई का कलेजा मुंह को आने लगा। वह दौड़कर नायब तहसीलदार के पास गई और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती हुई बोली - दया कर महराज, अड़बड़ तकलीफ म धान ला बचाय हंव। नानकुन लइका कस ऐला पाले पोसे हौं। मत चरावावौ ए बखत के फसल ल काटन देव ताहने छोड़ देबो ये भुईयां ला।
- सभी ऐसा ही कहते हैं। तुम लोग मानने वाले तो हो नहीं। इसी तरह तुम लोगों को सबक मिलनी चाहिए।
नायब तहसीलदार ने दृढ़ता पूर्वक कहा। सेखवा की फसलें भी पूरी तरह चरा दी गई। अब पुनई के खेत में जानवरों को हांक दिया गया। जानवर पूरे खेत में फैल गये थे और पौधों को रौंद - रौंद कर चर रहे थे। पुनई ने आंसू भरी आंखों से देखा। उसके धान की अधपकी दूध भरी बालियों को जानवर कुतर - कुतर कर खा रहे थे। उसे लगा कि उसका खेत नहीं बल्कि उसका ह्रïदय ही कुतर - कुतर कर खाया जा रहा है। वह पिनें चुभाने जैसी पीड़ा से तिलमिलाने लगी। उसने कहा - साहेब, सरपंच हा घलो दू एकड़ सरकारी जमीन मा खेत बनाये हे। ओकर खेत के फसल के का करहू।
- यह झूठ है। सरपंच ने कोई सरकारी जमीन पर खेत नहीं बनाया है।
अचानक पुनई का क्रोध उफान पर आ गया। उसने कहा - मंय कहत हंव वो झूठ आय। सरपंच पांच साल ले सरकारी जमीन म खेती करत हे। यहू झूठ ये। पुनई का क्रोध बढ़ता चला गया। उसने नायब तहसीलदार का कालर पकड़ लिया और हरामजादा... रोगहा ... ले कब्जा कहते हुए चार पांच थप्पड़ नायब तहसीलदार के गाल में जड़ दिया। इस अप्रत्याशित हमले से नायब तहसीलदार हक्का - बक्का रह गया। उसने अपने जीवन में नहीं सोचा था कि एक अशिक्षित ग्रामीण महिला उसे तमाचे मार देंगी अन्य लोगों के जैसे होश उड़ गये थे। कोटवार ने दौड़कर पुनई को रोका और शांत किया पर पुनई शांत नहीं हुई। वह बड़बड़ाती हुई दौड़कर खेत में गई और सभी जानवरों को हांक कर खेत से बाहर निकाल दी।
तीन घंटे में पुलिस आ गई। थानेदार ने दस लोगों को मुजरिम बनाया। जिनमें पुनई प्रमुख थी। थानेदार आश्चर्य में डूबा सोच रहा था - आखिर एक सीधी सादी ग्रामीण महिला ने नायब तहसीलदार को तमाचा क्यों और कैसे मारी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। उसने पुनई से पूछा - क्या सचमुच तुमने नायब तहसीलदार को तमाचा मारा ?
- हां साहब।
- क्यों मारा ?
- वो ह हमर खेत के ठाढ़े फसल ल चरात रिहीस। साहेब, रात दिन जांगर टोर के खेत ल बनाये रेहेंव। इही बछर दू बेर धान बोयेंव। ओकर बाद म पानी नई बरसिस। मंय एक एक बूंद अपन खेत म छींच के फसल उगायें हंव। कैसे देख सकहूं ओकर बरबादी ...। साहब, मोला जेल भेज देव चाहे फांसी म चढ़ा देव। मैं अपन मेहनत के बरबादी ल नई देख सकव। अचानक पुनई का क्रोध फिर से फनफना उठा वह फिर नायब तहसीलदार की ओर दौड़ी। थानेदार ने देखा। उसे लगा - पुनई के शरीर से कई पुनई रुपी आकृतियां निकल रही है। पुनई नायब तहसीलदार को पीटती रही और थानेदार तथा ग्रामीण नजारा देखते रहे ...।
  • ग्राम - फरहद ( सोमनी ) जिला - राजनांदगांव (छग )

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