इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

अभागिन




- डॉ. रामशंकर चंचल  -

गगनचुम्बी अट्टालिकाओं के बीच झुकी कमर वाली वृद्धा के समान उसकी जर्जर कुटिया 15 वीं सदी की प्रदर्शनी सी लगती है। देखने वाले कभी - कभी उस अटपटे बेमेल कुटिया पर व्यंग्य कस देते। उस दिन की ही बात है जब कालेज गर्ल्स उधर से निकली तो एक ने उस उटज की ओर इंगित करते हुए फब्ती कस दी - अरी,मीना बता सकती हो दुनिया में कितने आश्चर्य है।
सात कहकर मीना ने अपनी आँखें फाड़कर प्रश्र खड़ा कर दिया - क्यों ? कुमारी जायसवाल तो जैसे उत्तर पहले से जानती थी - नहीं आठ, देखो यह बाबा आदम के जमाने की झोपड़ी। अरे बाबा यह झोपड़ी तो ऐसी लगती है जैसे किसी ने शहर के आंचल में गाँव बाँध दिया हो। सभी छात्राएं खिलखिला पड़ीं।
उनकी अट्टहास राधा के कानों से होकर सीधा दिल में बैठ गया। उसका दिल रो दिया - तुम हंसती हो,हंसो, खूब हंसों। बंगलों में रहने वाली चुलबुंलियों, तुमने किसी गरीब का जीवन पास से देखा है ? कभी जाकर उसके आँसू पोछे हैं ? नहीं, तू ऐसा नहीं कर सकती। तुमको ऐसा पाठ ही नहीं पढ़ाया जाता होगा। एक आह भर कर उसने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की, भगवान यदि एक गरीब की प्रार्थना सुनने को तू तैयार हो तो यही कहूंगी कि दुनिया में किसी दुश्मन को भी वैधव्य मत देना।
कितनी करुणा थी उसकी प्रार्थना में, परन्तु उसकी प्रार्थना पर उस दिन भाग्य ठहाका मारकर हँसा था। अदृष्य के उस व्यंग्य को वह भोली नारी राधा नहीं समझ सकी।
इसी दशहरे की बात है - अपनी कुटिया के आँगन में राधा एक जीर्ण शीर्ण चटाई पर बैठकर रंगीन भीड़ देख रही थी। बड़ी उत्सुकता से उनके चेहरे मोहरे देखने लगी। खुशी से फूली - फूली जनता की जमात को देखकर वह एक बार मुस्करा उठी। उसकी बड़ी - बड़ी आँखें गोरी - गोरी अंगुलियों में पकड़े एक सादी धोती के घूँघट में से चमकने लगी।
उसने अनेक माताओं ओर पिताओं को देखा जो अपने बच्चों को सुन्दर नवीन एवं रंगीन वस्त्र पहनाकर दशहरा मैदान की ओर बढ़ रहे थे। बच्चों के हँसमुख चेहरे देखकर वह गुदगुदा गयी। इसे जीवन कहते हैं। एक दीर्घ नि:श्वास निकल पड़ी उसने ऐसा अनुभव किया जैसे उसने जिन्दगी को दूर से देखा है पर उसका स्पर्श नहीं कर पायी। किसी प्लेटफार्म पर खड़े लोकल यात्री की तरह उसने मेल की तूफानी गति से अच्छी जिंदगी को भागते हुए देखा ही है। वह जल्दी - जल्दी जाती हुई भीड़ को इस तरह देख रही है जैसे कोई दार्शनिक किसी महत्वपूर्ण बृहत पुस्तक के पृष्ठों का सिंहावलोकन कर रहा हो। उसने देखा अमीरों के अरमान तो आकाश के तारे भी तोड़ते हैं पर वह अभागिन तो शारदीय शंका में भी धरती के कंकड़ गिनती है।
भीड़ धीमी हुई। राम - लक्ष्मण की सवारी निकली। तुरन्त उस मूर्तिवत श्रद्धा ने हाथ जोड़कर स्नेह सिक्त दो आँसू अपने कपोल पर लुढ़का दिये। हरमोहन, ब्रजकिशोर एवं लीला तीनों ही पड़ोस के आँगन से अपनी माता के पास आ चुके थे और इस तरह जुलूस समाप्त हुआ तो हरमोहन ने राधा से कहा - माँ, मैं भी राम बनंूगा। लक्ष्मण मैं बनूंगा माँ। बिरज कैसे चुप रह सकता। माँ मानो यह सब कुछ सुनकर निहाल हो गयी। राम - लक्ष्मण की यह जोड़ी अमर हो बेटा - कहते ही राधा की आँख के कोरो में अश्रु छलछला आये।
और मैं क्या बनूंगी माँ, लीला ने राधा का आँचल पकड़ लिया। तुम, तुम ... सी ... दुल्हन बनोगी, दुल्हन। दुल्हन तो सीता जैसी एक नारी होती है बेटी जो राम जैसे देवता से ब्याह करती है।
- अच्छा फिर ?
- फिर वह ससुराल जाती है।
- मैं भी ससुराल जाऊंगी।
राधा ने लीला को दुल्हन कह तो दिया पर दुल्हन की कल्पना से उसका दिल हिल गया। उसने उसे छाती से चिपका लिया और रोने लगी।
- माँ, तुम रोती क्यों हो ?
- बेटी, तुम ससुराल जाती हो इसीलिए।
- अच्छा मैं ससुराल नहीं जाऊंगी बस। अब तो चुप हो जा।
लीला ने राधा के आँसू पोछ दिये।
- माँ, तू भी ससुराल मत जाना।
अबोध बालिका की यह बात सुनकर राधा के अधरों पर एक हल्की सी मुस्कराहट छा गयी पर जल्दी ही अदृश्य हो गयी। इस छोटी सी जान को मैं कैसे समझाऊँ कि  यही मेरा ससुराल है। पर क्या इस मिट्टी के टूटे घर को ससुराल कहते हैं। क्या आँखें फाड़ कर डराने वाले इस छप्पर को ससुराल कहते हैं ? क्या इन फटी - फटी दीवारों को  ...? मैं ससुराल में होती तो बच्चों तुम्हारा दशहरा चीथड़ों में नहीं झाँकता और तुम्हारी दीवाली ... ओह, बीस दिन ही तो है दीवाली के।
अबकी बार मैं अपने पेट पर पट्टी बाँधकर भी अपने लाड़लों के लिए दीवाली मनाऊंगी। ढेर सी मिठाइयाँ लाऊंगी। पड़ोस के बाबू रामचरणदास के घर काम करने जाऊंगी पर उस दिन नीना ने कहा था - उस पर विश्वास मत करना राधा इसीलिए मैंने काम करने से मना कर दिया। मैं गरीब तो हूं पर अपनी दौलत कैसे बेच दूंगी, और कोई काम ढूंढ लूंगी।
अरे, घर में शक्कर नहीं। दीवाली पर शक्कर मिली भी तो बहुत कम। वह भी हम गरीबों तक तो कहाँ हाथ लगेगी। गेहूं भी तो नहीं। दीवाली में मक्का खिलाऊंगी बच्चों को ? नहीं एक बार तो आती है दीवाली साल में। सुनती हूं अमीरों के यहाँ रोज दीवाली होती है। देखा न उस दिन सेठ रामगोपाल के यहाँ सात मई को कैसा जलसा था। बाप रे, मैंने तो जिन्दगी में न ऐसा बंगला देखा न ऐसी रोशनी न ऐसा जलसा जमघट।
यह इन्द्रपुरी है। सुना है यहाँ एक से एक बढ़कर आलीशान कोठियाँ और बंगले हैं। क्यों न रामगोपाल सेठ के यहाँ जाकर बच्चों के लिए कुछ मांग लूं। उस दिन कहता था - राधा तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं है। तुम्हारे घर वाले मेरे यहाँ दस साल तक काम करते रहे। बड़े ईमानदार थे। पर मुझे तो उसकी भी आँखों में ऐसा ही दिखता था जो हो पर मैं किसी से भीख तो कभी नहीं मांगूंगी। भीख माँगकर दीवाली तो भिखारिन भी मना लेती है। न, मुझसे ऐसा न होगा। मैं घर की लाज नहीं जाने दूंगी। जहाँ भी काम मिलेगा, कर लूंगी। साँच को आँच नहीं।
और सचमुच राधा ने जी तोड़कर काम किया। साथ ही उसने एक जून भोजन करके बचत भी शुरु कर दी। उसकी ऐसी हालत देखकर एक दिन पड़ोसिन ने उससे पूछ ही लिया- आजकल बहुत दुबली हो गई है। राधा, क्या चिन्ता लगी है तुझे। एकदम आधी हो गयी है, आधी।
राधा ने झूठमूठ ही बहाना कर दिया - दस बारह दिन  से हाड़ में बुखार रहता है गंगा माँ। खाना भी नहीं पचता। फिर दीवाली का कामकाज। लीपना, पोतना, रंग छापना ये करना वो करना। मरने की फुर्सत नहीं।
गंगा माँ मान गयी तो राधा फूली - फूली घर में आयी और मुँह पर हाथ धरकर अकेली हँसने लगी। वह उस दिन की प्रतीक्षा करने लगी जब हरमोहन बड़ा हो जायेगा। अरे दस साल की ही तो बात है। यूँ निकलते हैं। फिर तो जगमोहन नौकरी करेगा। ढेर से रुपये लायेगा और तब घूँघट निकालती हुई छोटी सी बहू छमक - छमक कर इस घर को आबाद कर देगी। तब वो सब मिट्टी सोना हो जायेगा।
दीवाली आ गयी। मंहगाई है, क्या करे। एक बरस में तो आयी है दीवाली रात को बच्चे सोये तो दीवाली के सपनों में खूब  झूमें। लीला तो बिस्तर में से उठी वैसे ही हठ करने लगी - माँ, हम भी पटाखें फोड़ेंगे। बिरज तो राधा का आँचल पकड़कर घसीट ले गया आँगन तक। जा न माँ, मिठाई ला, मैं मिठाई खाऊँगा। हरमोहन बोला - माँ आज मैं नये कपड़े पहनूंगा, हाँ।
बिरज ने तो राधा को चेतावनी दे दी - माँ, मेरे लिए भी बुशर्ट लाना। बुशर्ट नहीं लायी तो तुझसे नहीं बोलूंगा। बच्चों का हठ राधा को बड़ा प्यारा लगा। इसीलिये तो कुछ देर वह कुछ नहीं बोली और केवल इच्छा करती रही कि वे बार - बार नये कपड़ों की, पटाखों की व मिठाइयों की माँग करें। आज राधा कंगाल नहीं है। आज के लिए तो वह धनवान माँ है। बाद में उसने हरमोहन की पीठ थपथपाकर, बिरज को चूमकर और लीला को दोनों हाथों में ऊपर उठाकर घुमाने लगी। हाँ - हाँ, सब लाऊगी। बेटा, तुम जो कहोगे वह लाऊंगी। बुशर्ट लाऊंगी, पेटीकोट लाऊंगी, खूब सारी मिठाई और ढेर सारे पटाखे लाऊँगी।
अरे हाँ, सस्ते अनाज की दुकान से गेहूँ लाना तो भूल ही गई। मालपुआ कैसे बनाऊँगी।
हरमोहन तू बिरज और लीला की देखभाल करना। मैं अभी आती हूं। माँ जल्दी आना, भूख लगी है देख न। मोती काका ने वहाँ तो खूब सारी चीजें बनाई है। गौरी और सज्जन तो सुबह से ही मिठाई खा रहे हैं। माँ, गौरी मुझे भी मिठाई दे रही थी। मैंने कह दिया - हम तुम्हारी मिठाई नहीं खायेंगे। हम मंगते थोड़े है।
- शाबास बेटा, अच्छा किया। अभी लाई तुम्हारे लिये। सब ले आती हूं।
राधा घर से इतनी फुर्ती से निकली जैसे एक से दस तक बच्चे गिनती लगाये और राधा बाजार से सब कुछ खरीदकर ले आये। हाँ, इससे बच्चों को बड़ा धीरज बंधा।
बाजार से दो बुशर्ट, एक पेटीकोट, कुछ मिठाई और पटाखे खरीदकर राधा सस्ते अनाज की दुकान पर जाकर क्यू में खड़ी हो गयी। दिन रात का परिश्रम फिर एक जून भोजन से कमजोरी और ऊपर से तेज धूप, राधा दो घण्टे में तो निराश हो गयी। घंटे पर घंटे निकलते गये पर हनुमान की पूंछ की तरह क्यू बढ़ता गया। क्यू में से कोई बोल उठा - अरे भाई, नम्बर आना कठिन है। जान - पहचान के लोग धड़ाधड़ ले रहे हैं और हम यूं ही मुँह ताक रहे हैं। राधा को पाँच घंटे हो गये। वह कल्पना करने लगी - बच्चे भूख से तिलमिला रहे होंगे। जैसे वह आवाज सुन रही थी। माँ कितनी देर हो गयी। तू तो कहती थी, मैं अभी आती हूं, माँ। गौरी और सज्जन तो दिनभर से मिठाइयाँ खा रहे हैं। हमको भी दे न। बहुत भूख लगी है माँ। उसकी आँखों से अश्रु झरने लगे। तेज धूप थी। सारे बदन में पसीना हो आया था। उसने देखा लाइन वहीं की वही हैं। वह घबरा उठी। पुन: कल्पना में डूब गयी। कल्पना के अन्तराल में भूख लगी है, माँ। अब नहीं सहा जाता। बच्चों की रोने चीखने की आवाज आने लगी कभी तो घर जाऊँगी इस आशा से उसकी आँखें चमक उठती। पटाखे लायी माँ, मेरा पेटीकोट, और मिठाई। माँ गौरी और सज्जन तो दिन भर से मिठाईयाँ खा रहे हैं। हमको भी मिठाई दे न। माँ ... माँ ... माँ ...।
धड़ाम की आवाज से क्यू में खलबली मच गयी। क्यू तोड़कर लोग राधा के चारों ओर इकट्ठे हो गये। राधा बेहोश पड़ी थी। उसके हाथ की मिठाई, पटाखे बिखर गये थे। आसपास दो नये बुशर्ट और पेटीकोट छिपरा गये। पुलिस आ पहुँची। लोगों ने नब्ज देखी। राधा क्यू छोड़कर भगवान के यहाँ इस जालिम जमाने की शिकायत करने चली गयी थी। शायद उसने तब भी यही कहा होगा - अभी आती हूं।
पर बिलखते हुए बच्चे अपनी प्यारी माँ की प्रतीक्षा करते रहे। उनके पटाखे नहीं फूट सके। हाँ, उनका भाग्य अवश्य फूटा परन्तु उसकी आवाज अमीरों की आतिशबाजी में सुनाई नहीं पड़ी।
  • पता- माँ, 145, गोपाल कालोनी, झाबुआ [म.प्र.]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें