इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

रविवार, 2 जून 2013

चलव रे संगी ...


  • घनाराम बंजारे
चलव  रे संगी जम्मों मिल के करी रे कमाई
ये माटी के सेवा कर के जिनगी ल बिताई
ये भूंइयां म जनम ले हर तेकर कर्जा ल चुकाई
चलो रे संगी .............।

    किसान के मेहनत म संगी झुम उठे संसार
    पियर - पियर सरसों दिखे हरा भरा खेती खार
    मेहनत कर कर के संगी करी रे कमाई
    चलव रे संगी ..............।

अरतता के बोल लगा के नागर बईला म करी रे किसानी
इहि ल सब के भरोसा इही म सब के जिनगानी
ये भुईयां ल छोड़ के संगी हमन कहां जाई
चलव रे संगी ..................।

    निचट बढ़िया सुहाथे रे संगी हमर खेती खार
    अईसन कहां सुहाथे रे संगी कभू सहर
    गजब बढ़िया दिखे रे संगी इहां के लुगाई
    चलव रे संगी .................।

गजब मोहे हरियर के लुगरा पिवरा किनारी
निचट भाथे रे संगी धान हरियर सरसों पिंवरा बारी
दुल्हन जइसे सजे रहिथे रे भाई हमर धरती महतारी
चलव रे संगी ....................।
  • ग्राम - हरदी, पो - सिरली, थाना - सक्ती,जिला - जांजगीर  चाम्पा (छ.ग.)

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